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बेरोजगार सुधारे टमाटर की खेती से माली हालत


‘उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान’

कोरोना काल में प्रवासियों के सामने रोजी-रोटी एक बड़ी समस्या बन गई है। सेहत को दुरुस्त रखने के लिए आमदनी ही ईंधन का काम कर सकती है। पैसे तब आयेंगे जब उद्योग-धंधा चालू होगा। ऐसे में अन्य प्रदेश से लौटे लोगों के लिए खेतीबाड़ी करना सेहत और जेब के लिए तत्कालिक समस्याओं से निजात पाने का साधन बन सकती है। इस आलेख में टमाटर की उन्नत खेती की संक्षिप्त जानकारी देने की कोशिश की गई है।

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सब्जियों की बात आती है, तो टमाटर का नाम जरूर आता है। टमाटर हरेक सब्जियों में आसानी से मिलकर स्वाद को बढ़ा देता है। इसके अलावा नए-नए रेसिपी, चटनी, साॅस, जैम, जेली बंद डब्बे में बिकते हैं। अत्यंत उपयोगी होने के कारण ही इसकी उन्न्त खेती करने की जरूरत है। संपूर्ण भारतवर्ष में टमाटर की खेती सालों भर होती है। टमाटर में  कार्बोहाइड्रेड, विटामिन, कैल्शियम, फाइबर, प्रोटीन, फासफोरस, लौह तत्व आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। पोटैशियम, विटामिन सी, बी काम्पलेक्स हृदय रोगियों के लिए लाभदायक साबित होते हैं। इतना ही नहीं मात्र दस टमाटर में मौजूद एंटी-अक्सिडेंट दिल की बीमारी एवं कैंसर में फायदेमंद हैं । टमाटर खाने से आंखों की रौशनी बढ़ जाती है। 

भूमि:  उचित जल निकासी वाली रेतीली दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें पर्याप्त जीवांश मौजूद हो वह खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है। रोपनी के पहले खेत की जुताई 3-4 बार कर लें। मिट्टी को भुरभुरी करके जमीन को समतल करना आवश्यक है।
उन्नत बीज: पूसा शीतला, पूसा-120, पूसा रूबि, अर्का विकास, आर्क सौरभ, सोनाली, एच 86, डीवीआरटी 1, डीवीआरटी 2 (70-75 दिनों में तैयार हो जाते हैं।), हिसार अरूण (60-65 दिनों में तैयार हो जाते हैं।), काशी  हेमंत काशी शरद, यह परंपरागत किस्म है। इसके अलावा संकर किस्में- अविनाश 2 (50-55 दिनों में तैयार होते हैं।), एनएस 8, एनएच 5005, बीएसएस 40, टाॅल्सटाॅय इत्यादि हैं।
जलवायु: टमाटर की खेती के लिए तापक्रम काफी महत्व रखता है। आदर्श तापमान 20-25 डिग्री सेन्टीग्रेट होना चाहिए। तापक्रम बढ़ जाने के बाद फूल-फल पर असर पड़ता है।
बीज की बुआई का समयः पौधशाला में अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न हो सकता है। शरद ऋतु में जुलाई-सितंबर, बसंत-ग्रीष्म ऋतु में नवंबर से दिसम्बर एवं पहाड़ी इलाकों में मार्च-अप्रैल में करना उपयुक्त होता है।  



 
बीज की मात्रा: 


            👉 एक हेक्टेयर में परंपरागत बीज 350-400 ग्राम
            👉 संकर (हाइब्रिड) किस्म 200-250 ग्राम
 

पौधशाला में बीज की तैयारी: स्वस्थ व अच्छे बीज तैयारी के लिए प्रति वर्ग मीटर की दर से मिट्टी में गोबर या वर्मी कंपोस्ट अच्छी तरह से मिलाना चाहिए। 10 ग्राम डाई अमोनियम फास्फेट और 2-3 किलो गोबर या कंपोस्ट डालकर मिट्टी को भुरभुरी और मुलायम करना चाहिए। बीज डालने के बाद हल्का कंपोस्ट से ढंक दें। इसके बाद नमी के हिसाब से हल्की सिंचाई फुहारे से करें। पौधशाला में घास-फुस का छप्पर (आवरण) लगाएं। अंकुरण के बाद आवरण हटा दें। सुरंग बानने वाले कीट का आक्रमण हो, तो कीटनाशक का छिड़काव करें।  20-30 दिनों के अंदर पौधा रोपने लायक हो जाएगा।
उर्वरक: सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 20-25 टन सड़ी हुई गोबर या कंपोस्ट खाद देकर खेत तैयार करना चाहिए। एक से डेढ़ क्विंटल नाइट्रोजन, 60-80 किग्रा फास्फोरस, 50-60 किग्रा पोटाश आदि डालना चाहिए।
सिंचाई: पौधा रोपने के पश्चात हल्की सिंचाई आवश्यक है। गर्मी के मौसम में 7-8 दिनोंपर तथा सर्दी के मौसम में 10-15 दिनों पर सिंचाई करते हैं। यह आवश्यक  है कि खेत में अधिक पानी न लगे। अधिक पानी लगने से पौध में रोग लग जाता है।
फसल में ध्यान रखने योग्य बातें:
1.    हल्की और दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
2.    मिट्टी का पीएच मान 7 से 8.5 होना चाहिए।
3.    बीज को उपचारित करके बुआई करें।
4.    गर्मी में सप्ताह में एक दिन सिंचाई करें।
5.    सर्दी के दिंनों में 10-15 दिनों में सिंचाई करें।
6.    समय-समय पर निराई-गुराई आवष्यक है।
बहरहाल, बेरोजगारी दूर करने के लिए खेती पर आश्रित होना समय की मांग है। ‘उत्तम खेती मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान’ वाली कहावत कोरोना से बेराजगार हुए युवाओं के लिए सटीक बैठती है। इस प्रकार से टमाटर की खेती करके परंपरागत बीज से भी एक हेक्टेयर में लगभग 400-500 क्विंटल उत्पादन लिया जा सकता है।

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