जालोर, राजस्थान
आज़ादी के सात दशकों बाद भी देश में कुछ जातियां, समुदाय और वर्ग ऐसे हैं जो आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैं. जिन्हें आज भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जो समाज के मुख्यधारा से कटे हुए हैं. लेकिन विधवाओं का वर्ग ऐसा है जो सभी धर्मों, जातियों और समुदायों में मौजूद हैं. अफ़सोस की बात यह है कि इस वर्ग को स्वयं समाज द्वारा सभी प्रकार की सुविधाओं से वंचित कर बहिष्कृत जीवन जीने पर मजबूर कर दिया जाता है. इस वर्ग के कल्याण के उद्देश्य से हर साल 23 जून को अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस मनाया जाता है. यह दिवस विधवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने, उनके अधिकारों और कल्याण के प्रति समर्पित है. इसके माध्यम से विधवाओं के सामने आने वाली सामाजिक, आर्थिक और कानूनी कठिनाइयों को उजागर करना और इन मुद्दों को हल करने के लिए कार्रवाई को बढ़ावा देना है. अधिकांश विधवाएं विरासत के अधिकारों से वंचित हैं और वे यौन शोषण या हिंसा की शिकार होती हैं. भारतीय विधवाएं अभी भी अतीत के मानदंडों, परंपराओं और सांस्कृतिक उपेक्षाओं से पीड़ित हैं. विधवाओं द्वारा सामना की जाने वाली दो आम समस्याएं- सामाजिक स्थिति का नुकसान और वित्तीय स्थिरता में कमी है. विधवाओं को अपने जीवन के दौरान आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है. जिसके कारण वे अपने बच्चों को शिक्षा के लिए स्कूल भेजने के बजाय काम पर भेजने के लिए बाध्य हैं. राजस्थान के जालोर जिले के बागरा कस्बे की विधवाओं को कुछ ऐसे ही बुरे हालात से गुजरना पड़ रहा हैं. कस्बे की रहने वाली सीता देवी के पति की जब दस साल पहले सड़क हादसे में मौत हुई थी, तब उनके बच्चों की उम्र पांच से छह साल के बीच थी. पति की असामयिक मृत्यु के कारण उन्हें अपने पुत्र का स्कूली दाखिला निरस्त कर उसे पैतृक कार्य में लगाना पड़ा. सीता देवी से जब विधवाओं के कल्याण के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं व उनसे मिलने वाले लाभ के बारे में पूछने पर वह कहती हैं, 'मुझे सरकार की ओर से विधवा पेंशन के नाम पर मात्र 750 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा किसी प्रकार की कोई मदद नहीं मिल रही है. 750 रुपये में घर चलाना संभव नहीं है. इस कारण मैंने मजबूरीवश अपने बड़े बेटे का स्कूल छुड़वाकर उसे काम पर लगा दिया और खुद भी मजदूरी कर रही हूँ. अनपढ़ होने के कारण हमें विधवा कल्याण की दिशा में सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं की कोई जानकारी नहीं मिलती और न ही इस बारे में कोई बताता है.'
इसी तरह पिछले साल कस्बे की एक अन्य महिला सविता देवी के पति का भी सड़क दुर्घटना में आकस्मिक निधन हो जाने के कारण परिवार के भरण-पोषण के लिए उन्हें भी अपने तेरह साल के बड़े बेटे का स्कूल छुड़वाकर पैसे कमाने के लिए शहर भेजना पड़ा. 'शिक्षा से वंचित रखकर बेटे पर कम उम्र में घर की जिम्मेदारी डाल देना कितना ठीक है?' इस प्रश्न के जवाब में वह कहती हैं, 'हम भी नहीं चाहते कि बेटा पढ़ाई की उम्र में पैसा कमाए, लेकिन मजबूरी इंसान से क्या कुछ नहीं करवाती. घर पर दो बेटियां और एक छोटा लड़का भी है. कुल मिलाकर पांच लोगों की दैनिक जरूरतों का खर्च. बेटियां बड़ी हैं इसलिए उन्हें काम पर भेज नहीं सकते और छोटा बेटा अभी स्कूल में पढ रहा है.' सरकार की ओर से क्या लाभ मिल रहा है? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं, 'फिलहाल तो पेंशन के रूप में 750 रुपये ही मिलते हैं. वे माह के बीच या आखिर में खाते में जमा होते हैं. इसके अतिरिक्त किसी और तरह की कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है. हमने बीपीएल में नाम जुड़वाने की कोशिश की, पर बहुत दौड़-भाग के बाद भी नतीजा सिफर ही रहा. मैं खुद भी मजदूरी करती हूं. दो सौ रुपये दिन के मिल जाते हैं. जिससे घर चलाने में आसानी होती है. बेटा अभी शहर में दुकान पर है और काम सीख रहा है. इसलिए फिलहाल घर का खर्च तो मैं ही चला रही हूं.'
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