डाॅ संतोष सारंग
प्रेमचंदोत्तर हिंदी उपन्यास को विषय की विविधता व प्रयोगधर्मिता की दृष्टि से समृद्ध व उर्वर कालखंड कहा जा सकता है। उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर में पूंजीवाद की आवारागर्दी के कारण मानवीय रिश्तों में खटास आना, जीवन-मूल्यों का क्षरण एवं सामाजिक ताने-बाने की मजबूत दीवारों का दरकना सामान्य-सी घटना जरूर लगती है, लेकिन इसका प्रभाव उतना ही गहरा है। ऐसे में साहित्य-साधकों का संवेदनशील लेखक मन इन ज्वलंत विषयों पर जाना स्वाभाविक है। डॉ जगदीश प्रसाद सिंह एक बेहद संवेदनशील सर्जन-साधक हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों में विघटित होते जीवन-मूल्यों के विविध पक्षों का उद्घाटन किया है। आधुनिक युग की इन विसंगतियों और विडंबनाओं को डॉ सिंह अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के साथ बखूबी उकेरते हैं। वे जीवन-मूल्यों को समाज को संस्कारित करने वाले मानते हैं। उनमें पारिवारिक संबंधों के अंर्तसूत्र को पहचानने की कला निराली है।
डॉ जगदीश प्रसाद सिंह पेशे से प्राध्यापक और मिजाज से सुलझे हुए उपन्यासकार रहे हैं। बिहार के मगध विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में वरीय प्राध्यापक रहे डॉ सिंह ने अध्यापन कार्य के दौरान देश की समाजार्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों को बहुत करीब से देखा-समझा, जिसे नौकरी से रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने लेखन कार्य शुरू किया, तो इसे राॅ मेटेरियल की तरह इस्तेमाल किया। उनका पूरा जीवन अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन में गुजरा, लेकिन वे एक सफल उपन्यासकार के रूप में हिंदी भाषा में ही चमके। डाॅ सिंह ने अपने उपन्यास 'अमावस की रात', 'इंद्रधनुष', 'अनुसूया', 'विजयपर्व', 'स्वप्नदंश', 'भागीरथी, 'रागमलार' एवं 'मृगतृष्णा' में जीवनानुभव से अर्जित यथार्थ को जीवंत रूप में चित्रित किया है। उपन्यास के अलावा उन्होंने कहानी-संग्रह, नाटक एवं बाल साहित्य की भी रचना की। वामपंथी विचारधारा वाले इस लेखक की सांस्कृतिक जीवन की दृष्टि भारतीय है, देशी है, मौलिक है।
विद्वानों की दृष्टि में डाॅ जगदीश प्रसाद सिंह
बिहार विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ) रामप्रवेश सिंह लिखते हैं कि जगदीश बाबू ने कई परिवेश को देखा है, समझा है, उसकी संवेदना को गहरे मन से अनुभव किया है। उससे यथोचित जीवन-रस ग्रहण भी किया है, लेकिन परिवेश में रहकर भी नये परिवेश को गढ़ने में उनकी रुचि अधिक है। वर्तमान विभागाध्यक्ष डाॅ सतीश कुमार राय लिखते हैं कि डाॅ जगदीश प्रसाद सिंह समर्पित शिक्षक रहे हैं और हिंदी तथा अंग्रेजी कथा-साहित्य साथ-साथ बाल साहित्य के सृजन में भी उनका सार्थक योगदान रहा है।
डाॅ सुशांत कुमार : एक गंभीर अध्येता व संवेदनशील कहानीकार
डॉ जगदीश प्रसाद सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का गंभीरतापूर्वक जितना निष्पक्ष व व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए, वह हुआ नहीं है। डाॅ सुशांत कुमार बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के पीजी हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। सुशांत ने डॉ जगदीश प्रसाद सिंह के संपूर्ण जीवन एवं औपन्यासिक कृतियों पर वरीय प्राध्यापक डाॅ कल्याण कुमार झा के निर्देशन में गंभीर व वृहद् शोध कार्य किया है। सुशांत कुमार एक सुलझे हुए एवं संवेदनशील कहानीकार हैं। इनकी 'साइकिल बिटिया' शीर्षक कहानी काफी चर्चित रही है। 'लाॅकडाउन', 'घर का रास्ता', 'डायन', 'आमदनी चालू है', 'जिंदगी के लिए जद्दोजहद' आदि इनकी महत्वपूर्ण कहानियां हैं। सुशांत की 'डॉ जगदीश प्रसाद सिंह के उपन्यासों में जीवन-मूल्यों के विविध आयाम' इनके गंभीर व गहन शोध-कार्य का पुस्तकाकार दस्तावेज है, जिसे शुभदा बुक्स ने प्रकाशित किया है।
इनके राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में दर्जनाधिक लेख व शोध-पत्र छप चुके हैं। इन्होंने 'पाटलिपुत्र प्रभा', 'नया प्रस्थान' एवं 'अर्पण' पत्रिका का संपादन भी किया है। डाॅ सुशांत एक अच्छे वक्ता एवं सरल-सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं। शिक्षक बनने से पूर्व वे बिहार प्रशासनिक सेवा में महत्वपूर्ण पदों पर कुशलतापूर्वक कार्य कर चुके हैं। पंजाब नेशनल बैंक में बतौर राजभाषा अधिकारी उल्लेखनीय काम किया है। सुशांत निरंतर लेखन कार्य में रत हैं। साहित्यिक अवदान के लिए डा सुशांत कुमार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना की तरफ से 'आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा सम्मान' से नवाजे जा चुके हैं।


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