धीरज गुर्जर
जयपुर, राजस्थान
राजस्थान की राजधानी जयपुर के मोती डूंगरी इलाके में बसे गाड़िया लोहार समुदाय का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। कभी घुमंतू जीवन व्यतीत करने वाला यह समुदाय आज भी अपनी पहचान और अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत है। जीवन की कठिनाइयों के बावजूद इनकी जिजीविषा और उम्मीदें उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। समुदाय की 58 वर्षीय सुगना गाड़िया बताती हैं कि पहले उनके समुदाय के लोग कृषि के औज़ार बनाते थे, जिससे किसानों की जरूरतें पूरी होती थीं। पर समय के साथ मशीनों के आने से उनके औज़ारों की मांग खत्म हो गई और उनकी आजीविका छिन गई। अब परिवार चलाने के लिए उनके समुदाय के पुरुष दिहाड़ी मज़दूरी करने, रिक्शा चलाने या रद्दी बीनने पर मजबूर हैं।
ममता, जो 38 वर्ष की हैं, अपनी पीड़ा बताते हुए कहती हैं कि उनकी झुग्गियों के आसपास कोई शौचालय नहीं है। महिलाओं को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है, जिससे असुरक्षा बनी रहती है। मंजरी गाड़िया अपने पूर्वजों का इतिहास बताते हुए कहती हैं कि वे कभी महाराणा प्रताप की सेना के लिए हथियार बनाते थे। लेकिन आज उनकी पहचान केवल एक विस्थापित समुदाय की रह गई है। 28 वर्षीय यशोदा की आंखों में अपने पारंपरिक व्यवसाय को फिर से जीवित करने की आस झलकती है। वह कहती हैं, "अगर हमारे पास संसाधन होते, तो हम फिर से अपने पुश्तैनी काम को जारी रख सकते थे। लेकिन मशीनों से बने सस्ते औजारों के सामने हमारे बनाए औजारों की क्या कीमत होगी?" यह कहते हुए वह खुले आसमान की ओर देखती है, मानो कोई जवाब खोज रही हो।
समुदाय की महिलाओं का जीवन और भी कठिनाइयों से भरा हुआ है। घरेलू कार्यों के अलावा वे मजदूरी भी करती हैं, लेकिन उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम मजदूरी दी जाती है। महिलाएं अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए संघर्ष करती हैं और अधिकांश बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं। उचित चिकित्सा सुविधाएं न होने के कारण छोटे-मोटे रोग भी गंभीर रूप ले लेते हैं। समाज के अधिकांश सदस्य घुमंतू जीवन के कारण स्थायी निवास नहीं बना सके। जब वे किसी जगह बसने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें वहां से हटा दिया जाता है। उनके पास अपनी जमीन नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पाता। 45 वर्षीय रामस्वरूप लोहार कहते हैं, "हम जहां भी जाते हैं, हमें बाहरी समझा जाता है। कोई हमें स्थायी रूप से बसने नहीं देता, जबकि हम भी इंसान हैं और हमें भी एक घर की जरूरत है।"
समाज में अशिक्षा और निर्धनता के कारण युवा भी मजदूरी में लग जाते हैं और शिक्षा प्राप्त करने की उनकी इच्छा अधूरी रह जाती है। 18 वर्षीय रीना कहती हैं, "मुझे पढ़ना बहुत पसंद है, लेकिन स्कूल जाना हमारे लिए सपना ही है। घर में इतनी गरीबी है कि पढ़ाई का खर्च उठा पाना मुश्किल है।" हालांकि कठिनाइयों के बावजूद, इस समुदाय के लोग अपनी परंपरा और संस्कृति से जुड़े हुए हैं। उनकी भाषा और पहनावा अब भी उनके पूर्वजों की पहचान बनाए रखते हैं। त्योहारों और विशेष अवसरों पर वे पारंपरिक वेशभूषा में नाच-गाने का आयोजन करते हैं, जिससे उनके समाज में एकजुटता बनी रहती है।
60 वर्षीय किशनलाल कहते हैं, "हम मेहनती लोग हैं, हमें भी रोजगार का अवसर मिलना चाहिए। अगर हमें उचित साधन और थोड़ी मदद मिले, तो हम अपनी खोई हुई पहचान वापस पा सकते हैं।" दरअसल इस समुदाय की पीड़ा केवल आर्थिक तंगी तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व भी दांव पर लगा हुआ है। लेकिन इसके बावजूद, उनकी उम्मीदें जिंदा हैं। वे संघर्ष कर रहे हैं, अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य देने के लिए, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए। उनकी आंखों में सपने हैं, और उनके कदम कठिनाइयों के बावजूद आगे बढ़ने को तत्पर हैं।
(लेखक ग्राम गौरव संस्थान, करौली से जुड़े हैं)
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