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स्मार्ट मीटर की रोशनी में बदलता बिहार का गांव

स्मार्ट मीटर की मदद से बिजली व्यवस्था में सुधार के कारण रोशन होता बिहार का गांव

जूही कुमारी

मुजफ्फरपुर, बिहार

हमारे देश में आज भी गांव और शहर के बीच बहुत बड़ा अंतर है. सुख सुविधाओं के मामले में अगर शहर अच्छा है तो गांव का वातावरण शहर की तुलना में बेहतर नज़र आता है. लेकिन बात जब बुनियादी सुविधाओं की आती है तो यही गांव शहर से काफी पीछे नज़र आता है. आज भी देश के कई ऐसे दूर दराज़ के ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां बुनियादी सुविधाओं का या तो पूरी तरह से अभाव है या फिर बहुत कम देखने को मिलता है. इन बुनियादी आवश्यकताओं में बिजली प्रमुख है. जिसके बिना आज जीवन मुश्किल नजर आता है. बिहार के मुजफ्फरपुर जिला स्थित मुसहरी ब्लॉक का सितुआरा गांव भी इसी बुनियादी कमी से जूझ रहा है.

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सरकार की योजनाओं, बिजली वितरण कंपनियों की सक्रियता और तकनीकी बदलावों ने गांवों की ज़िंदगी को बदल दिया है। इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक स्मार्ट मीटर को माना जाता है, जिसने बिजली के उपयोग और भुगतान दोनों को एक नया स्वरूप दिया है। वास्तव में, पिछले कुछ समयों में बिहार में बिजली आपूर्ति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पहले जहां ग्रामीण क्षेत्रों में 8 से 10 घंटे ही बिजली मिलती थी, वहीं अब कई गांवों में 18 से 20 घंटे तक बिजली उपलब्ध हो रही है।

राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क विस्तार और लाइन सुधार पर काफी काम किया गया है। इसके साथ ही सरकार द्वारा सब्सिडी और हर घर बिजली जैसी योजनाओं ने गांवों को रोशन करने में प्रमुख भूमिका निभाई है। बिहार में स्मार्ट मीटर ने बिजली व्यवस्था को डिजिटल बना दिया है। इसके जरिए उपभोक्ता अपने मोबाइल से ही बिजली खपत देख सकते हैं, रिचार्ज कर सकते हैं और बिलिंग को समझ सकते हैं। भारत सरकार के अनुसार बिहार देश के उन राज्यों में शामिल है जहां स्मार्ट मीटर तेजी से लगाए जा रहे हैं, जिससे बिजली उपयोग का डेटा रियल टाइम में उपलब्ध होता है। इससे पारदर्शिता भी बढ़ी है। पहले जहां गलत बिलिंग और मीटर रीडिंग की शिकायत आम थीं, अब उसमें कमी आई है। उपभोक्ता खुद देख सकता है कि उसने कितनी बिजली इस्तेमाल की और कितना पैसा खर्च हुआ।

लेकिन हर कहानी के दो पहलू होते हैं और स्मार्ट मीटर भी इससे अछूता नहीं है। सितुआरा गांव के कई लोगों को यह नई प्रणाली आज भी समझने में कठिनाई होती है। उनमें बिजली टैरिफ और बिलिंग सिस्टम को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति देखा जाता है। कई उपभोक्ता की यह शिकायत रहती है कि पहले की तुलना में उनका खर्च बढ़ गया है, क्योंकि प्रीपेड सिस्टम के तहत अब बिजली का भुगतान पहले करना पड़ता है। वहीं सितुआरा के लोगों की यह भी शिकायत होती है कि कई बार आंधी और बारिश के दिनों में जब बिजली चली जाती है तो 10 दिनों तक गांव अंधेरे में डूबा रहता है। कई बार कंप्लेन के बावजूद बिजली कर्मचारी इसे जल्दी ठीक नहीं करते हैं।

हालांकि बिहार और केंद्र सरकार दोनों ही बिजली क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहे हैं। बिहार विद्युत विनियामक आयोग ने नए टैरिफ आदेश में बिलिंग को सरल बनाने, स्मार्ट मीटर को बढ़ावा देने और ग्रीन टैरिफ जैसी नई व्यवस्थाएं लागू करने की बात कही है। इन सभी प्रयासों का असर यह हुआ है कि आज बिहार के ग्रामीण इलाकों में बिजली सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि विकास का आधार बन चुकी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और छोटे व्यवसाय, सब कुछ बिजली पर निर्भर होता जा रहा है। फिर भी चुनौतियां बाकी हैं। तकनीकी जानकारी की कमी, स्मार्ट मीटर की समझ, नेटवर्क की समस्याएं और बढ़ते बिल जैसे मुद्दे अभी भी ग्रामीण उपभोक्ताओं के सामने हैं। खासकर बुजुर्ग और कम पढ़े-लिखे लोग इस नई प्रणाली में खुद को असहज महसूस करते हैं। इसके साथ ही कई कई दिनों तक बिजली आपूर्ति का ठप होना भी इस कमी को बढ़ा देता है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछले कुछ दशकों में देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की व्यवस्था में पहले की अपेक्षा काफी सुधार आया है. केंद्र की सौभाग्य योजना भी इस दिशा में अहम कड़ी साबित हुआ है. अक्टूबर 2017 में शुरू किये गए इस योजना से अब तक करोड़ों घर रौशन हो चुके हैं. इसके अतिरिक्त बिहार सरकार ने भी अपने स्तर पर गांव को बिजली कटौती की समस्या से निजात दिलाने का काम शुरू किया है. इससे बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों को सबसे अधिक लाभ हुआ है। एक ओर जहां गांव के स्तर पर बिजली से चलने वाले कुछ लघु उद्योग स्थापित हुए हैं तो वहीं किसानों को भी सिंचाई में लाभ मिला है.

लेकिन जब तक बिजली कटौती की समस्या पर पूर्ण रूप से काबू नहीं पाया जाता है तब तक इस प्रकार की किसी भी योजना को शत प्रतिशत कामयाब नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में स्थानीय प्रशासन और बिजली विभाग को सक्रिय भूमिका निभाने की ज़रूरत है ताकि आम लोगों के साथ साथ बच्चों की शिक्षा भी निर्बाध रूप से चल सके. हकीकत में, बिहार के ग्रामीण इलाकों में बिजली व्यवस्था एक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जहां पुराने अंधेरे की जगह नई तकनीक की रोशनी ने ले ली है। स्मार्ट मीटर इस बदलाव का प्रतीक है, जो पारदर्शिता और नियंत्रण देता है, लेकिन साथ ही नई चुनौतियां भी लेकर आता है। अगर सरकार जागरूकता, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता पर ध्यान दे, तो यह बदलाव सच में बदलते बिहार की एक नई कहानी लिखेगा।
(यह लेखिका की निजी राय है)

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