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कटा तन जब आम का

कटा तन जब आम का


कटा तन जब आम का....
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आंगन  में  था  मैं आम खड़ा,
बंटवारे   में भाई -भाई लड़ा।


लड़े   वो   कटना   मुझे पड़ा,
दो भाईयों में बंटना मुझे पड़ा।


गर्मी    आई ,     आंधी     लाई,
उड़ी छप्पर फिर मेरी याद आयी।


सोंचो   अगर  हम खड़े होते,
धूप पहर आप छांव में होते,


रोहिण जब परवान चढ़ता,
बदन मेरा आमों से लदता,


लदकर   जब   मै   झुक जाता ,
गिलहरी, कोयल को ललचाता ,


बच्चे सारे मेरे  आंचल में,
लिपटते, खींचातानी  करते,


लग्गी लाते,   टहनी   तोड़ते,
उछल, कूद बचकानी करते।


मां   स्नेह    है   बाल  हार   में,
झुकता     मै,    हारता    मै,


थोड़ा इठलाता , थोड़ा इतराता ,
मीठे  आम  मुंह  पान करता ।


चलो  काट दिया तो काट दिया,
खुद  का  खुद   पर वार  किया।


अब जाओ उठा लो मेरे तन को,
और   बना   लो   एक   ताबूत,


मैं   नहीं   तो   तुम   भी    नहीं,
यही     करेगी    तेरी    करतूत।


गर समझ आ जाए जीवन मरण,
तो पकने  देना  मेरे    फलों  को,


चिड़ियों  को  भी  मना न करना,
अपनों  से  भी   साझा   करना,


और  गुठलियों को दफ़न कर,
बन  जाना  मेरे  मित्र अजीज,


जीवन    नाम    बचा   रहेगा 
लाज    रखेगा   मेरा     बीज।

कवि  : अमरेंदर कुमार 

 युवा कवि व  शिक्षक अमरेंद्र कुमार की यह कविता दरख़्त की उपयोगिता , महत्व व  स्निग्धता को बखूबी व्यक्त करती है।  यह  कविता  विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी गई  है। 

   


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