Report
Vikas Meshram
vikasmeshram04@gmail.com
राजस्थान के दक्षिणी सिरे पर स्थित बांसवाड़ा जिले का घाटोल ब्लॉक पहाड़ियों और जंगलों से घिरा इलाका है। यहां बसे दूरस्थ आदिवासी गांवों का जीवन लंबे समय तक प्राकृतिक चुनौतियों और सामाजिक सीमाओं के बीच चलता रहा। पानी की कमी, वर्षा आधारित खेती, सीमित रोजगार के अवसर, कम शिक्षा और परंपरागत सोच यहां की दिनचर्या का हिस्सा रहे हैं।
इन परिस्थितियों में गांव की महिलाओं की भूमिका अक्सर घर, पशुपालन और खेत तक सीमित मानी जाती थी। निर्णय-निर्माण में उनकी भागीदारी कम थी और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी लगभग न के बराबर थी।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।
इसी क्षेत्र की कुछ साधारण महिलाओं ने सामुदायिक सहयोग और जानकारी के बल पर ऐसा परिवर्तन शुरू किया है जिसने पूरे इलाके की दिशा को प्रभावित किया है। इंद्रा देवी, मीरा देवी, टाकू देवी और मणि देवी आज अपने-अपने गांवों में प्रेरणा बन चुकी हैं। ये महिलाएं अब केवल गृहिणी या किसान नहीं, बल्कि जल प्रबंधन, सामाजिक सुरक्षा, बीज संरक्षण और सामाजिक जागरूकता की अग्रणी कार्यकर्ता के रूप में पहचानी जाती हैं।
इंद्रा देवी: पानी से आत्मसम्मान तक की यात्रा
गोज राठौर गांव की 45 वर्षीय इंद्रा देवी का जीवन पहले सामान्य ग्रामीण महिला जैसा ही था—खेतों में काम, घर की जिम्मेदारी और पानी के लिए रोज संघर्ष। पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सिंचाई की सुविधा कम थी और खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहती थी।
बदलाव की शुरुआत
ग्राम स्वराज समूह से जुड़ने के बाद इंद्रा देवी को कृषि और सिंचाई योजनाओं की जानकारी मिली। उन्होंने किसानों को आधुनिक सिंचाई प्रणाली के बारे में समझाना शुरू किया।
उन्होंने क्या-क्या किया
- किसानों को योजना की जानकारी दी
- आवेदन फॉर्म भरवाए
- आधार और बैंक खातों को लिंक करवाया
- सरकारी कार्यालयों तक लोगों को साथ ले गईं
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई के प्रशिक्षण आयोजित किए
परिणाम
- 250 से अधिक किसान परिवारों को आधुनिक सिंचाई सुविधा मिली
- पानी की बचत हुई
- खेती की उत्पादकता बढ़ी
इंद्रा देवी ने गांव में हैंडपंप लगाने की मांग भी उठाई। सामूहिक प्रयासों से गांव में पेयजल सुविधा विकसित हुई और महिलाओं को दूर से पानी लाने की परेशानी कम हुई।
शुरुआत में सामाजिक झिझक और विरोध भी हुआ, लेकिन जब खेतों में हरियाली लौटी तो वही लोग उनके समर्थक बन गए। आज वे गांव की एक सम्मानित नेतृत्वकर्ता हैं।
मीरा देवी: सरकारी योजनाओं तक पहुंच की सेतु
जाजोर कांता गांव की मीरा देवी ने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया। बचपन में मां का निधन, शिक्षा का अभाव और परिवारिक जिम्मेदारियां—सब कुछ उन्होंने कम उम्र में ही संभाल लिया।
सरकारी योजनाओं की जटिल प्रक्रियाएं उनके लिए भी चुनौतीपूर्ण थीं, लेकिन उन्होंने धीरे-धीरे दस्तावेज बनवाने और फॉर्म भरने की प्रक्रिया सीख ली।
उनकी भूमिका
अब मीरा देवी गांव-गांव जाकर लोगों की मदद करती हैं:
- राशन कार्ड और आधार कार्ड बनवाना
- आवेदन पत्र भरवाना
- जरूरतमंद परिवारों को योजनाओं की जानकारी देना
- बच्चों और महिलाओं को सहायता दिलाना
हाल ही में उन्होंने एक ऐसे परिवार को सहायता दिलाने में मदद की जिसके बच्चों ने अपने पिता को खो दिया था। अब बच्चों को नियमित सहयोग मिल रहा है।
आज गांव में लोग उन्हें “सहायता करने वाली दीदी” के रूप में जानते हैं।
टाकू देवी: बीजों की संरक्षक और पोषण की प्रहरी
कानेला गांव की 55 वर्षीय टाकू देवी ने पारंपरिक खेती को फिर से जीवित करने का बीड़ा उठाया। समूह बैठकों के माध्यम से उन्होंने देशी बीजों और जैव विविधता का महत्व समझा।
उनके प्रयास
उन्होंने स्थानीय बीजों का संग्रह और संरक्षण शुरू किया:
- गेहूं
- मक्का
- कोदरा
- कांग
- अन्य मोटे अनाज
वे हर साल इन बीजों का उपयोग करती हैं और अन्य महिलाओं को भी बांटती हैं।
अतिरिक्त पहल
- घर के आसपास फलदार पौधे लगाए
- मूंग की खेती से अतिरिक्त आय अर्जित की
- अतिरिक्त अनाज स्थानीय बाजार में बेचना शुरू किया
उनकी पहल से गांव में पोषण और आय दोनों में सुधार देखा जा रहा है।
मणि देवी: सामाजिक जागरूकता की आवाज
जेठालिया गांव की मणि देवी ने सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलने का निर्णय लिया। बाल अधिकारों की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता शुरू की।
प्रमुख कार्य
- बाल विवाह रुकवाने में सक्रिय भूमिका
- परिवारों को लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रेरित करना
- आंगनवाड़ी सेवाओं को मजबूत करना
- गर्भवती महिलाओं और बच्चों की देखभाल में सहयोग
अब तक वे कई बाल विवाह रुकवाने में सफल रही हैं और कई लड़कियां दोबारा स्कूल लौट पाई हैं।
इस बदलाव के पीछे क्या रहा आधार
इन सभी महिलाओं को सामुदायिक समूहों, बैठकों और प्रशिक्षण से जानकारी व मंच मिला। सामूहिक चर्चा और सहयोग ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया और नेतृत्व क्षमता विकसित की।
बदलाव की मुख्य झलकियां
- जल संरक्षण और सिंचाई सुविधाओं में सुधार
- सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ी
- पारंपरिक बीजों का संरक्षण
- बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता
- लड़कियों की शिक्षा में वृद्धि
- महिलाओं की सामाजिक भागीदारी बढ़ी
बांसवाड़ा के इन गांवों की कहानी बताती है कि परिवर्तन बाहर से नहीं आता, बल्कि समुदाय के भीतर से जन्म लेता है। जब महिलाओं को अवसर, जानकारी और सहयोग मिलता है, तो वे केवल अपने परिवार नहीं बल्कि पूरे समाज की दिशा बदल सकती हैं।
आज यहां खेतों में हरियाली, बच्चों में शिक्षा की आशा और महिलाओं में आत्मविश्वास दिखाई देता है। यह केवल चार महिलाओं की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक बदलाव की मिसाल है जिसमें समुदाय की महिलाएं स्वयं नेतृत्व संभालती हैं और विकास की नई राह बनाती हैं।
Disclaimer : (लेख में व्यक्त विचार जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक प्रेरणा के उद्देश्य से हैं। प्रकाशक इस सामग्री के उपयोग से होने वाले किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे। )


0 टिप्पणियाँ