ध्वजा बाबू को 1908 में खुदीराम बोस की फांसी ने इस कदर व्यथित किया कि महज 15 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संदेश गांव-गांव पहुंचाने लगे। इससे वे अंग्रेजों की नजर में आ गए।
रिपोर्ट
फूलदेव पटेल
मुजफ्फरपुर। ( 8 फरवरी) खादी आंदोलन के वाहक ध्वजा बाबू की पुण्यतिथि पर कन्हौली खादी भंडार में श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया। वक्ताओं ने बताया कि मुजफ्फरपुर के औराई प्रखंड के रामखेतारी गांव में 19 जुलाई, 1893 को किसान परिवार में जन्मे ध्वजा बाबू को 1908 में खुदीराम बोस की फांसी ने इस कदर व्यथित किया कि महज 15 साल की उम्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े संदेश गांव-गांव पहुंचाने लगे। इससे वे अंग्रेजों की नजर में आ गए। कॉलेज की लाइब्रेरी में छापेमारी कर सभी किताबें जब्त कर ली गईं। कई साथी भी पकड़े गए, हालांकि ध्वजा बाबू बच निकले।पुलिस की दबिश बढ़ी तो वे भागलपुर निकल गए। वहां नाथनगर और गंगा किनारे ठिकाना बनाया, लेकिन जल्द ही नाथनगर में पुलिस ने उनके साथियों को पकड़ लिया। इस बार भी बच निकले और मुंगेर पहुंच गए। मुंगेर में श्मशान में बैठक करते पकड़े गए। वहां से छूटने के बाद पटना गए और वहां एक अंग्रेजी अखबार में 25 रुपये मासिक पर नौकरी कर ली।
1917 में चंपारण यात्रा के दौरान गांधीजी के मुजफ्फरपुर आगमन पर ध्वजा बाबू स्वागत में स्टेशन पर मौजूद रहे। उनकी बग्घी के साथ एलएस कॉलेज पहुंचने वालों में भी शामिल रहे। 1919 में पूरी तरह गांधीवादी हो गए और आंदोलन के लिए खादी को हथियार बनाया। इसकी शुरुआत सारण से की। साथी रामविनोद सिंह के साथ वहीं के मलखाचक में गांधी कुटीर की स्थापना की। बाद में खादी ग्रामोद्योग बनने के बाद जेबी कृपलानी ने उन्हें गांधी आश्रम, मुजफ्फरपुर बुला लिया था।
ध्वजा बाबू के पौत्र संजीव साहू कहते हैं कि वे जीवनभर गांधीजी के आदर्शों पर चलते रहे। इसी के चलते 1952 में लोकसभा चुनाव लडऩे का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। 1956 में उन्हें अखिल भारतीय खादी आयोग का संस्थापक सदस्य बनाया गया था। मुजफ्फरपुर में आठ फरवरी, 1987 को उनका देहावसान हो गया था। समारोह में कवि संजय पंकज,अनिल कुमार अनल, श्यामल श्रीवास्तव, कुंदन कुमार, लक्षणदेव बाबू,अरुण बाबू,संतावना भारती,वंदना शर्मा,नदीम खान एवं सरला श्रीवास सामाजिक सांस्कृतिक शोध संस्थान के संयोजक लोक कलाकार शामिल मौजूद थे ।


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