सूर्यकांत देवांगन
भानुप्रतापपुर, छत्तीसगढ़
भारत में कृषि पर सरकार की नीतियां हों या मौसम की मार, इसका सीधा प्रभाव किसानों पर ही पड़ता है। फिलहाल मौसम की बेरुखी ने किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। देश के पूर्वी हिस्सों को छोड़कर सामान्य से कम हो रही बारिश का खामियाजा किसान भुगत रहे हैं। अगस्त महीने तक होने वाली सामान्य बारिश में इस वर्ष भारी कमी देखी गई है, जिसकी भरपाई मुश्किल हो गई है। इसकी चिंता देशभर के किसानों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के किसानों को भी सताने लगी है।
किसानों
की इस आपदा पर कांकेर जिले के कृषि उप संचालक नरेन्द्र कुमार नागेश ने
बताया कि जिले में सामान्य बारिश नहीं होने से रोपाई और बियासी के कार्य
में देरी हुई है, जिसके कारण उत्पादन 25 से 30 प्रतिशत
कम होने की आशंका है। वर्तमान में किस क्षेत्र में कितना नुकसान हुआ है
इसका आकलन हमारे ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी ग्राउंड पर कर रहे हैं।
किसानों को उनके नुकसान की भरपाई राज्य सरकार के आरबीसी और जिन्होंने
प्रधानमंत्री फसल बीमा करवाया है उन्हें उसके माध्यम से हो जाएगी।
जलभराव की स्थिति पर कांकेर जिले में जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता आरआर वैष्णव का कहना है कि बारिश काफी कम होने से विभाग के सिंचाई तालाबों में जलभराव की स्थिति संतोषप्रद नहीं है। पिछले साल से कम जलभराव हुआ है। जितना लक्ष्य सिंचाई के लिए पानी देने रखा गया है उतना देना संभव नहीं हो पाएगा।
राज्य स्तर के जलाशयों में जल भराव की स्थिति पर भी नजर डाले तो यहां भी पिछले साल के मुकाबले इस वर्ष मुख्य 46 बांधो में औसत पानी 15 से 20 फीसदी
कम है। छत्तीसगढ़ में एक जून से शुरू हुए मानसून ने आधा से ज्यादा सफर तय
कर लिया है लेकिन अल्प वर्षा के कारण बड़े बांधों में शामिल गंगरेल बांध भी
अब तक केवल 39 फीसदी ही भर सका है। प्रदेश के आधा दर्जन जिलों की लाइफ लाइन गंगरेल में कुल क्षमता 767 मिलियन क्यूसिक मीटर के विरूद्ध केवल 296 मिलियन क्यूसिक मीटर पानी ही इकट्ठा हो पाया है। जबकि पिछले वर्ष अगस्त महीने तक की स्थिति में गंगरेल बांध 56 से 60 फीसदी तक भर गया था। यही हाल प्रदेश के दूसरे बड़े बांधो का भी है जिसमें तांदुला जलाशय 19 फीसदी, दुधावा जलाशय 28 फीसदी, सिकासार जलाशय 68 फीसदी, सोंढूर जलाशय 52 फीसदी, माड़मसिल्ली 53
छत्तीसगढ़ में अल्पवर्षा के कारण सूखे की स्थिति अब चिंताजनक होती जा रही है। वर्तमान में प्रदेश की 178 तहसीलों में से 124 तहसीलों में औसत से कम वर्षा दर्ज की गई है। इसमें से 56 तहसीले ऐसे हैं जिसमें 75 प्रतिशत से भी कम वर्षा हुई है। जिसके कारण धान सहित अन्य खरीफ फसल चौपट होने की कगार पर है। इसे देख अब राज्य सरकार भी प्रभावित तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित करने की तैयारी कर रही है। सरकार ने सभी जिला कलेक्टरों को नुकसान का आकलन कर रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं। मौसम की बेरूखी पर प्रदेश के कृषि वैज्ञानिक डॉ. संकेत ठाकुर का कहना है कि कम बारिश से फसलें अब तक बहुत ज्यादा खराब नहीं हुई हैं। यह स्थिति भी नहीं है कि खेतों में जानवरों को चरने के लिए उतार दिया जाए लेकिन आगामी 10 दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो हालात बहुत बिगड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार मानसून अनियमित व खंडवर्षा वाला ही है जिसका सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है। इस संबंध में रायपुर के लालपुर स्थित मौसम विज्ञान केंद्र के मौसम विज्ञानी एचपी चंद्रा ने बताया कि छत्तीसगढ़ में बारिश बंगाल की खाड़ी में निर्मित होने वाले विभिन्न सिस्टम पर निर्भर करता है लेकिन वर्तमान में अभी कोई मजबूत सिस्टम नहीं है जिससे कि प्रदेश में सामान्य वर्षा हो। इस साल राज्य में मानसून की बारिश औसत से 85 से 90 फीसदी के बीच यानी कुछ कम ही रहने वाली है।
छत्तीसगढ़
में एक तरफ ज्यादातर क्षेत्र अकाल की चपेट में हैं तो दूसरी ओर किसानों ने
इस वर्ष धान की खेती निर्धारित लक्ष्य से अधिक की है। सरकार ने इस बार 36 लाख 95 हजार 420 हेक्टे
हालांकि सितंबर माह की शुरुआत के साथ राज्य के कुछ हिस्सों में हल्की बारिश हो रही है, लेकिन यह किसानों की फसलों को लहलहाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में राज्य में कम बारिश और जलाशयों में अल्प जल भराव ने किसानों के साथ-साथ सरकार की भी चिंता बढ़ा दी है क्योंकि अब मानसून के बचे हुए वक्त में सामान्य वर्षा नहीं हुई तो शहरों में पेयजल संकट भी गहरा सकता है। यानि खेतों के साथ साथ इंसानों के गले भी सूख सकते हैं। (चरखा फीचर)


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