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महिला दिवस विशेष: बेटियों की आवाज़ – सपने, संघर्ष और सवाल | प्रेरक कविताएँ

समाज में महिलाओं और लड़कियों की स्थिति, उनके सपनों, संघर्षों और भावनाओं को शब्दों में पिरोती ये कविताएँ आज की सच्चाई को सामने लाती हैं। इन पंक्तियों में एक बेटी का अपनी माँ से सवाल है, एक लड़की की कहानी है, रूढ़िवादी सोच से जूझती युवती की पीड़ा है और एक छोटी बच्ची का बड़ा सपना है।

महिला दिवस पर बेटियों की आवाज़ और सपनों को दर्शाती प्रेरक कविताएँ

कविताएँ सिर्फ भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली आवाज़ हैं। महिला दिवस के अवसर पर प्रस्तुत हैं कुछ प्रेरणादायक और विचारोत्तेजक रचनाएँ:-

माँ एक सवाल है

लेखिका: श्रेया जोशी
स्थान: बैसानी, उत्तराखंड

माँ मेरा तुझसे एक सवाल है,
सच बताना तेरा कैसा हाल है?

शाम होने को है, मुझे भूख लगी है,
पर तुझे अभी भी किसका इंतजार है,

पापा घर आ गए पर तेरे चेहरे पर मुस्कान नहीं,
डर लगता है तेरे चेहरे पर देखकर निशान कई,

सबके घर में खुशियां हैं, मगर हमारा ये हाल है,
माँ सच बताना कि तेरा कैसा हाल है?

छोटी सी बहना मेरी, क्यों रोती है बंद कमरे में?
भाई रात भर सोया नहीं, क्यों आंखें उसकी लाल हैं,

लोग कहते हैं मुझसे, किस्मत की एक नई चाल है,
पर सच बताना मां कि तेरा कैसा हाल है?

पूछना चाहती हूँ मैं उनसे क्यों दर्द हमें यूं देते हो?
माँ बहन परिवार को भूल नशा हर वक्त करते हो?

क्या अटपटा है ये, या सही मेरा सवाल है?
सच बताना मां कि तेरा कैसा हाल है?


लड़की की कहानी

लेखिका: रेनू आर्या
कक्षा: 12
स्थान: बैगांव, गरुड़

हर लड़की की यही कहानी,
वो नहीं कर सकती मनमानी,

हर लड़की के होते हैं सपने,
क्यों नहीं समझते उनको अपने?

लड़कियों को बोझ क्यों कहते हो?
उन्हें कमजोर क्यों समझते हो?

उन्हें बराबर का मान नहीं दिया जाता,
लड़कों जैसा सम्मान नहीं दिया जाता,

क्यों होती है ऐसी सबकी छोटी सोच?
इस सोच को भी बदलना जरूरी है,

समाज को अब जगाना जरूरी है,
उन्हें भी मिले सभी अधिकार,

हर लड़की कहती है यही बार-बार,
मगर हर लड़की की यही कहानी,
वह नहीं कर सकती मनमानी।।


कब कदम उठा पाऊँगी?

लेखिका: करिश्मा
उम्र: 20 वर्ष
कक्षा: BA

मैं भटक रही हूँ रातों में,
इन सोच को साथ लेकर,

क्यों यह बातें मुझे झकझोड़ रही हैं?
क्यों यह रूढ़िवादी सोच मुझे तोड़ रही हैं,

मैं इन सोचों से घबरा रही हूँ,
रूढ़िवादी सोच की गलियों में भटकती जा रही हूँ,

कब मैं खुल के जी पाऊंगी?
कब मैं इस दुनिया से लड़ पाऊंगी?

के कदम बड़ा उठा पाऊंगी,
कब अपने रास्ते खोल पाऊंगी।।


मेरा सपना

लेखिका: दिव्या
कक्षा: 9वीं
स्थान: सुराग, उत्तराखंड

मैं भी बनना चाहती हूँ एक डॉक्टर,
करना चाहती हूँ समाज की सेवा,

सारे दुख और बीमारियाँ होंगी दूर,
करना चाहती हूँ हर एक का इलाज,

अगर होगा हर लड़की का सपना पूरा,
तभी तो देश बनेगा लाजवाब,

इस महिला दिवस अब ये काम करूंगी,
मैं डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करूंगी।।


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