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आदिवासियों की आत्मनिर्भरता की ओर वागधारा

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विकास मेश्राम

(vikasmeshram04@gmail.com)

राजस्थान। वागधारा देश के कुछ स्वयंसेवी संगठनों में से एक है जिसने अपना काम ग्रामीण जनजातीय समुदायों की बढ़ती आत्मनिर्भरता पर आधारित स्वराज स्व-शासन के दृष्टिकोण पर केंद्रित किया है। इसमें तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के त्रि-जंक्शन क्षेत्र में लगभग दो दशकों से इस दृष्टिकोण के साथ काम किया है, जिसमें सबसे अधिक एकाग्रता दक्षिण राजस्थान के जिले में है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो आदिवासी समुदायों, विशेषकर भील आदिवासियों की भारी सघनता के लिए जाना जाता है। ये प्रयास अब तक लगभग 1040 गांवों में फैले एक लाख घरों तक पहुंच चुके हैं । ग्रामीण समुदायों की स्वराज, ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भरता की अवधारणा उनकी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताओं और पहचानों के साथ आदिवासी समुदायों के संदर्भ में एक विशेष महत्व रखती हैं। स्वराज को केन्द्रित रखते हुए ,आदिवासी और किसान समुदायों के पास जलवायु संवेदनशील टिकाऊ आजीविका, खाद्य और पोषण सुरक्षा , सुनिश्चित बाल अधिकार और बेहतर शासन प्रणाली सुनिश्चित करना है । 

आदिवासियों की आत्मनिर्भरता की ओर वागधारा

वागधारा ऐसी ही समझ के साथ काम कर रही है। स्वराज की इस समझ - वैचारिक रूप से और साथ ही कार्यान्वयन के संदर्भ में - इसके तीन बुनियादी कार्यक्रम - सच्ची खेती, सच्चा बचपन और सच्चा स्वराज - में समाहित है। राजस्थान ,मध्यप्रदेश और गुजरात राज्यों के आदिवासी क्षेत्र में स्वदेसी तकनीक ,पारम्परिक ज्ञान समझ और प्रथाओं को एकीकृत करके नई पीढ़ी के साथ लिंग – समानता के आधार पर सशक्त सगठन बनाना ,जिससे समुदाय में टिकाऊ आजीविका और बचपन के अहसास के साथ स्वराज महत्व को वृहद स्तर पर स्थापित किया जा सके ।

सच्ची खेती भील समुदायों की पारंपरिक प्रथाओं की ताकत को समझने और उन्हें मजबूत करने पर आधारित है। इनमें हलमा जिसमें श्रमिकों को काम पर रखने के बजाय किसान एक-दूसरे के कार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं और हांगडी खेती जो मिश्रित कृषि प्रणाली जो क्षेत्र की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित हुई है की प्रथाएं शामिल हैं। वागधारा का प्रयास इन प्रणालियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ उनकी रक्षा करना भी रहा है।

वागधारा के शोध से पता चला है कि हाल के दिनों में बाहरी ताकतों के कारण जैव विविधता में हुए क्षरण के बावजूद, जंगलों से संग्रह के माध्यम से गांवों में लगभग 100 प्रकार के खाद्य पदार्थ उगाए जा रहे थे और उपलब्ध थे। इस बात की परवाह किए बिना या समझे बिना आधुनिक बाजारू सभ्यताओं ऐसे गांवों को पिछड़ा कहा जाने लगा है और मोनोकल्चर खेती वाले इलाकों को सबसे उन्नत बताया जाने लगा।

वागधारा ने पारंपरिक अच्छी प्रथाओं और प्रणालियों में समुदाय के विश्वास को मजबूत करने के लिए काम किया, जबकि जैविक खाद तैयार करने के तरीकों के माध्यम से उन्हें और बेहतर बनाने के अवसर प्रदान किए, नए बगीचे बनाने के लिए पौधे उपलब्ध कराए और उनमें से स्वयंसेवकों और सुविधाकर्ताओं का एक संगठनात्मक आधार तैयार किया है ।जनजातीय समुदायों में पहले से ही मृदा संरक्षण अभ्यास, पौधों को कीटों और बीमारियों से बचाने, बीज संरक्षण और खाद्य भंडारण/संरक्षण प्रथाओं में समृद्ध परंपराएं थीं। वाग्धारा ने उनकी बेहतर और व्यापक समझ स्थापित करने के साथ-साथ कुछ सुधारों का सुझाव और प्रस्ताव देने में मदद की।

वागधारा का दृष्टिकोण सच्ची खेती कार्यक्रम के माध्यम से जैविक खेती का समर्थन कर रहा है। जबकि जनजातीय समुदाय के बहुत सारे किसान इसे पूरी तरह से अपनाते हैं, क्योंकि इसका मतलब केवल हाल के दिनों में खोई हुई कृषि पर्यावरण प्रणाली की ताकत को वापस पाना है । जैविक खेती के साथ महत्वपूर्ण मिट्टी और जल संरक्षण उपाय भी शामिल हैं। समग्र परिणाम से मिट्टी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा, और मिट्टी की नमी बनाए रखने की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। अधिकतम स्वदेशी प्रजातियों के पेड़ों के रोपण पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है, जो बगीचों में और फसलों के बीच में भी पाए जा सकते हैं, जो मिट्टी और जल संरक्षण के साथ-साथ कार्बन अवशोषण में भी योगदान करते हैं। फलों के पेड़ों के अलावा, अन्य पेड़ भी उगाए जाते हैं जो चारे, ईंधन और छोटी लकड़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिए उपयोगी होते हैं, साथ ही बांस भी उगाए जाते हैं, जो कठिन समय में नकदी की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। जो उगाया जाता है वह परिवार द्वारा खाए जाने वाली चीज़ से सबसे अधिक निकटता से जुड़ा होता है और उसका पोषण मूल्य अच्छा होता है। मवेशियों और बकरियों के अलावा, भैंसों को भी पाल रहे है, जिससे खेत स्तर पर दूध की आपूर्ति में वृद्धि होती है। भोजन के लिए बाजार पर निर्भरता कम हो गई है और अधिकांश खेतों में अब रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक खरीदने की कोई ज़रूरत नहीं है।

दूसरे, बाल शोषण की जांच करके, सभी बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करके, बाल पोषण में सुधार करके, निर्णय लेने में बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करके सच्चे बचपन की अवधारणा को साकार करने का प्रयास किया जाता है। पोषण में सुधार के लिए जैविक पोषण वाटिका हर घर में व्यापक रूप से बनाए गए हैं और इसके अलावा अधिक पौष्टिक व्यंजनों के लिए स्थानीय खाद्य पदार्थों का बेहतर उपयोग करने के लिए विशेष अभियान चलाए गए हैं, जिसका लक्ष्य माताओं और बच्चों को रखा गया है। गांवों में बाल अधिकार समितियों का गठन किया गया है और बचपन के स्तर पर लिंग भेदभाव को समाप्त करने के सक्रिय प्रयास किए गए हैं।

सच्चे लोकतंत्र की अवधारणा सामुदायिक जनजातीय संगठनों को मजबूत करने के साथ-साथ सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों, विशेष रूप से एमजी-नरेगा जैसे कार्यक्रमों का बेहतर उपयोग करने पर आधारित है, जो स्वराज के दृष्टिकोण और उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, नरेगा कार्य मिट्टी और जल संरक्षण कार्य में बहुत योगदान दे सकता है। समुदाय सूक्ष्म कार्यक्रम तैयार करने में तेजी से शामिल हो रहे हैं जो उनके लिए सहायक होने के साथ-साथ समुदाय की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी कार्यक्रमों के बेहतर कार्यान्वयन की सुविधा प्रदान करते हैं। ये प्रयास विभिन्न स्तरों पर स्वराज आधारित प्रगति पर केन्द्रित लोगों के संगठनो ,जिन्हें कृषि एव आदिवासी स्वराज स्वराज संगठन और किसान एव आदिवासी स्वराज मंच कहा जाता है । गावों में महिलाओ के सक्षम समूह उनके स्वयंसेवकों द्वारा आगे बढ़ाया गया है ।

समय-समय पर जनजातीय संप्रभुता सम्मेलन आयोजित किए गए हैं और स्थानीय स्तर पर नियमित रूप से स्वराज यात्राएं निकाली गई हैं, इसमे बांसवाड़ा से जयपुर पैदल स्वराज संवाद पदयात्रा भी की गई, इस प्रक्रिया में वाग्धारा के संदेश को एक व्यापक क्षेत्र में ले जाया गया और संवाद भी सरकार के साथ स्थापित किया गया। स्वराज की समझ के आधार पर वागधारा के ये प्रयास मध्य भारत के लगभग 1040 गांवों में आशा और रचनात्मक कार्य का स्रोत रहे हैं। (लेख में दी गई  सूचनाओं और सामग्रियों के लिए लेखक जिम्मेवार हैं।) ं




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