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एक आदमी की कभी न खत्म होने वाली 'जारी है लड़ाई'

डाॅ संतोष सारंग


कवि जब अपनी खुली आंखों से यथार्थ का सूक्ष्म अवलोकन करता है, तो उसकी लेखनी कविता के साथ न्याय कर पाती है। आम-अवाम की पीड़ा, नरक भोगनेवाली आबादी का संत्रास जब रचनाकार की अपनी टीस बन जाती है, तो कविता में पिरोए उसके एक-एक शब्द बेबाक बोल उठते हैं, चिल्ला उठते हैं पीड़ित जनता के पक्ष में। एक-एक पंक्ति बन जाती है आग की चिंगारी, तोप का गोला; अत्याचारियों के खिलाफ, शोषक-सामंतों और तानाशाह हुक्मरानों के अन्याय के विरुद्ध। साहित्यिक वातावरण में पले-बढ़े संवेदनशील कवि संतोष पटेल की कविता भी यथार्थ की जमीं पर अंकुरित होकर बिंब का पिरामिड बनाती है, जिसके नाभिनाल में ‘जन’ की चीत्कार गूंजती रहती है। 

एक आदमी की कभी न खत्म होने वाली 'जारी है लड़ाई'

कवि साधन है और कविता जनता की आत्माभिव्यक्ति का उपकरण। कवि भी एक आम इंसान ही होता है, ठीक एक पाठक की तरह। जब एक कवि सहृदय की भाव-भूमि पर पालथी लगाकर लिखता है और उसी भाव से एक संवेदनशील पाठक उस रचना का पाठ करता है, तो कविता सचमुच जीवंत हो उठती है। ‘चिन्तामणि’ में संकलित ‘कविता क्या है?’ शीर्षक निबंध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल लिखते हैं- ‘‘हृदय पर नित्य प्रभाव रखनेवाले रूपों और व्यापारों की भावना को सामने लाकर कविता बाह्य प्रकृति के साथ मनुष्य की अंतःप्रकृति का सामंजस्य घटित करती हुई उसके भावात्मक सत्ता का प्रसार करती है।

’’ भाव-संवेदनाओं के तल पर निमग्न रहनेवाले युवा कवि संतोष पटेल का रचना-संसार भी बाह्य व अंतःप्रकृति का सामंजस्य बिठाता हुआ सामाजिक यथार्थ का वितान खड़ा करता है। हमनाम संतोष पटेल की कविताएं मेरी नजरों के सामने से पहली बार गुजरी है। आंखों का आदेश हुआ- ठहरो, पढ़ो और दीन-दुखियों का आर्तनाद सुनो। मैं एक पल ठिठका, फिर एक-एक कविता की गहराई में उतरता चला गया।

कविता-संग्रह ‘जारी है लड़ाई’ में कुल अठावन कविताएं हैं, जो नवजागरण प्रकाशन, नई दिल्ली से छपा है। संग्रह की पहली कविता अमर-प्रेम व हिमालयी हौंसले की महागाथा रचनेवाले माउंटेनमैन दशरथ मांझी पर केंद्रित है। इस कविता में कवि ने सतयुग के दशरथ और आज के दशरथ (मांझी) से तुलना करते हुए श्रम की प्रतिष्ठा ही नहीं की है, बल्कि उदात्त प्रेम की पराकाष्ठा को भी स्थापित किया है। कवि का मन कथित धर्म के नाम पर पांखड व अंधविश्वास का टीला खड़ा करनेवाले कर्मकांडियों की करतूत को देखकर आक्रोशित है। ‘मुझे जो घण्टियां पसंद हैं’ शीर्षक कविता की चंद लाइनों पर गौर फरमाइए-

एक आदमी की कभी न खत्म होने वाली 'जारी है लड़ाई'

‘नहीं है पसंद

मुझे मंदिरों में बजनेवाली घण्टियां

क्योंकि परोसती हैं ये

पाखंड/अंधविश्वास

बनाती हैं अकर्मण्य

और भाग्यवादी’’

आगे की पंक्तियों में कवि ने हवावाली मिठाई, रामदाने के लड्डू बेचनेवाले की घंटियां, स्कूल की घंटियां, एंबुलेंस की घंटियां आदि को जनोपयोगी बताया है। 

‘नव-दलित’ शीर्षक कविता में कवि भारतीय समाज में दलित वर्ग की वास्तविक व दयनीय स्थिति का बखूबी व बिंबात्मक चित्र उकेरा है और दलित होने का अर्थ समझाया है-

‘‘दलित मतलब 

दबा हुआ, वंचित, हाशिये का समाज

त्रस्त रहा

सामाजिक भेदभाव, वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था से

त्रस्त रहा

जातीय भेदभाव से

छुआछूत से’’

कवि की दृष्टि सिर्फ बाहरी दुनिया पर ही नहीं पड़ती है, बल्कि वे मानवीय गुणों का परीक्षण करती हुए प्रेम की सार्थकता को भी प्रकाश में लाती है। कविता ‘प्रेम करना इतना आसान नहीं’ में कवि का निखरा हुआ एक चिंतक रूप भी सामने आता है-

‘‘सच बताओ

प्रेम करना इतना आसान है?

इतना आसान होता तो

फिर क्यों हमारे सन्त, मुनि-ज्ञानी

पीर-फकीर हजारों साल से 

एक ही बात सिखलाते रहे

आपस में प्रेम करो’’

अपनी भावाभिव्यक्ति को शब्द-रूप देनेवाले कवि संतोष पटेल पलायन, ऑनर किलिंग, गिरमिटिया मजदूरों आदि की समस्याओं को भी स्वर देते हैं। कवि तानाशाह शासक की धुर्त चालबाजियों पर भी करारी चोट करता है। 

‘अपनी बात’ में कवि संतोष पटेल लिखते हैं कि यह सत्य है कि जीवन के जिस मोड़ पर मैं खड़ा हूं, समाज के हर क्षेत्र से प्राप्त हुए अनुभव, मुझे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक विसंगतियों के विरुद्ध चुप रहने की इजाजत नहीं देते। मेरे अनुभव मन को उद्वेलित करते हैं कि इन असमानताओं के खिलाफ युद्धरत रहूं। और इसकी ही परिणति है यह कविता-संग्रह - ‘जारी है लड़ाई’। वहीं दलित चिंतक प्रो. शत्रुघ्न कुमार इसी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं, ‘बहुजन आंदोलन की समझ का परिणाम है- ‘जारी है लड़ाई’।

कुल मिलाकर यह काव्य-संग्रह ऐसी कविताओं का गुलदस्ता है, जो समाज, राजनीति और जन-संघर्षों के नाजुक रेशों को लेकर आकार ग्रहण करता है। कुछ कमियों के बावजूद यह कविता संग्रह पठनीय व प्रभावोत्पादक बन पड़ा है। संतोष पटेल की काव्य-संग्रह के रूप में एक और ताजातरीन रचना ‘कारक का चिह्न’ भी इन दिनों चर्चा में है। इसमें पचपन कविताएं संकलित हैं।

'जारी है लड़ाई' के कवि 

जन्म : 4 मार्च, 1974, बेतिया, पश्चिम चम्पारण, बिहार। 

पिता : डॉ गोरख प्रसाद मस्तान 

माता : श्रीमती चिंता देवी 

शिक्षा : पीएचडी, इंदिरा गांधी, राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई  दिल्ली। नेट (हिंदी ), एमफ़िल  (इंग्लिश ), एमए  (हिंदी ), ,एमए  (भोजपुरी ), स्वर्ण पदक

एक आदमी की कभी न खत्म होने वाली 'जारी है लड़ाई'

एक आदमी की कभी न खत्म होने वाली 'जारी है लड़ाई'

समीक्षक : 

सम्प्रति : डॉ संतोष सारंग 

समता कॉलेज, जन्दाह, वैशाली, 

बिहार में  अतिथि सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। 

प्रभात खबर में बतौर मुख्य उप संपादक के पद पर १० वर्षों तक अपनी सेवा दी। 




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