संघर्ष से संकल्प तक: आदिवासी किसान बादरसिंग फूलजी अड़ की प्रेरणादायक सफलता कहानी

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संघर्ष से संकल्प तक: आदिवासी किसान बादरसिंग फूलजी अड़ की प्रेरणादायक सफलता कहानी

राजस्थान के दक्षिणी अंचल में स्थित बांसवाड़ा जिला अपनी आदिवासी संस्कृति और सादगी भरे जीवन के लिए जाना जाता है। इसी जिले के सज्जनगढ़ तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत पाली बड़ी के सुखेड़ा गांव में रहने वाले एक साधारण आदिवासी किसान की कहानी आज सैकड़ों लोगों को प्रेरित कर रही है।

यह कहानी है बादरसिंग फूलजी अड़ की—एक ऐसे किसान की, जिसने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी।

संघर्ष से संकल्प तक: बादरसिंग फूलजी अड़ की जीवन यात्रा

परंपरागत खेती और रोज़मर्रा का संघर्ष

बादरसिंग का परिवार वर्षों से खेती पर निर्भर था। चार बीघा जमीन, एक भैंस, एक गाय और दो बैल—यही उनकी कुल संपत्ति थी। पत्नी और चार बच्चों के साथ इन्हीं साधनों में जीवन यापन करना आसान नहीं था।

दिन की शुरुआत तड़के होती और देर शाम तक खेतों में मेहनत चलती रहती। पत्नी भी घर और खेत—दोनों मोर्चों पर बराबर साथ देती थीं। इसके बावजूद परंपरागत खेती से साल में केवल एक ही फसल मिल पाती थी, जिससे आय बेहद सीमित रहती।

मौसम की अनिश्चितता, बाजार की जानकारी का अभाव और संसाधनों की कमी—इन सबके कारण कई बार घर चलाना भी मुश्किल हो जाता था। बच्चों की शिक्षा और भविष्य को लेकर बादरसिंग अक्सर चिंतित रहते थे।

ग्राम स्वराज समूह से जुड़कर बदली सोच

बादरसिंग के जीवन में बदलाव तब आया, जब उन्हें वागधारा संस्था द्वारा संचालित ग्राम स्वराज समूह के बारे में जानकारी मिली। संस्था के सामुदायिक सहजकर्ता ने उन्हें समझाया कि कैसे यह समूह किसानों को ज्ञान, प्रशिक्षण और आत्मनिर्भरता की राह दिखाता है।

शुरुआती संकोच के बाद बादरसिंग ने समूह से जुड़ने का फैसला किया—और यही निर्णय उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया।

प्रशिक्षण से मिला आत्मविश्वास

ग्राम स्वराज समूह के माध्यम से बादरसिंग को वैज्ञानिक खेती, मिट्टी परीक्षण, फसल चयन, जैविक खेती, मौसम आधारित सब्जी उत्पादन और बाजार की मांग की जानकारी मिली।
साथ ही उन्हें सरकारी योजनाओं, सब्सिडी और कृषि उपकरणों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्राप्त हुईं।

अब उन्हें समझ आ गया था कि खेती केवल मेहनत नहीं, बल्कि सही योजना और जानकारी से चलने वाला काम है।

सब्जी खेती की ओर साहसिक कदम

प्रशिक्षण के बाद बादरसिंग ने परंपरागत अनाज की खेती छोड़कर सब्जी उत्पादन शुरू करने का निर्णय लिया। यह फैसला जोखिम भरा था, लेकिन उन्होंने अपने ज्ञान और संस्था के सहयोग पर भरोसा किया।

चार बीघा जमीन में उन्होंने प्याज, धनिया, पालक, मेथी, टमाटर, बैंगन, भिंडी, करेला और पत्तेदार सब्जियां उगाईं। फसल चक्र अपनाकर उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि साल भर खेत से उपज मिलती रहे।

मेहनत का मिला पूरा फल

पहली ही फसल में सब्जियों की गुणवत्ता ने बाजार में पहचान बना ली। ताजी और जैविक सब्जियों की मांग इतनी बढ़ी कि व्यापारी खुद उनके खेत तक आने लगे।

बादरसिंग कहते हैं—
“अब मुझे मंडी जाने की जरूरत नहीं पड़ती। व्यापारी खुद खेत पर आकर सब्जियां खरीदते हैं और तुरंत भुगतान कर देते हैं।”

आज उनकी मासिक आय 15–20 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है।

बकरी पालन से मजबूत आय का सहारा

खेती के साथ-साथ बादरसिंग ने बकरी पालन को भी अपनाया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से बकरियों की देखभाल शुरू की।
आज उनके पास 16 बकरियां हैं, जिनसे समय-समय पर अच्छी आय होती है। हाल ही में एक बकरी 12 हजार रुपये में बेचकर उन्होंने बच्चों की शिक्षा और जरूरी खर्च पूरे किए।

बच्चों के सपनों को मिली नई दिशा

आज बादरसिंग की सालाना आय लगभग दो लाख रुपये है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि वे अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दे पा रहे हैं।
उनकी बेटी GNM डिप्लोमा कर रही है और बेटा पशु चिकित्सा की पढ़ाई में आगे बढ़ रहा है।

किसानों के लिए प्रेरणा

बादरसिंग फूलजी अड़ की कहानी यह साबित करती है कि—

  • सही मार्गदर्शन से जीवन बदला जा सकता है
  • खेती में नवाचार आय बढ़ाता है
  • पशुपालन जैसे पूरक कार्य स्थिरता लाते हैं
  • सीखने की कोई उम्र नहीं होती

उनकी यात्रा हर उस किसान और युवा के लिए प्रेरणा है, जो सीमित साधनों में भी बड़ा सपना देखता है।

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