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मन की गहराई : पहाड़ की बेटियों के सपने, संघर्ष और नई उड़ान

 

मन की गहराई : पहाड़ की बेटियों के सपने, संघर्ष और नई उड़ान
रितिका
उम्र-18 वर्ष
उत्तराखंड

शायद उसके जन्म पर कोई भूचाल आया होगा, लड़की हो गई गांव में, खबर अखबार में छाया होगा, उम्मीद लगाईं दादी का सपना तार-तार हुआ होगा, बस लड़की हो गई, इस बात का खौफ छाया होगा, उसके दुख पर भी मां ने प्यार से सर सहलाया होगा, पापा ने जीवन का कोई रास्ता समझाया होगा, आग की चिंगारी जैसे तुझे चमकना होगा, इस भेदभाव के खिलाफ खुद तुझे लड़ना होगा, तुझे अपनी मंज़िल तक पहुंचना होगा, अपनी उड़ान के लिए खुद पंख फैलाना होगा, दुनिया की बातें भूल कर आगे बढ़ना होगा, आपने साथ होने वाले हर अन्याय में बोलना होगा, अपने मन की इच्छाओं से जीना होगा, उम्मीद छोटी होगी, मगर बढ़ते रहना होगा


सरोज
चौरा कपकोट, बागेश्वर
उत्तराखंड

अपने सपनों वो को पूरा करना चाहती है, हर मंजिल को वह पा लेना चाहती है, समाज में इस कदर बदलाव लाना चाहती है, कि पुरानी सोचों को नया मोड़ दिखाना चाहती है, लड़कियों को इस कदर आगे रखना चाहती है, हर लड़की को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है, हर अधूरे सपनों को वह पूरा करना चाहती है।।


शिवानी
दाबू गाँव, गरूड़

मैं आई हूं अपना सपना लेकर, उम्मीदों की चाहत को लेकर, कुछ तो करना है अब मुझे भी, तोड़कर हर रूढ़िवादी बेड़ियों को, आगे बढ़ते जाना है मुझे भी, परिवार की एक उम्मीद बनकर, अपने सपनों को पूरा करना है, सुनो! मुझे भी डॉक्टर बनना है, ये मेरी चाहत और मेरा सपना है, करूंगी मैं एक दिन अपना सपना पूरा, बनूँ मैं उम्मीद की किरण और सहारा, आंखों में कुछ सपने और हौंसला है, सपनों की उड़ान और मंजिल को पाना है।।


काजल गोस्वामी
बागेश्वर, उत्तराखंड

पहाड़ों की पगडंडियों पर, नंगे पाँव चलती हैं, सवेरे सूरज संग उठकर, लकड़ियाँ बीनती हैं, जंगल की हर झाड़ी, हर डाली को जानती हैं, नन्हे हाथों से बोझ उठाकर, मुस्कुराकर लाती हैं, चूल्हा जलाना, रोटियाँ सेंकना, पानी भर लाना, माँ के संग खेतों में, धूप में भी पसीना बहाना, गुड़िया-खिलौनों का बचपन तो कहीं खो गया, गरीबी के संग जीवन, बस जिम्मेदारी हो गया, स्कूल की राहें मुश्किल, सपनों पर बोझ भारी, फिर भी आँखों में चमकती, सुनहरी एक चिंगारी, दिनभर कामों में डूबी, फिर भी दिल से हंसती, हर छोटी ख़ुशी को अपनी दुनिया समझ बैठती, ये गाँव की बेटियाँ, नदियों-झरनों सी प्यारी, संघर्षों में भी जीती, उम्मीदों की ये सवारी, एक दिन ये चुप्पी टूटेगी, सपनों को रंग मिलेगा, गाँव की हर बेटी का नाम, ऊँचाइयों तक जाएगा।

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