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तारे और हमारे सपने

 

अंजली भारती 

मुजफ्फरपुरबिहार

आसमान में तारे अनेक जैसे हमारे सपने अनेक,

कभी खिड़कियों से तो कभी छत के मुंडेरों से,

देखा तुमको अनेक बारअनिमेष,

अंधेरी रातों में तुम चमकते मोती जैसे,

मैं अथक दौड़ी चली जातीआसमान की ऊंचाइयों में,

हवाओं में खोकर सारी दुनिया भूल जाती मैं

जब निगाहें तुम पे जातीठहर सी जाती मैं,

सपनों में जब छा जाती मोटी अंधेरी रातें,

प्रभुतुम रोज आते हो मन में उम्मीदों को जगाने

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