ज्वलंत मुद्दे

6/recent/ticker-posts

वसंत पंचमी : वर दे, वीणावादिनि वर दे..

विशेष

शीत ऋतु के बाद वसंत का आगमन होता है। पूरे भारत समेत पश्चिमोत्तर  बांग्लादेश, नेपाल एवं अन्य कई देशों  में बड़े उल्लास के साथ मां सरस्वती की पूजा- अर्चना पूरे विधि-विधान के साथ की जाती है। सरस्वती मां को साहित्य, संगीत, कला की देवी स्वरूप पूजा-उपासना करते हैं। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी कहा जाता है। बसंत के आगमन के साथ-साथ प्रकृति की सुषमा सौंदर्यमान हो जाती है। वसंत के स्वागत में पेड़-पौधे, पशु-पक्षियों में नई बहार आ जाती है। पूरी प्रकृति नये पत्ते, फूलों, फलों से आच्छादित हो जाती हैं। खेतों में सरसों के फूल सुनहले हो जाते हैं। कोयल की मधुरिम कूक से मन आह्लादित हो जाता है। गेंहूं, जौ आदि में नई-नई बालियां खिलने लगती हैं। आम के पेड़ों पर मंजर आ जाते हैं ।


 तितलियां और भंवरें पुष्पों की कलियों पर मंडरने लगते हैं।  माघ महीने के पांचवें दिन वसंत पंचमी को मां शारदे की पूजा की जाती है। विद्या की देवी की पूजा करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। बुद्धि-विवेक और हृदय को नई उर्जा व ओजस्विता मिलती है। इसलिए मां शारदे की पूजा धूमधाम से करनी चाहिए। धूमधाम का कतई मतलब नहीं कि डीजे और डिस्को पर हम थिरके। बल्कि माता का स्मरण करते हुए यह संकल्प लें कि तय लक्ष्यों की प्राप्ति करने की शक्ति विद्यादायिनी दें ताकि हमसब सजग, सफल, सभ्य और सुशिक्षित बन समाज, देश  और प्रकृति की सेवा में योगदान दे सकें। सूर्यकान्त त्रिपाठी  कविता आज के युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है-

 

 

वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव
भारत में भर दे।
वीणावादिनि वर दे।

काट अंध उर के बंधन स्तर
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष भेद तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।
वर दे , वीणावादिनि वर दे।

नव गति, नव लय, ताल छंद नव
नवल कंठ, नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृंद को,
नव पर नव स्वर दे।
वर दे, वीणावादिनि वर दे।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ