दिया आर्य
असों, कपकोट
बागेश्वर, उत्तराखंड
काश जिंदगी मेरी कोई किताब होती,
ज़िक्र तुम्हारे पन्नों को मैं फाड़ देती,
स्याही जिस कलम की इस्तेमाल होती,
उस कांच की शीशी को मैं उजाड़ देती,
सहारा क्यों दिया तुमने,
जबकि खुद को मैं संभाल लेती,
हां गिरती कई बार, टेढ़े मेढ़े रास्तों पर
लेकिन विश्वास है मुझे, खुद को संभाल लेती
दिखावे की तुम्हारे उन बातों को,
काश, पहले ही पहचान लेती,
जाहिर कर देते वो राज,
जो दिल में थे तुम्हारे,
सच कहती हूं, अपने ज़िक्र को भी
तुम्हारे (जिंदगी की) किताब में डाल देती।
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बारिश का मौसम
बीना दानु
बघर, कपकोट
उत्तराखंड
बारिश का मौसम है आया,
हम बच्चों के मन को है भाया
छु हो गई गर्मी सारी
मारे हम मिलकर किलकारी
कागज की हम नाव चलाएं
छम- छम नाचे और नचाएं
मजा आ गया तगड़ा भारी
आँखों में आ गई खुमारी
गरम पकौड़ा मिलकर खाएं
चना चबीना खुब चबाएं
गरम चाय की चुसकी प्यारी
मिट गई मन की खुशकी सारी
बारिश का यूं लुफ्त उठाएं
सब मिलकर आज बच्चें बन जाएं

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