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परंपरा, परिश्रम और परिवर्तन का संगम: कमलादेवी भगोरा की प्रेरक कहानी

विकास  मेश्राम- ईमेल 

vikasmeshram04@gmail.com

एक ग्रामीण विकास कर्मी, लेखक और सामाजिक शोधकर्ता हैं,

राजस्थान के राजस्थान राज्य के दक्षिणी छोर पर बसे बाँसवाडा जिले का जनजातीय इलाका अपनी सांस्कृतिक समृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों और मेहनतकश समुदायों के लिए जाना जाता है। इसी जिले के सज्जनगढ़ ब्लॉक के घोती की टोडी गांव में रहने वाली 43 वर्षीय कमलादेवी भगोरा ने यह सिद्ध कर दिया कि बदलाव किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि अपने खेत की मिट्टी से भी शुरू किया जा सकता है। तीनबेटों की मां और एक साधारण किसान परिवार से आने वाली कमलादेवी ने अपने जीवन के अनुभवों को संघर्ष, सीख और नेतृत्व में बदलकर न केवल अपने परिवार बल्कि सात गांवों की सैकड़ों महिलाओं के जीवन में नई दिशा दी।

परंपरा, परिश्रम और परिवर्तन का संगम: कमलादेवी भगोरा की प्रेरक कहानी

कमलादेवी का बचपन खेत-खलिहानों के बीच बीता। उन्होंने अपने माता-पिता को कड़ी धूप में मेहनत करते देखा और बहुत छोटी उम्र से ही खेती-किसानी की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया। ग्रामीण और जनजातीय परिवेश में पली-बढ़ी कमलादेवी ने देखा कि खेती परिवार की जीवनरेखा तो है, पर निर्णय लेने की शक्ति प्रायः पुरुषों के हाथ में सीमित रहती है। महिलाएँ खेत में बराबरी से काम करती थीं, पर भूमि स्वामित्व, आर्थिक निर्णय और पंचायत स्तर की भागीदारी में उनकी आवाज़ कमजोर थी। यह असमानता उन्हें भीतर ही भीतर कचोटती रही।

उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब उन्होंने सामाजिक संस्था वागधारा से जुड़कर प्रशिक्षण प्राप्त किया। वागधारा के माध्यम से उन्हें भूमि अधिकार, महिला अधिकार, पंचायत राज व्यवस्था और टिकाऊ जैविक कृषि जैसे विषयों पर गहन प्रशिक्षण मिला। इस प्रशिक्षण ने उनके भीतर छिपे नेतृत्व को पहचानने का अवसर दिया। उन्होंने समझा कि यदि महिलाएँ अपने अधिकारों, संसाधनों और ज्ञान से सशक्त हों तो गांव का सामाजिक-आर्थिक ढांचा बदल सकता है।

कमलादेवी ने सात गांवों में महिला सक्षम समूह और ग्राम स्वराज समूह का गठन करवाया। महिला सक्षम समूहों में लगभग 140 महिलाओं को जोड़ा गया और ग्राम स्वराज समूह में 140 महिला-पुरुषों की भागीदारी सुनिश्चित की गई। इन समूहों का उद्देश्य केवल बैठकों तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्राम पंचायत में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना, भूमि अधिकारों पर चर्चा करना, सामुदायिक निर्णयों में महिलाओं की आवाज़ मजबूत करना और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देना था। धीरे-धीरे कमलादेवी इन गांवों की महिलाओं के लिए प्रेरक और मार्गदर्शक बन गईं।

प्रशिक्षण के बाद उन्होंने गांव-गांव जाकर महिला किसानों से संवाद शुरू किया। वे उन्हें समझातीं कि रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता घटती है, लागत बढ़ती है और स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ता है, जबकि टिकाऊ जैविक खेती लंबे समय में लाभकारी है। परंतु शुरुआत में उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। महिलाओं ने उनकी बात सुनी, पर अपनाने में हिचकिचाईं। कमलादेवी ने आत्ममंथन किया और समझा कि केवल समझाना पर्याप्त नहीं है; समुदाय को एक जीवंत उदाहरण चाहिए। जब तक वे स्वयं अपने खेत में बदलाव नहीं करेंगी, तब तक अन्य महिलाएँ विश्वास नहीं करेंगी।

यहीं से उन्होंने उदाहरण के साथ नेतृत्व करने का निर्णय लिया। लगभग चार बीघा भूमि पर अपने परिवार के साथ खेती करने वाली कमलादेवी ने अपनी दो गायों के गोबर से खाद तैयार की और दशपर्णी तथा निमास्त्र जैसे जैविक कीटनाशकों का उपयोग शुरू किया। उनके पास आठ बकरियाँ भी थीं, जिनसे अतिरिक्त आय का स्रोत विकसित हुआ। वर्ष 2021 से 2025 के बीच उन्होंने बकरों की बिक्री से लगभग 1,02,500 रुपये की आय अर्जित की। इस आय ने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूती दी कमलादेवी ने तीन बीघा भूमि में मक्का और तुवर की स्वदेशी किस्मों की खेती शुरू की। 

घरेलू उपयोग के लिए उन्होंने बैंगन, टमाटर, लौकी, भिंडी और प्याज जैसी सब्जियाँ उगाईं। वे केवल स्थानीय बीजों का उपयोग करती थीं और फसल से बीज संरक्षित करने की परंपरा को पुनर्जीवित किया। इससे बाहरी बाजार पर निर्भरता घटी और लागत कम हुई। और कुछ ही समय में मिट्टी की संरचना सुधरी, उत्पादन स्थिर हुआ और स्वाद में उल्लेखनीय सुधार दिखाई दिया।। 

आसपास की महिलाओं ने यह परिवर्तन अपनी आँखों से देखा। उन्हें लगा कि जो बात कमलादेवी समझा रही थीं, वह केवल सिद्धांत नहीं बल्कि व्यवहार में संभव है। धीरे-धीरे अन्य महिला किसानों ने भी अपने खेतों के छोटे हिस्सों में जैविक खेती शुरू की। कमलादेवी ने उन्हें खाद निर्माण, जैविक कीटनाशक बनाने और बीज संरक्षण की प्रक्रिया सिखाई। वे खेत पर किसान खेत आयोजित करतीं, अब तक वे लगभग 200 से अधिक महिला किसानों को टिकाऊ कृषि की ओर प्रेरित कर चुकी हैं। 

उन्होंने स्थानीय स्तर पर बीज बैंक स्थापित करने की पहल भी शुरू की, ताकि पारंपरिक किस्मों का संरक्षण हो सके और किसान बाहरी महंगे बीजों पर निर्भर न रहें। महिला सक्षम समूह की सदस्य सुरेखा दामा बताती हैं कि जैविक खेती अपनाने से उनके परिवार का खर्च कम हुआ और बचत बढ़ी। पहले वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर काफी धन खर्च करती थीं, पर अब स्थानीय संसाधनों से खेती संभव हो रही है। इससे न केवल आर्थिक लाभ हुआ बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा। समूह बैठकों में महिलाएँ खुलकर अपनी बात रखने लगीं और पंचायत के निर्णयों में सक्रिय भागीदारी करने लगीं।

कमला कहती है की मेरा यह सफर चुनौतियों से मुक्त नहीं थी। कई बार सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने कहा कि महिलाओं का काम केवल खेत में श्रम करना है, निर्णय लेना नहीं। पर कमलादेवी ने धैर्य और निरंतरता से जवाब दिया। उन्होंने संघर्ष को टकराव में नहीं, संवाद में बदला। धीरे-धीरे पुरुष सदस्य भी यह देखने लगे कि टिकाऊ कृषि से परिवार की आय और स्वास्थ्य दोनों में सुधार हो रहा है। इससे उनका दृष्टिकोण बदला और महिलाओं की भागीदारी को स्वीकार्यता मिली। आज उनकी सफलता केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का विस्तार है। उन्होंने महिलाओं को यह विश्वास दिलाया कि वे केवल श्रमिक नहीं, बल्कि निर्णयकर्ता और परिवर्तनकारी भी हैं। सात गांवों की महिलाएँ अब आत्मनिर्भरता, जैविक खेती और सामुदायिक नेतृत्व की दिशा में संगठित होकर आगे बढ़ रही हैं। बीज बैंक, सामूहिक प्रशिक्षण और पंचायत भागीदारी जैसे कदम स्थायी विकास की नींव रख रहे हैं।

कमलादेवी भगोरा उनकी आगे की योजना के बारे में बताती है की  अधिक महिलाओं को संगठित करना, बीज संरक्षण को व्यापक बनाना और जैविक उत्पादों के लिए बेहतर बाजार व्यवस्था विकसित करना है। वे चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ रासायनिक निर्भरता से मुक्त, स्वस्थ और आत्मनिर्भर कृषि प्रणाली अपनाएँ। कमलादेवी का यह संकल्प टिकाऊ विकास की उस संभावना को उजागर करता है, जो स्थानीय नेतृत्व और सामुदायिक सहयोग से साकार हो सकती है।उनकी कहानी संघर्ष, साहस, धैर्य और दूरदृष्टि का ऐसा उदाहरण है, जो बताता है कि परिवर्तन की असली ताकत खेत की मिट्टी और महिलाओं के संकल्प में छिपी है।

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