दिया आर्या
उम्र - 17
असों, उत्तराखंड
जब भी मेरी कलम थक कर रुकी।
तब उसमें तुमने ही उसमे जोश, जुनून और साहस भरा।।
न जाने कैसे मां, इन बिखरी हुई कविताओं को तुमने किताबों तक पहुंचा दिया।
असों, उत्तराखंड
जब भी मेरी कलम थक कर रुकी।
तब उसमें तुमने ही उसमे जोश, जुनून और साहस भरा।।
न जाने कैसे मां, इन बिखरी हुई कविताओं को तुमने किताबों तक पहुंचा दिया।
आज भी याद है मुझे वो ठंड की कंपकपाती रातें।
जब तुम मेरे सिरहाने तकियों की जगह कविताओं की डायरी रखा करती थी।
और मेरी लिखी हुई कविताओं को घंटों टकटकी लगाए निहारा करती थी।
शायद तुम मुझे इन कविताओं का ही आदि बनाना चाहती थी।
मुझे हर दुख और दर्द से परे रखना चाहती थी।
मां तुम मुझे उस ऊंचे मुकाम तक पहुंचाना चाहती थी।
जहां तक शायद मेरी सोच भी न पहुंची हो।
मां तुम ही मेरी मीत हो, मेरे जीवन में कामयाबी भरा गीत हो।।
सच कहूं तो मां, तुम ही मेरी जीत हो।।
और मेरी लिखी हुई कविताओं को घंटों टकटकी लगाए निहारा करती थी।
शायद तुम मुझे इन कविताओं का ही आदि बनाना चाहती थी।
मुझे हर दुख और दर्द से परे रखना चाहती थी।
मां तुम मुझे उस ऊंचे मुकाम तक पहुंचाना चाहती थी।
जहां तक शायद मेरी सोच भी न पहुंची हो।
मां तुम ही मेरी मीत हो, मेरे जीवन में कामयाबी भरा गीत हो।।
सच कहूं तो मां, तुम ही मेरी जीत हो।।
(चरखा फीचर)

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