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संग्राम हमारा

 अमरेंद्र कुमार 

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रत्तीभर मांग बची रहेगी

आस नहीं मरने देंगे

अपने संघ की सत्ता से

संग्राम नहीं रुकने देंगे।


फिरते थे हम गली-गली

रोजगार के गलियारे में

कुछ हाथ लगी कुछ चली गई

गुमनामी के अंधियारे में।


डिग्री ले कर बैठे थे हम

नियुक्ति की तैयारी में

सत्ता ने सत्यानाश किया

अपनों की यारा-यारी में।


रोजगार का दर्द उठा जब

चूल्हे की लाचारी में

उठा लिया पताका हमने

संग्राम की तैयारी का।


तब शासन डोला यारी छोड़ी

मिली रोजी बनाकर कोरी

हमने कोरी को स्वीकार किया

लोकतंत्र को याद किया।


लोक-लाज बचाने को

जन-जन तक आवाज पहुंचाने को

अब आओ साथी एक ही पथ पर

दृढ़ पग रखकर कर्म पथ पर।



संग्राम हमारा चल रहा है

मांग सीने में पल रहा है

अन्तिम हुंकार बाकी है

मंजिल तक कदम बढ़ाना है।


इस्तिहार फरियाद की अब,

चप्पा चप्पा चस्पा देंगे। 

अपने संघ की सत्ता से,

संग्राम नहीं रुकने देंगे।



        

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