Vikas Meshram
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बाँसवाड़ा
ज़िले के आदिवासी बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार के लिए आयोजित "पोषण
स्वराज अभियान" 'स्वराज' का एक उपयुक्त उदाहरण बनकर उभरा है। अभियान की
नींव आदिवासी संस्कृति और उनके जीवन में निहित है जो कृषि से संबंधित है।
महात्मा गांधी जी के स्वराज के सिद्धांतों के आह्वान को खाद्य संप्रभुता के
आधुनिक आह्वान के अग्रदूत के रूप में देखा जा सकता है। इन सिद्धांतों का
कहना है कि जहां तक संभव हो, लोगों का पोषण कैसे किया जाना चाहिए, इसके
बारे में निर्णय स्थानीय स्तर पर किए जाने चाहिए, न कि सरकार या अन्य
एजेंसियों द्वारा। चूंकि, राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों की
पोषण स्थिति कमजोर है। क्षेत्र के कुपोषित बच्चों को COVID की तीसरी लहर
में संक्रमण होने का अधिक खतरा है, जिसे समय पर प्रबंधित करने की आवश्यकता
थी। इसलिए समुदाय आधारित पोषण अभियान की संकल्पना उनके पोषण स्तर में सुधार
के लिए, स्थानीय रूप से उपलब्ध पौष्टिक खाद्य समूहों के साथ बच्चों का
पोषण करने के लिए की गई थी। कम लागत और स्थानीय रूप से उपलब्ध समाधानों के
कारण कुपोषित बच्चों के उपचार में यह दृष्टिकोण प्रभावी साबित हुआ है।
आदिवासी
क्षेत्र में पोषण की कमी को स्थानीय रूप से उगाए गए कृषि उत्पादों से
आसानी से पूरा किया जा सकता है, पूरे अभियान के दौरान बच्चों को प्रदान की
जाने वाली पोषण खाद्य सामग्री समुदाय के समर्थन से स्थानीय स्तर पर उपलब्ध
कराई गई थी। कुपोषित बच्चों की माताओं को अभियान के बाद भी पौष्टिक व्यंजन
बनाने में सक्षम बनाया गया, क्योंकि उनकी पोषण संबंधी जरूरतों के लिए बाहरी
वातावरण या बाजारों पर उनकी निर्भरता नहीं होती है।
पोषण
स्वराज अभियान 10 अगस्त से 28 अगस्त, 2021 तक जिला प्रशासन और वागधारा के
सहयोग से महिला एवं बाल विकास विभाग, चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग और
जनजातीय क्षेत्र विकास विभाग जैसे प्रमुख सरकारी विभागों के सहयोग से
क्रियान्वित किया गया था। इसके तहत बांसवाड़ा जिले की पांच पंचायत समितियों
आनंदपुरी, घाटोल, सज्जनगढ़, कुशलगढ़ एवं गांगडतलाई के 750 गांवों में बच्चों
के पोषण की स्थिति का आंकलन करते हुए उनकी स्क्रीनिंग के साथ 15 दिनों के
पोषण अभियान की शुरुआत की गई थी। इन बच्चों की एंथ्रोपोमेट्रिक माप यानी
लम्बाई/ऊंचाई, वजन और मध्य-ऊपरी भुजा की परिधि का मापन किया गया और उम्र
(कम वजन) संकेतक के लिए वजन के आधार पर, गंभीर रूप से तीव्र कुपोषित और
मध्यम रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की गई।
परमेश
पाटीदार ने बताया की 15 दिवसीय पोषण शिविर समुदाय के साथ साथ सरकारी
विभागों, जिला प्रशासन व वागधारा के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में उभर कर
आया और कुपोषित बच्चों की पहचान करने और उनके पोषण की स्थिति में सुधार
करने में अत्यधिक प्रभावी अभियान साबित हुआ है। बांसवाड़ा जिले के सभी 750
गांवों में जहां यह अभियान आयोजित किया गया था, वहां कुपोषण का उच्च प्रसार
देखा गया। कुल 67,288 बच्चों की जांच की गई, जिनमें से लगभग 26% बच्चे
कुपोषित (MAM) और अति कुपोषित (SAM) दोनों श्रेणी में कुपोषित पाए गए।
पोषण स्वराज अभियान का आयोजन निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों के साथ बांसवाड़ा जिले के 750 गांवों में किया गया था:
1. जनजातीय क्षेत्रों में कुपोषण की व्यापकता को कम करने में सामुदायिक कार्यों के महत्व को स्थापित करना।
2. बच्चों के पोषण स्तर में सुधार लाने में स्थानीय खाद्य पदार्थों के पोषण संबंधी महत्व को प्रदर्शित करना।
संस्था
के सुदीप शर्मा बताते है की अत्यधिक पौष्टिक स्थानीय खाद्य समूहों की एक
समृद्ध विविधता जैसे कि मक्का, रागी, कांगनी, सांवा जैसे अनाज; रजन, लूनी,
लौकी आदि जैसी सब्जियां; मूंगफली, तिल इत्यादि स्थानीय रूप से उगाए जाते
हैं और आदिवासी क्षेत्रों में आसानी से उपलब्ध होते हैं। शिविरों में
बच्चों को इन पोषक आहार समूहों से पोषित किया गया और अभियान के 15 दिनों के
बाद लगभग 62 प्रतिशत बच्चों का वजन बढ़ गया था। इससे पता चलता है कि इन
स्वदेशी खाद्य समूहों में बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार करने की क्षमता
है और इसलिए, आईसीडीएस के पूरक पोषण कार्यक्रम के साथ-साथ घरेलू स्तर के
पोषण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
जनजातीय
समुदायों तक पहुँचने के लिए 360 डिग्री दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी और बाल
कुपोषण में सुधार के साथ-साथ उन्हें अपने क्षेत्रों में कुपोषण के स्तर को
कम करने के लिए सामुदायिक स्तर के कार्यों के महत्व के प्रति संवेदनशील
बनाने की दिशा में सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता होगी। माजिद
खान ने बताया की लाभार्थियों के वजन में होने वाले परिवर्तन को मापने के
लिए सभी पांचों पंचायत समितियो में पोषण स्वराज अभियान के 16 सप्ताह पूरा
होने के बाद द्वितीय चरण की स्क्रीनिंग की गयी। इसमें कुल 15733 बच्चे
शामिल हुए। जिसमे दौबारा से इन बच्चों की एंथ्रोपोमेट्रिक माप यानी
लम्बाई/ऊंचाई, वजन और मध्य-ऊपरी भुजा की परिधि का मापन किया गया। द्वितीय
चरण की स्क्रीनिंग के डेटा विश्लेषण के बाद पोषण स्वराज अभियान से
लाभान्वित बच्चों पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है । इसका अर्थ यह हुआ
कि पोषण अभियान में माताओं को बच्चों के पालन-पोषण के लिए जो बातें बताई
गईं और उन्हें भोजन संबंधी जो जानकारी प्रदान की गयी थी, उन्होंने उनका
परिवार स्तर पर नियमित रूप से ध्यान रखा।
द्वितीय चरण के परिणाम :
• 16 सप्ताह बाद सामान्य श्रेणी के बच्चों में 12.3% अंक (33.15% से 45.45% अंक) की बढ़ोतरी देखी गई।
• कुपोषित बच्चों (MAM) में 26.6% अंक और अतिकुपोषित बच्चों (SAM) में 17.1% अंक की कमी आई और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ।
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