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सत्य की सूक्ति

 

अमरेन्द्र कुमार

सत्य सहा जब

जाए ना तो,

सत्य की

पहचान कर।

क्योंकि

काल चक्र की

साया में,

खुशी सितम

छत्रछाया में।

कालांतर में

घटित होगा,

स्वहित होगा या

अहित होगा।

और

दो राहें होती

हर योजन के,

हर सोच के

दो ही मूल।

एक सोच 

माया से निकले,

वैराग्य दूजा

कभी न भूल।

माया सोच

मय मयस्सर करा दे,

वैराग्य सोच

करा दे मुक्त।

तो.....

हे मालिक ! 

उपकार कर,

दया कर या

दुलार कर।

माया-नियति को

मन में मरण दो,

वैराग्य नियत को

कर्म में भर दो।

तब

कुछ भी होगा 

अच्छा होगा,

जग में सारा

सच्चा होगा।

आज खातिर 

इतनी ही उक्ति,

स्मरण रहे

यह सत्य की सूक्ति।

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