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वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और यूरोप की नई चुनौती

 असमा खान 

दिल्ली एन सी आर से

anisjune8@gmail.com

बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच यूरोप, नाटो और अमेरिका की नई रणनीति पर विश्लेषणात्मक लेख। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मौजूदा संकेतों की पड़ताल।

वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और यूरोप की नई चुनौतीजब भारत और यूरोपीय संघ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर सहमति बनने की प्रसन्नता साझा करने की तैयारी में थे, उसी समय वैश्विक राजनीति ने यह स्पष्ट कर दिया कि उत्सव का यह क्षण आत्ममंथन से अलग नहीं हो सकता।

नाटो प्रमुख मार्क रुट्टे की चेतावनी—“यूरोप का स्वप्नलोक अब समाप्त हो चुका है”—केवल एक बयान नहीं, बल्कि आने वाले समय का संकेत है। यह संकेत उस यूरोप के लिए है, जो दशकों से सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहा, आर्थिक प्रगति को सैन्य यथार्थ से ऊपर रखता रहा और यह मानकर चलता रहा कि वैश्विक व्यवस्था स्थिर है। आज वही धारणा संकट में है।

नीति, सुरक्षा और यथार्थ का टकराव

नाटो ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यूरोपीय संघ को अब नीतिगत दक्षता, सैन्य प्रशिक्षण और आत्म-संरक्षण पर तत्काल ध्यान देना होगा। केवल घोषणाओं, सम्मेलनों और साझी जिम्मेदारी के सिद्धांत से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब यूरोप आंतरिक मतभेदों, ऊर्जा संकट और धीमी आर्थिक वृद्धि से जूझ रहा है।

अमेरिका का बदला हुआ रुख

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की सक्रियता और डेनमार्क के साथ साझेदारी यह दर्शाती है कि वाशिंगटन अब किसी भी रणनीतिक भूभाग को लेकर अनिश्चितता स्वीकार करने के मूड में नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति भले विवादास्पद रही हो, लेकिन उनका संदेश साफ था—सीमाओं, जलमार्गों और प्रभाव क्षेत्रों पर बाहरी ताकतों के लिए कोई जगह नहीं। यूरोप और अमेरिका की साझेदारी से उत्पादन, रक्षा और तकनीकी नवाचार को बल मिल सकता है, लेकिन यह साझेदारी अब समान जिम्मेदारी की मांग कर रही है, न कि एकतरफा सुरक्षा की।

रूस और यूक्रेन: चेतावनी जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता

रूस का पूर्व की ओर बढ़ता प्रभाव और यूक्रेन युद्ध इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय संघर्ष कैसे वैश्विक व्यापार, निवेश और शांति को प्रभावित कर सकता है। यह युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं है—यह उस व्यवस्था की परीक्षा है, जो वर्षों से स्थिरता का दावा करती रही।

नाटो का अनुच्छेद 5 और आत्मनिर्भरता की मांग

अमेरिका ने नाटो के आर्टिकल 5 का हवाला देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि 32 सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा तभी संभव है जब सभी देश रक्षा निवेश, उत्पादन और आत्मबल बढ़ाने में समान भागीदारी निभाएं।
अब सुरक्षा केवल अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं रह सकती।

फ्रांस का संकेत और परमाणु विमर्श

फ्रांस द्वारा यूरोपीय नेतृत्व के साथ उत्पादन बढ़ाने और परमाणु क्षमता पर चर्चा यह बताती है कि यूरोप अब शांति को केवल नैतिक अपील के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन के रूप में देख रहा है।
परमाणु विमर्श डर पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि संघर्ष को रोकने के लिए सामने आ रहा है।

लाभ बनाम मानवाधिकार: एक खतरनाक संतुलन

विश्व शांति और समृद्धि के नाम पर मानवाधिकार और न्याय को दरकिनार कर लाभ प्रतिशत बढ़ाने की सोच अंततः अस्थिरता को जन्म देती है। इतिहास गवाह है कि जब भी लाभ को नीति से ऊपर रखा गया, उसका परिणाम संघर्ष और विभाजन के रूप में सामने आया।

अमेरिका की अभिभावक भूमिका और मित्र राष्ट्र

अमेरिका ने दशकों तक मित्र देशों के लिए अभिभावक की भूमिका निभाई है—चाहे वह सीमा सुरक्षा हो या सैन्य सशक्तिकरण। लेकिन यह भूमिका स्थायी नहीं हो सकती, यदि मित्र राष्ट्र स्वयं अपनी जिम्मेदारियों से बचते रहें।

भविष्य का रास्ता: भ्रम नहीं, विवेक

नई संधियाँ, नए समझौते और नए गठबंधन तभी सफल होंगे, जब वे यथार्थ की ज़मीन पर खड़े होंगे।
भविष्य को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन स्वांग, भ्रम और आत्मतुष्टि को नीति बनाना राष्ट्रीय और महाद्वीपीय अस्मिता के लिए घातक है। अब समय है कि दुनिया—खासतौर पर यूरोप—स्वप्नलोक छोड़कर यथार्थ की कठोर सच्चाइयों को स्वीकार करे। क्योंकि इतिहास चेतावनी देता है—जो समय रहते नहीं जागते, वे बाद में केवल पछताते हैं।

Disclaimer: (इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। लेख का उद्देश्य समकालीन अंतरराष्ट्रीय घटनाओं, नीतिगत रुझानों और वैश्विक शक्ति संतुलन का विश्लेषण प्रस्तुत करना है। इसमें व्यक्त मत किसी भी सरकार, संस्था, संगठन या देश की आधिकारिक नीति या दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करते।  उद्देश्य सूचना, विश्लेषण और विमर्श को प्रोत्साहित करना है। पाठक लेख को एक विश्लेषणात्मक/ओपिनियन सामग्री के रूप में ग्रहण करें।)

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