खुशबू कुमारी

सीतामढ़ी, बिहार

स्वच्छता केवल झाड़ू लगाने, कूड़ा उठाने या चमकती सड़कों तक सीमित नहीं है। यह लोगों के स्वास्थ्य, सम्मान और सुरक्षित जीवन से जुड़ा एक बुनियादी प्रश्न है। किसी भी गांव की पहचान केवल उसकी पक्की सड़कें नहीं होती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वहां रहने वाले लोग कितने स्वस्थ हैं, बच्चों को स्कूल जाने में कितनी सुविधा है और सार्वजनिक स्थान कितने सुरक्षित हैं। 
दूषित पानी से भरी कच्ची सड़क और ग्रामीण बस्ती का दृश्य, जो स्वच्छता, जलभराव और खराब सड़क व्यवस्था की समस्या को दर्शाता है।
लेकिन विडंबना यह है कि आज भी बिहार सहित देश के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता और आधारभूत व्यवस्थाओं की कमी के कारण ऐसी समस्याएं पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं, जिनका असर सीधे लोगों के दैनिक जीवन पर पड़ता है। इनमें सबसे बड़ी समस्या घरों से निकलने वाले गंदे पानी की उचित निकासी का नहीं होना है। ग्रामीण इलाकों में अक्सर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क निर्माण तो करा दिया जाता है, लेकिन उसके साथ जल निकासी की समुचित व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

परिणामस्वरूप लोगों के पास अपने घरों से निकलने वाले गंदे पानी को सड़क पर बहाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। धीरे-धीरे यही सड़कें गंदे और दूषित पानी से भर जाती हैं। यह पानी केवल बदबू ही नहीं फैलाता है, बल्कि मच्छरों और अन्य रोग फैलाने वाले जीवों के पनपने का भी कारण बनता है। ऐसे माहौल में छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं रहती, बल्कि पूरे गांव के स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगती है।

सीतामढ़ी जिले के रीगा प्रखंड का रामनगर गांव इस स्थिति का एक उदाहरण है। गांव में पक्की सड़क का निर्माण तो हो गया, जिससे लोगों को उम्मीद थी कि आवागमन आसान होगा। लेकिन सड़क बनने के बाद भी नालियों की निकासी की व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन अधिकांश घरों का गंदा पानी उसी सड़क पर बहने लगा। बरसात के दिनों में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है, जब सड़क और नाली का अंतर लगभग समाप्त हो जाता है। पानी लंबे समय तक जमा रहता है, जिससे दुर्गंध फैलती है और सड़क पर चलना कठिन हो जाता है।

इसका सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ता है जो प्रतिदिन इसी रास्ते से स्कूल जाते हैं। कई बार उन्हें गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ता है। जिससे उनके स्कूल ड्रेस और जूते गंदे हो जाते हैं, फिसलने का भी खतरा बना रहता है और बरसात के समय यह समस्या कई गुना बढ़ जाती है। शिक्षा तक पहुंचने का रास्ता यदि गंदगी और असुरक्षित हो जाए, तो यह केवल सफाई का नहीं बल्कि बच्चों के अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन का भी प्रश्न बन जाता है।

गांव की निवासी रामरती देवी कहती हैं, "हमें मजबूरी में सड़क पर ही घर के नाले का रास्ता खोलना पड़ा क्योंकि नाले की निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर नाली बनी होती तो कौन चाहता कि उसके घर का गंदा पानी सामने सड़क पर बहे?" रामरती देवी की यह बात कहीं न कहीं यह एहसास कराती है कि कई बार लोग जानबूझकर गंदगी नहीं फैलाते, बल्कि व्यवस्था की कमी उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर देती है। इसलिए केवल लोगों को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यक है कि बुनियादी सुविधाओं और नागरिक जागरूकता, दोनों पर समान रूप से काम किया जाए।

गांव के 47 वर्षीय अनिल बताते हैं कि “यह समस्या केवल गंदगी तक सीमित नहीं रहती। कई बार पानी बहते-बहते दूसरे लोगों के दरवाजे तक पहुंच जाता है। इसी बात को लेकर गांव में लोगों के बीच झगड़े भी हो जाते हैं। छोटी-सी बात धीरे-धीरे आपसी विवाद का कारण बन जाती है।" यह स्थिति बताती है कि जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव होता है, वहां छोटे-छोटे संसाधनों को लेकर तनाव और विवाद बढ़ने लगते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि गंदा और ठहरा हुआ पानी डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, दस्त और अन्य जल जनित तथा वेक्टर जनित बीमारियों के फैलने का प्रमुख कारण बन सकता है। विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण वे सबसे पहले इसकी चपेट में आते हैं। इसलिए जल निकासी की व्यवस्था केवल निर्माण कार्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत सरकार के स्वच्छ सर्वेक्षण ग्रामीण में गांवों के मूल्यांकन के दौरान केवल शौचालयों की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छ सार्वजनिक स्थान, नालियों की व्यवस्था और सामुदायिक स्वच्छता जैसे मानकों को भी महत्व दिया जाता है। इसी प्रकार जल शक्ति मंत्रालय द्वारा भी ग्रामीण क्षेत्रों में तरल अपशिष्ट प्रबंधन को स्वच्छ और स्वस्थ गांव की अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। यदि गांवों में गंदे पानी की निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होगी, तो इसका असर न केवल लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा बल्कि स्वच्छता संबंधी मूल्यांकन और रैंकिंग में भी गांव तथा पंचायत पिछड़ सकते हैं।

दरअसल, स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है और न ही यह केवल नागरिकों का दायित्व है। यह दोनों के साझा प्रयास से ही संभव है। पंचायतों को सड़क निर्माण के साथ नालियों और जल निकासी की वैज्ञानिक व्यवस्था को भी प्राथमिकता देनी होगी। वहीं ग्रामीणों को भी यह समझना होगा कि घर का गंदा पानी सार्वजनिक सड़क पर बहाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि गांव स्तर पर नियमित बैठकें आयोजित हों, स्वच्छता समितियां सक्रिय हों और लोग सामूहिक रूप से समाधान तलाशें, तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि गांवों में जल निकासी को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। नई सड़क बनने से पहले या उसके साथ नालियों की योजना तैयार हो। जहां संभव हो, वहां सोख्ता गड्ढे, सामुदायिक ड्रेनेज व्यवस्था और वर्षा जल प्रबंधन जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाए। पंचायत स्तर पर नियमित सफाई, नालियों की देखरेख और लोगों के बीच स्वच्छता के प्रति व्यवहार परिवर्तन पर भी काम करने की ज़रूरत है।
(यह लेखिका की निजी राय है)