प्रियंका साहू
मुजफ्फरपुर, बिहार
अगर बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटलीकरण तक महिलाओं की पहुंच की बात की जाए तो यह आंकड़ा बहुत कम है. हालांकि महिलाओं व किशोरियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए बिहार सरकार की अलग-अलग योजनाओं पर काम चल रहा है। सरकार द्वारा चलाई जा रही महत्वपूर्ण योजना है- बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना, सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, सुरक्षित मातृत्व सुमन योजना, फ्री सिलाई मशीन योजना, प्रधानमंत्री समर्थ योजना आदि हैं. इन योजनाओं का लाभ ग्रामीण परिवेश से आने वाली किशोरियों की जिंदगी बेहतर करना है। लेकिन अभी भी कुछ गांव में महिलाओं व किशोरियों के बीच बहुत सारी चीजों को लेकर जागरूकता का अभाव है। उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी तक नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता एक ऐसा विषय है जिससे अनगिनत महिलाओं और किशोरियों के पास जानकारियां ही नहीं हैं।
इसका एक उदाहरण बिहार के प्रमुख शहर मुजफ्फरपुर जिले से करीब 13 किमी दूर मुशहरी प्रखंड स्थित मनिकपुर गांव के मानिकचंद टोला (दलित बस्ती) है. जहां की महिलाओं व किशोरियों के डिजिटल साक्षरता से जुड़ी चौका देने वाले तथ्य सामने आए हैं। गांव की 18 वर्षीय सुमन हैरत से पूछती है कि डिजिटल साक्षरता क्या होता है? जब उससे पूछा गया कि क्या आप एंड्राइड मोबाइल के बारे में जानती हैं? और क्या आप मोबाइल का उपयोग करती हैं? तो उसने कहा कि हम सिर्फ बटन वाले मोबाइल के बारे में जानते हैं, जिससे केवल बात होती है. वहीं कई महिलाओं का कहना है कि पति उन्हें बटन वाला पुराना मोबाइल देते हैं. जिसमें पैसा भी नहीं डलवाते हैं.
वहीं किशोरियों का कहना है कि उनके माता-पिता मोबाइल उन्हें दो कारणों से नहीं देते हैं। पहला कि उनकी इतनीआमदनी नहीं है कि वह उन्हें ऐसे फोन दिला सकें और दूसरी बात वह यह सोचते हैं कि ऐसे फोन के इस्तेमाल से लड़कियां बिगड़ जाएंगी तो समाज में उनकी इज़्ज़त चली जाएगी। इस बात पर जब उनसे पूछा गया कि क्या आप यही सोच रख करअपने बेटे को भी मोबाइल नहीं देते होंगे? तो उनका कहना था कि कि लड़के अगर कुछ गलत भी करते हैं तो कोई बड़ी बात नहीं। गांव के लोगों का कहना है कि हम गरीब हैं. मालिक के जमीन पर बसे होने के कारण उनके यहां काम करने पर पुरुष को 250₹ जबकि बाहर में वही काम करने पर 400₹ मिलता है। अगर बात करें महिलाओं की, तो उन्हें मात्र 100₹ ही मजदूरी मिलती है। जबकि दूसरी जगह काम करने पर 200₹ तक मिलते हैं। ऐसे में हम अपना और अपने बच्चों का पेट पाले या उन्हें महंगी मोबाइल खरीद कर दें।
इस बस्ती के करीब ही रजवाड़ा भगवानपुर पंचायत की मुखिया के पति रघुवीर प्रसाद यादव बताते हैं कि पंचायत में लगभग 40 से 50 लड़के एवं 18 से 20 लड़कियां हैं. इनमें से सभी लड़कों के पास आधुनिक फीचर वाले मोबाइल हैं. इनमें से कुछ ही लड़के उसका इस्तेमाल पढ़ाई के लिए करते हैं। बाकि लड़के दिन भर इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर व्यस्त रहते हैं. जबकि केवल 2 लड़कियों को ही कंप्यूटर का ज्ञान है। वह कहते हैं कि किशोरियों को डिजिटल रूप से साक्षर करने के लिए बहुत प्रयास किया जाता है, परंतु उनके माता-पिता की मंशा ही नहीं कि उनकी बेटियां डिजिटल साक्षर हों।
Writer : Priyanka Sahu



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