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महिलाओं के हाथों में आई आजीविका की कमान: हल्दी बनी आत्मनिर्भरता का सहारा

दक्षिण राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात की आदिवासी पट्टी में जब खेतों में हल्दी की हरियाली लहलहाती है, तो वह केवल एक मसाला फसल नहीं होती। वह आत्मनिर्भरता की सुनहरी आभा होती है।

जिन गांवों में कभी मसाले तक बाजार से खरीदने पड़ते थे, आज वहीं की मिट्टी अपने भीतर से ऐसी समृद्धि उगा रही है जिसने हजारों परिवारों के जीवन की दिशा बदल दी है। इस बदलाव के केंद्र में है वागधारा की वह पहल, जिसने हल्दी को आजीविका, पोषण और ग्राम स्वराज से जोड़ दिया।

दक्षिण राजस्थान के आदिवासी गांव में महिलाएं खेत में हल्दी की फसल के साथ खड़ी हुईं

हल्दी: रसोई से आजीविका तक का सफर

भारतीय जीवन में हल्दी का स्थान केवल रसोई तक सीमित नहीं है। विवाह की हल्दी, प्रसव के बाद की देखभाल, घरेलू उपचार और रोज़ की दाल-सब्ज़ी—हर जगह हल्दी की मौजूदगी जरूरी है।

लेकिन विडंबना यह थी कि आदिवासी अंचलों के कई परिवार अपनी जरूरत की हल्दी भी बाजार से खरीदते थे। प्लास्टिक की छोटी-छोटी थैलियों में पैक होकर आने वाली हल्दी पर हर साल नकद खर्च करना पड़ता था। सीमित आय वाले परिवारों के लिए यह खर्च भी एक बोझ था।

वागधारा की पहल: हल्दी से आत्मनिर्भरता

इसी स्थिति को बदलने के लिए वागधारा ने हल्दी को केंद्र में रखकर एक व्यापक अभियान शुरू किया। संस्था ने लगभग 2000 गांवों के दो लाख से अधिक परिवारों को हल्दी के बीज उपलब्ध कराए।

इसके साथ ही किसानों को प्रशिक्षण दिया गया, महिला समूह बनाए गए और पोषण वाटिका की अवधारणा को बढ़ावा दिया गया। ग्राम स्वराज समूहों और सक्षम महिला समूहों के माध्यम से यह विचार गांव-गांव तक पहुंचाया गया कि छोटी सी मसाला फसल भी आजीविका का मजबूत साधन बन सकती है।

एक किसान की कहानी: बदलाव की मिसाल

बांसवाड़ा जिले के आनंदपुरी ब्लॉक के धनेवा बड़ा गांव के किसान बालेश्वर ताबियार इस परिवर्तन की जीवंत मिसाल हैं।

वे बताते हैं कि पहले उनके खेत में हल्दी केवल घरेलू उपयोग के लिए लगाई जाती थी।

“हमने कभी सोचा ही नहीं था कि हल्दी से आय भी हो सकती है। ग्राम स्वराज समूह की बैठक में जब इसके बारे में बताया गया, तब हमने छोटे स्तर पर प्रयोग किया। उपज अच्छी मिली और खर्च भी कम आया। इस साल मैंने पूरे एक बीघा में हल्दी लगाई है,” वे मुस्कुराते हुए कहते हैं।

उनके खेत में खड़ी हरी-भरी फसल सचमुच नए आत्मविश्वास की प्रतीक लगती है।

दक्षिण राजस्थान के आदिवासी गांव में महिलाएं खेत में हल्दी की फसल के साथ खड़ी हुईं

कम जोखिम, स्थायी मांग

किसानों के लिए हल्दी इसलिए भी आकर्षक फसल बनी क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम जोखिम वाली है।

गेहूं, चना या तिल जैसी फसलें अक्सर मौसम की मार और कीट-रोगों से प्रभावित हो जाती हैं। अचानक बारिश या ओलावृष्टि कई बार पूरी फसल खराब कर देती है।

इसके विपरीत हल्दी की गांठें मिट्टी के भीतर विकसित होती हैं, जिससे मौसम का सीधा असर कम पड़ता है। लागत कम होती है और मांग स्थायी रहती है।

महिलाओं की भागीदारी: बदलाव की असली ताकत

इस पहल का सबसे मजबूत पक्ष महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है।

सैलाना तहसील के साकरवाड़ा गांव की राजूबाई कहती हैं,
“पिछले तीन साल से मैंने बाजार से हल्दी नहीं खरीदी। वागधारा से मिला बीज हमने खेत में बोया और इस बार दो क्विंटल हल्दी हुई है। अब मैं इसे बेचकर अपनी आय बढ़ाऊंगी।”

उनकी आवाज़ में जो आत्मविश्वास है, वह केवल फसल का नहीं बल्कि आत्मनिर्भरता का है।

पर्यावरण के लिए भी बेहतर

उसी गांव की अनीताबाई बताती हैं कि पहले वे प्लास्टिक में पैक हल्दी खरीदती थीं।

“हमें पता ही नहीं था कि प्लास्टिक पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाता है। महिला समूह की बैठक में जानकारी मिली, तब समझ आया कि अपने खेत की हल्दी इस्तेमाल करना कितना बेहतर है। अब हमने प्लास्टिक पैक हल्दी खरीदना बंद कर दिया है।”

इस तरह यह पहल पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे रही है।

छोटी फसल, बड़ा बदलाव

कांगसी गांव की लक्ष्मीबाई, राजेश्वरीबाई, गंगाबाई और सुगनाबाई भी अब बाजार पर निर्भर नहीं हैं।

अब घर की जरूरत पूरी करने के बाद भी उनके पास अतिरिक्त हल्दी बच जाती है, जिसे वे स्थानीय व्यापारियों को बेच देती हैं। इससे उन्हें बच्चों की पढ़ाई, दवाइयों और अन्य जरूरतों के लिए नकदी मिल जाती है।

सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत

हल्दी की खेती ने केवल आर्थिक बदलाव ही नहीं किया, बल्कि सामाजिक बदलाव भी लाया है।

जब महिलाएं उत्पादन और विपणन से जुड़े निर्णयों में भाग लेने लगीं, तो परिवारों में उनकी भूमिका मजबूत हुई। ग्राम सभाओं और बैठकों में उनकी भागीदारी बढ़ी और निर्णय प्रक्रिया में उनकी आवाज़ सुनी जाने लगी।

ग्राम स्वराज की ओर कदम

वागधारा की यह पहल ग्राम स्वराज की अवधारणा को जमीन पर उतारने का उदाहरण है।

जब गांव अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए बाजार पर निर्भरता कम करता है, तो वह आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बनता है।

दो लाख परिवारों का हल्दी उत्पादन से जुड़ना केवल कृषि कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है।

सुनहरी आभा की कहानी

आज इन गांवों में हल्दी केवल मसाला नहीं रही। वह आत्मविश्वास का रंग बन गई है।

खेतों में लहलहाती हरी पत्तियां और मिट्टी के भीतर पनपती सुनहरी गांठें यह संदेश देती हैं कि सही मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास से साधारण दिखने वाली फसल भी बड़े बदलाव की वजह बन सकती है।

जब राजूबाई अपने खेत की हल्दी के बारे में बताती हैं, तो उनके चेहरे पर चमक दिखाई देती है।

“पहले हम सोचते थे कि हमारे पास क्या है? अब लगता है कि हमारी मिट्टी में ही सब कुछ है।”

यही भावना इस पूरी कहानी का सार है।

हल्दी की यह सुनहरी आभा केवल खेतों को नहीं, बल्कि गांवों की सोच को भी रोशन कर रही है।


लेखक: विकास मेषराम
ईमेल: vikasmeshram04@gmail.com

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