जल संरक्षण से जीवन में आया स्थायित्व: बांसवाड़ा की महिलाओं ने रोका पलायन और बदली जिंदगी

Hot Posts

6/recent/ticker-posts

जल संरक्षण से जीवन में आया स्थायित्व: बांसवाड़ा की महिलाओं ने रोका पलायन और बदली जिंदगी

लेखक:

विकास परसराम मेश्राम 

vikasmeshram04@gmail.com

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के सज्जनगढ़ ब्लॉक में जल संरक्षण के एक छोटे प्रयास ने पूरे समुदाय के जीवन को बदल दिया। यह कहानी है दयाबाई और उनके साथियों की, जिन्होंने सामूहिक प्रयास से न केवल पानी रोका बल्कि पलायन भी रोका और आत्मनिर्भरता की राह बनाई।

बांसवाड़ा में चेकडेम जल संरक्षण से खेती और जीवन में बदलाव

क्षेत्र की पृष्ठभूमि और चुनौतियाँ

राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का सज्जनगढ़ ब्लॉक एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहाँ अधिकांश लोग पहाड़ियों और फलियों में बसे हुए हैं। यहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं और रोजगार के स्थायी साधनों का भी अभाव है। अधिकतर परिवार वर्षा आधारित खेती और दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं।

जब बारिश नहीं होती या फसल खराब होती है, तो परिवारों को अहमदाबाद जैसे शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। यह पलायन कई बार साल के छह महीने से भी अधिक समय तक चलता है। इसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य, बच्चों की शिक्षा और परिवार के सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन ने इन समस्याओं को और गंभीर बना दिया है।

दयाबाई की स्थिति और समस्या

बिजलपुर गाँव की 46 वर्षीय दयाबाई मोतीलाल डोडीयार अपने पाँच सदस्यीय परिवार के साथ रहती हैं। उनके पास आठ बीघा कृषि भूमि है, लेकिन वर्षा आधारित खेती होने के कारण वे साल में केवल एक ही फसल ले पाती थीं। बाकी समय उन्हें परिवार सहित अहमदाबाद जाकर मजदूरी करनी पड़ती थी।

उनके खेत के पास वर्ष 2013 में ग्राम पंचायत गोदावाड़ा नारंग द्वारा एक चेकडेम बनाया गया था, लेकिन समय के साथ उसमें इतनी मिट्टी भर गई कि वह पूरी तरह निष्क्रिय हो गया। यह समस्या केवल दयाबाई की नहीं थी, बल्कि आसपास के कई किसानों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी थी।

बांसवाड़ा में चेकडेम जल संरक्षण से खेती और जीवन में बदलाव


सामूहिक जागरूकता और पहल

इसी दौरान वागधारा, कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन और हिंदुस्तान यूनिलीवर फाउंडेशन के सहयोग से क्षेत्र में सतत कृषि और जल प्रबंधन पर कार्य शुरू हुआ। ग्राम स्वराज समूह, सक्षम समूह और बाल स्वराज समूह के माध्यम से समुदाय को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण और बैठकें आयोजित की जाने लगीं।

वर्ष 2023 में जल संरक्षण और जल संरचनाओं के सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया। एक बैठक के दौरान दयाबाई को निष्क्रिय चेकडेम को पुनर्जीवित करने का विचार आया। उन्होंने अपनी साथी महिलाओं के साथ मिलकर इस प्रस्ताव को ग्राम स्वराज समूह के सामने रखा।

योजना से कार्य तक का सफर

दयाबाई और उनकी साथियों ने मिलकर ग्राम पंचायत को प्रस्ताव दिया, जिसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत स्वीकृति मिल गई।

काम शुरू होने पर आसपास के लगभग 70 परिवारों ने मिलकर दो महीने तक श्रमदान और मजदूरी की। इस दौरान आदिवासी परंपरा “हलमा” के माध्यम से सामूहिक श्रम किया गया। महिलाओं ने पानी पिलाने से लेकर सफाई और पिचिंग तक हर काम में सक्रिय भागीदारी निभाई।

परिणाम: पानी, खेती और आत्मनिर्भरता

चेकडेम के गहरीकरण के बाद वर्षा का पानी उसमें ठहरने लगा। इससे न केवल पानी उपलब्ध हुआ, बल्कि किसानों को नई उम्मीद भी मिली।

इसका सीधा असर यह हुआ कि:

  • 62 बीघा भूमि में 14 किसानों ने रबी फसल बोई
  • चना, गेहूँ, मक्का, मटर और तुवर की फसलें सफल रहीं
  • पलायन पूरी तरह रुक गया

व्यापक प्रभाव

जल संरक्षण के इस प्रयास का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहा।

  • आसपास के कुओं, हैंडपंप और बोरवेल का जल स्तर बढ़ा
  • पशुपालन में सुधार हुआ
  • 70 परिवारों को लगभग 2200 रोजगार दिवस प्राप्त हुए

महिलाओं की भूमिका और सशक्तिकरण

दयाबाई और उनकी साथियों ने यह साबित कर दिया कि जब महिलाएँ नेतृत्व करती हैं, तो परिवर्तन निश्चित होता है। आज दयाबाई अन्य महिलाओं को संगठित कर रही हैं और जल, जंगल, जमीन, पशु और बीज के महत्व को समझा रही हैं। उनका परिवार, जो पहले पलायन करता था, अब अपनी जमीन पर खेती कर रहा है और एक स्थायी जीवन जी रहा है।

बांसवाड़ा में चेकडेम जल संरक्षण से खेती और जीवन में बदलाव

यह कहानी केवल एक चेकडेम की नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास, जागरूकता और आत्मनिर्भरता की है। जब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक योजनाएँ साथ आती हैं, तो स्थायी विकास संभव होता है। एक सशक्त समुदाय ही अपने सुरक्षित और स्थिर भविष्य की नींव रख सकता है।


Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Ad Code