मेरा नाम कांता मुकेश डामोर है। मै राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के आनंदपुरी ब्लॉक में सेरानगला गांव की हूं और एक सामुदायिक सहजकर्ता के रूप में काम करती हूं। मैं दो बच्चों की मां हूं और कई तरह की जिम्मेदारियां उठाती हूं। मैने बीए बीएड स्नातक तक पढ़ाई की और मैं एक मां, एक गृहिणी और अपने परिवार की कर्ताधर्ता हू ! आनंदपुरी दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का एक ब्लाँक जो पहाड़ियों से घिरा हुआ है और ज्यादा किसान वर्षा आधारित सीमांत किसान हैं जो ज्यादा तर भील आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं - मुकेश डामोर
किसान मुकेश डामोर की जुबानी अपनी कहानी
रिपोर्ट
विकास परसराम मेश्राम
vikasmeshram04@gmail.com
राजस्थान । बचपन से ही पढ़ाई और खेती साथ साथ करनेवाली कांता डामोर कहती हैं की पिछले बीस का में खेती में बदलाव हो रहा है और दिन ब दिन किसानों को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा रहा है आगे कांता बताती हैं कि किसानों सिंमात होने से और पर्याप्त सिंचाई की सुविधा नहीं होने से इस क्षेत्र में कृषि संकट यहां की ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करता है। रसायनों के अत्यधिक उपयोग, नकदी फसल, भूजल के अत्यधिक दोहन और जंगलों के क्षरण के कारण यह संकट पिछले कुछ वर्षों में जटिल हो गया है।
यह वागधारा संस्था विगत 23 साल से इस जनजातीय क्षेत्र के पास जलवायु परिवर्तन के कारण स्थायी टिकाऊ आजीविका एवं बच्चों के लिए शिक्षा स्वास्थ्य,अधिकारों और भागीदारी सुनिश्चित करती हैं और उसके लिए यहाँ जनजातिय सामुदायिक संगठनो का गठन स्वराज हेतु निर्माण के लिए एवं भावी पीढ़ी और स्थानीय तौर तरीके, ज्ञान और प्रक्रियाओं को समेकित करना, जो टिकाऊ आजीविका और स्वराज की अवधारणा व्यापक रूप से स्थापित करने हेतु प्रयासरत हैं और सुनिश्चित करता है!
मैं पिछले चार साल से वागधारा संस्था में सामुदायिक सहजकर्ता के रूप में कार्यरत हु मेरी भूमिका मेरे समुदाय को उनकी आजीविका में सुधार करने में मदद करना है। इसके अलावा मैं जल जंगल जमीन बीज जानवर, एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए सामूहिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में समुदाय – विशेष रूप से महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने की दिशा में भी काम करती हूं।
अपनी दैनिक गतिविधि के बारे में कांता डामोर बताती हैं कि सुबह 5.00 बजे: जागने के बाद, मेरे सुबह के कुछ घंटे घर के कामों में लगते हैं गोबर निकालना । बर्तन साफ करने,सुबह खाना तैयार करने और बच्चों को स्कूल भेजने जैसे काम निपटाने के बाद मैं घर की सफाई करती हूं। इन सब कामों के बाद में रंगोली बनाती हूं और पूजा करती हूं।
सुबह 9.30 बजे: मैं विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और ऐसे अन्य प्रावधानों के बारे में जानकारी साझा करने के लिए मै अपना 17 गावो में काम लिए निकल जाती हूं। मैं अपने समुदाय के सदस्यों के साथ समूहों या बैठकों में भाग लेती हुई बातचीत करती हूं। धरातल पर हमारे संस्था ने ग्राम विकास के लिए ग्राम स्वराज समूह, बाल विकास हेतु बाल स्वराज समूह और ब्लॉक स्तरीय कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन गठित किए यह इन संगठनों में लोकतंत्रीय प्रक्रिया से कामकाज चलता है मै वहा जानकारी साझा करती हु उन योजनाओं और प्रावधानों की होती है जो समुदाय के लोगों के लिए लाभदायक होती हैं।
हाल ही में मैंने अपने गांव मुख्यमंत्री महंगाई राहत शिविर का आयोजन किया था मैंने इस शिबिर में अपने समुदाय के 400 लोगों को विविध सरकारी योजनाओं में जुडवाया और अपने लोगों को पैन कार्ड के लिए आवेदन करवाये और अपने बैंक खातों को आधार कार्ड से लिंक करवाया। ये सभी प्रक्रियाएं बहुत जटिल होती हैं और इनके लिए कई तरह के दस्तावेजों की जरूरत होती है। लोगों को कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और नियमित रूप से उसकी स्थिति का पता लगाना पड़ता है। मैं उन लोगों के लिए ये सारे काम करती हूं जो वे खुद नहीं कर सकते। हमारी समुदाय के संगठन ग्राम स्वराज समूह, कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन के किसानों से मिलने और उनकी जरूरत के अनुसार जैविक खाद जैविक कीटनाशक बनाने में उनकी मदद के लिए भी करती हूं । मैं ये सारे काम समुदाय के विकास के लिए करती हूं ।
2018 से कर रही हूं, तब से जब पहली बार वागधारा संस्था के तहत मैं अपने गांव की सामुदायिक सहजकर्ता नियुक्त हुई थी। मैंने जैविक खेती पर संस्था के कई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया और सीखा कि जैविक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग के तरीकों के बारे में कैसे बताया जाता है। शुरुआत में मेरे प्रदर्शनों का विरोध किया गया और समुदाय ने उनका मजाक भी उड़ाया। लेकिन जब सरदार कटारा नाम के एक किसान ने इन तरीकों को अपनाने में रुचि दिखाई और डेमो देने के लिए कहा तो उसके बाद से दूसरे लोगों का नज़रिया भी बदलने लगा।मैं खेती के टिकाऊ, जैविक तरीकों को अपनाने के लिए गांव में अधिक से अधिक किसानों को प्रोत्साहित करने का प्रयास करती हूं।मैने किसानों को राजस्थान सरकार द्वारा चलाई जा रही कृषि योजनाएं लोगों को बताया और लाभान्वित किया जैविक खेती करने वाले किसानों के समूह बनाकर उसका सहभागी गारंटी प्रणाली से पंजीकरण करवा लिया। ये सभी किसान अब जैविक खेती करते हैं। इन किसानों को वागधारा ने कुछ उपकरण जैसे पंप, जैविक कीटनाशक बनाने के लिए एक टैंक दिया है।
खेती के स्थाई तरीकों में मेरी बहुत गहरी रुचि है, और मैं खेती के टिकाऊ, जैविक तरीकों को अपनाने के लिए गांव में अधिक से अधिक किसानों को प्रोत्साहित करने का प्रयास करती हूं। चूंकि आनंदपुरी सूखा-प्रभावित इलाका है इसलिए हमें पानी के प्रबंधन के बारे में भी सोचना पड़ता है। पिछले तीन वर्षों से, मैं जल मिट्टी संसाधनों के प्रबंधन के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए समुदाय के सदस्यों के साथ भूजल गतिविधियों और फसल के लिए वर्षा जल संचयन पर काम कर रहें है हमारे सुझाव मार्गदर्शन से कुछ किसानों ने ड्रिप सिंचाई को अपनाया है। वहीं कुछ अन्य किसान या तो कम सिंचाई वाली फसलों की खेती करने लगे हैं या फिर बहुत कम क्षेत्रफल में अधिक सिंचाई वाली फसलों को बोने लगे हैं।
दोपहर 2 .30 बजे: मैं घर आकर दोपहर का खाना खाती हूं। उसके बाद मुझे रात के खाने की तैयारी शुरू करनी पड़ती है और साथ ही साथ घर के अन्य काम भी निपटा ती हूं।
शाम 6 बजे: आमतौर पर, शाम का समय मैं समुदाय की महिलाओं के साथ बिताती हूं। इन महिला-सभाओं में हम महिलाओं की समस्याओं के साथ ही गांव की अन्य बड़ी समस्याओं पर बात करते हैं। ऐसी जगहें बहुत अधिक महत्वपूर्ण होती हैं। इन जगहों पर महिलाओं को अपनी उन समस्याओं के बारे में बताने का मौका मिलता है जिसके बारे में शायद वे बाकी जगहों पर बात नहीं कर पाती हैं या फिर करती भी हैं तो उन बातों को अनसुना कर दिया जाता है। हम इस पर भी बात करते हैं कि कैसे इन मुद्दों को ग्राम सभा में उठाया जाए।
मैंने जनवरी 2018 अपने पड़ोसियों की मदद से अपना एसएचजी बनाने का फ़ैसला किया
मैंने पहली बार एसएचजी के तहत महिलाओं के साथ काम करना शुरू किया था। पांच साल पहले मैं नहीं जानती थी कि स्वयं-सहायता समूह क्या है। मेरे परिवार ने मुझे एसएचजी में शामिल होने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिए कि इसका हिस्सा बनने का मतलब था मीटिंग के लिए घर से बाहर जाना, जिनका आयोजन कभी-कभी रात के समय भी किया जाता था। जिज्ञासावश मैंने अपनी परिचित महिलाओं के एक समूह से बातचीत की। ये महिलाएं एसएचजी के माध्यम से पैसों की बचत करती थीं। चूंकि उनके समूह में अब जगह नहीं थी इसलिए उन लोगों ने मुझे अपना समूह बनाने की सलाह दी। और अपना समूह बनाया शुरुआत में मैं घर-घर जाकर महिलाओं को प्रति माह मात्र 100 रुपए की बचत करने के लिए प्रोत्साहित करती थी। हमने सिर्फ़ यही काम किया – पैसे बचाए। धीरे-धीरे मैंने खातों के प्रबंधन का काम भी सीखा और समूह ने निर्विरोध रूप से मुझे इसका अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। मैं चाहती हूं कि हमारी की महिलाएं समूह के माध्यम से आत्मनिर्भर बनें और गांव के विकास के लिए मिलकर काम करें। | अपने भविष्य की योजनाओं के बारे में कांता डामोर कहती हैं की अब हम गांव में देशी बीजों का संरक्षण संवर्धन एवं आदान प्रदान के लिए सामुदायिक बीज प्रबंधन केंद्र स्थापित करना चाहते हैं ताकि कोई भी किसान बीज के लिए बाजार पर निर्भर नहीं रहे क्यों की देशी स्थानीय बीज बचेंगे तो खेती बचेंगी और हमारी महिला जैविक खेती के तरीकों को अपनाने के इच्छुक हैं।मैं महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करना चाहती हूं ताकि उनके पास साल भर काम उपलब्ध रहे।
मैं भील आदिवासी समुदाय से हूं और परंपरागत रूप से हमारी महिलाओं को अपने घरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं होती है। लेकिन अब मेरे समुदाय की कई महिलाएं विभिन्न समूह एवं वागधारा गठित ग्राम स्वराज समूह की सदस्य हैं और ग्राम सभाओं में सक्रियता से भाग लेती हैं। मैं उन्हें प्रोत्साहित करती हूं ताकि वे अपनी आजीविका के लिए उद्यम शुरू करें और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। मैंने कम से कम चार से पांच महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने और चलाने में मदद की है।
आज की तारीख में वे गांव के कई महिलाओं के पास उनका अपना बैंक खाता नहीं है। इसलिए मैंने बैंक में खाता खुलवाने में उनकी मदद की ताकि वे अपनी बचत को बैंक में रख सकें।
हालांकि यह एक मुश्किल यात्रा थी लेकिन मैंने हार नहीं मानी और लगातार अपना काम करती रही। मैं चाहती हूं कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और गांव के विकास के लिए मिलकर काम करें। मैं महिलाओं के लिए स्थायी आजीविका के अवसर पैदा करना चाहती हूं ताकि उनके पास साल भर काम उपलब्ध रहे।
नोट : पूरी स्टोरी की सामग्री के लिए लेखक उत्तरदायी हैं।

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