अमृतांज इंदीवर  

महिलाएं कल तक चहारदीवारी के अंदर अपने भाग्य को कोसती, सिसकतीं, यातना-यंत्रणा सहती रहती थीं, लेकिन आज अपने बलबूते सपनों की उड़ान भर रही हैं। इक्कीसवीं सदी की महिलाएं आज बदलते भारत की मजबूत नींव रखने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। नगर से लेकर गांव-कस्बों तक की महिलाओं की सोच व नजरिए में बदलाव दिख रहा है। खासकर ग्रामीण महिलाएं घर की दहलीज से बाहर आकर स्वयं आत्मनिर्भरता की इबारत तो लिख ही रही हैं, साथ ही कमजोर, लाचार, परित्यक्त महिलाओं को भी संबल दे रहीं तथा आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों, जगजगी केंद्रों, नारी अदालतों, एसएचजी ग्रुप, आजीविका आदि महिला आधारित प्रोग्राम ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति बदली, साथ ही आर्थिक उपार्जन के रास्ते भी खोल दिए। त्रिस्तरीय पंचायती राज में आधी आबादी को मिला 50 प्रतिशत आरक्षण और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गयी साइकिल-पोशाक व छात्रवृत्ति योजना ने भी लड़कियों को स्वावलंबी बनने का रास्ता दिखाया।      

  

बिहार की महिलाएं अपने बलबूते बन रही हैं आत्मनिर्भर

आज ग्रामीण महिलाएं चूल्हा-चौका से लेकर व्यावसाय व नौकरी पेशा तक को अपनाने में पुरुषों के मुकाबले पीछे नहीं हैं। पश्चिमी चंपारण के इलाके में बेतिया की स्वधा महिला सामाख्या की लक्ष्मी देवी तकरीबन चार ब्लॉक में महिला सशक्तीकरण व महिला अधिकारों के लिए काम कर रही हैं। लक्ष्मी ने सबसे पहले 250 महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन किया, जिसमें करीब 2000 से अधिक महिलाएं प्रत्येक महीने 10-15 की संख्या में बैठती हैं। वे महिलाएं आज बचत के साथ-साथ खेतीबाड़ी, चूड़ी-लहठी, परचून की दुकान चला रही हैं। इनका यह प्रयास स्वावलंबन की दिशा में मील का पत्थर साबित हो रहा है। लक्ष्मी बताती हैं कि घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और महिलाओं से संबंधित समस्याओं को नारी अदालत में सुलझाया जाता है। सैकड़ों महिलाएं बिजनेस और हस्तकरघा उद्योग चलाने के लिए जीविका से जुड़कर प्रशिक्षण और ऋण प्राप्त कर व्यावसाय से रोजी-रोटी चला रही हैं।

बिहार की महिलाएं अपने बलबूते बन रही हैं आत्मनिर्भर

स्त्री-विमर्श एवं महिला सशक्तीकरण के इस आधुनिक दौर में जब सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर आधी आबादी को आर्थिक व सामाजिक रूप से समृद्ध करने का अभियान चला, तो इसमें बिहार की महिलाएं पीछे नहीं रहीं। खासकर उत्तर बिहार में इसका अच्छा-खासा असर दिखा। मुजफ्फरपुर जिले के मुशहरी ब्लॉक का ही उदाहरण ले सकते हैं। प्रखंड के हरपुर अहियापुर की रहने वाली रूपा देवी पिछले दो वर्षों से मशरूम का उत्पादन कर चार बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पूरी करा रही हैं। रूपा ने जीविका के स्वयं सहायता समूह से डेढ़ लाख रुपए ऋण लेकर मशरूम की खेती शुरू की। आज सालाना लागत से दोगुनी आमदनी करके वह घर-गृहस्थी चला रही हैं। वहीं जीविका मित्र की भूमिका में लगभग वार्ड संख्या 11 की 130 महिलाओं को मशरूम उत्पादन व बचत के लिए प्रशिक्षित करने में पूरा समय लगाती हैं। साप्ताहिक बैठक में महिलाएं 10 रुपए स्वयं सहायता समूह कोष में बचत करती हैं। बचत किये गये पैसे से गांव की महिलाओं को रोजगार और दैनिक जीवन में आर्थिक समस्या से निजात दिलाने के लिए किसी बैंक पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। 

बिहार की महिलाएं अपने बलबूते बन रही हैं आत्मनिर्भर
बिहार की महिलाएं अपने बलबूते बन रही हैं आत्मनिर्भर
इसी तरह के और भी उदाहरण महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन के दिये जा सकते हैं। मधुबनी जिले की सुशीला देवी पति की मृत्यु के बाद बिल्कुल टूट चुकी थी। एक बेटा और एक बेटी के परवरिश की जिम्मेदारी माथे पर आने के बाद वह तनिक भी घबराई नहीं। पति द्वारा संचालित पवन बुक स्टॉल को संभालने लगी। घर-परिवार के लोग इस काम को मान-मर्यादा के खिलाफ समझते थे। बावजूद उसने स्टेशन के समीप किताब की दुकान को परिश्रम और लगन के साथ चलाने लगी। सुशीला आज मधुबन जिले में किताब के व्यापार के लिए जानी जाती हैं। उधर, मोतिहारी जिले के केसरिया प्रखंड में पिछले एक साल से कोचिंग चलाने वाली निकहत परवीन ने शुरू से एक आत्मनिर्भर जीवन जीया है। जन पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न विषयों पर आलेख की बदौलत ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ से भी सम्मानित की जा चुकी हैं। वहीं कोरोना के दौरान यूनिसेफ तथा सीसीआई जैसी संस्था के साथ भी काम कर चुकी हैं। निकहत ने किसी पर निर्भर होकर अपना जीवन नहीं जीया और आगे भी वे इस ध्येय को बरकरार रखने के लिए निरंतर लेखन और पठन-पाठन के कार्यों में मशगूल रहती हैं। निकहत कहती हैं कि अक्सर महिलाएं शादी के बाद अपने जीवन को मात्र गृहिणी तक ही सीमित कर लेती हैं और अपने हुनर को जिम्मेदारियों के बोझ तले दफन कर देती हैं। निकहत जैसी महिलाओं से ये सीखने की जरूरत है कि प्रयास का कोई अंत नहीं होता, बस इसका रूप बदलता रहता है। हां, सफलता तब मिलती है जब प्रयास करने की चाह हो। 

वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में जीविका के तहत संचालित कार्यक्रमों से उत्तर बिहार की महिलाएं रोजी-रोजगार करके स्वावलंबन की मिसाल पेश कर रही हैं। अभी हाल में राज्य सरकार द्वारा देसी शराब एवं ताड़ी के उत्पादन एवं बिक्री में पारंपरिक रूप से जुड़े अत्यंत निर्धन परिवार एवं अनुसूचित जाति, जनजाति तथा अन्य समुदाय के लक्षित अत्यंत निर्धन परिवार के सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण के लिए शुरू की गयी योजना से जुड़कर मीनापुर की 240 निर्धनतम महिलाओं ने लक्षित आर्थिक स्वावलंबन हासिल कर सरकार व प्रशासन का ध्यान अपनी ओर खींचा। इन महिलाओं की सफलता को प्रशासन ने अभी हाल में ‘मिशन स्वावलंबन उत्सव’ के रूप में मनाया है। आज चंपारण से लेकर मिथिलांचल तक की महिलाएं सरकारी कार्यक्रमों एवं एनजीओ आदि से जुड़कर अपने कौशल को बढ़ा रही हैं एवं आजीविका के लिए आर्थिक आजादी हासिल करने को आगे आ रही हैं। ये महिलाएं चूड़ी-लहठी, अलता, नेल पॉलिश, पापड़-तिलौरी, मेथौड़ी, डेयरी उद्योग, अचार-मुरब्बा, मशरूम, नकदी फसल, जैविक खेती, जैविक खाद आदि के उत्पादन के जरिए आर्थिक उन्नति की कहानी लिख रही हैं। अपने बच्चों की परवरिश व पोषण ही नहीं, बल्कि बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाने में दिलचस्पी भी दिखा रही हैं। इनकी पुरुषों पर से निर्भरता धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। आज वे अपने पति या घरवालों को स्वयं सहायता समूह से कम ब्याज दर पर तत्काल ऋण उपलब्ध करके खुद दुकानदारी में लग जाती हैं। सब्जी बेचने से लेकर परचून-किराना दुकान तक चलाने में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले आगे बढ़ रही हैं। दूसरी ओर महिलाएं रोजगार के साथ-साथ लिखना-पढ़ना और ट्यूशन-कोचिंग से भी आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर हैं।

ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो आधी आबादी के आर्थिक स्वावलंबन की कहानी कहती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2020 के मुताबिक, बिहार में वर्ष 2015-16 में 26.4 फीसदी महिलाओं के पास अपना बैंक खाता था। जबकि वर्ष 2020 में यह आंकड़ा 76.7 फीसदी तक पहुंच गया। इन आंकड़ों से यह साबित होता है कि महिलाओं के पास पैसे अर्जित हो रहे हैं। बेतिया, मोतिहारी, सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर समेत अन्य शहरों में चल रहे बिग बाजार, शॉपिंग मॉल, शोरूम आदि के इंट्री गेट से लेकर काउंटर तक में आपको लड़कियां एवं शादी-शुदा महिलाएं सुबह से शाम तक ड्यूटी करते मिल जाएंगी। स्कूटी पर सवार होकर जब लड़कियां-महिलाएं अपने कार्यस्थल की ओर जाती दिखती हैं, तो एक बड़े बदलाव का नजारा सामने से गुजरता महसूस होता है। लिहाजा, उत्तर बिहार ही क्या पूरे सूबे और खासकर ग्रामीण भारत भी महिलाओं के आर्थिक स्वावलंबन की गाथा लिख रहा है।

नोट: मुजफ्फरपुर में मशरूम उत्पादन से संबंधित जानकारी के लिए संपर्क करें :7256060765