शबनम कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहारएक बार फिर से बिहार के कई ग्रामीण परिवारों का अपना पक्का मकान होने का सपना पूरा हो सकेगा। इस माह के शुरुआत में बिहार के ग्रामीण विकास मंत्री ने घोषणा की कि 11 लाख से अधिक लाभार्थियों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पहली किस्त, 7,49,056 लाभार्थियों को दूसरी और 3,46,307 लाभार्थियों को तीसरी किस्त का भुगतान किया जा चुका है। वहीं 3,06,246 लाभार्थियों ने अपने आवास का निर्माण कार्य भी पूरा कर लिया है। इसके साथ ही केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2026 में 91.92 करोड़ रुपये की राशि भी जारी की गई है। जिससे किश्त का इंतज़ार कर रहे कई अन्य लाभार्थियों को राहत मिलेगी और वह जल्द ही अपने मकान कार्य को पूरा कर सकेंगे।
वास्तव में राज्य सरकार की यह कोशिश सराहनीय है। इससे देश के अन्य राज्यों में बिहार के प्रति बनी नकारात्मक छवि भी बदलेगी। लेकिन इन सराहनीय कार्यों के बीच राज्य के कई ग्रामीण इलाके ऐसे भी हैं जहां सैकड़ों परिवारों को अब भी पक्की छत नसीब नहीं हुई है। दरअसल, कागज़ों में योजनाएं और घोषणाओं में वादे तो हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कई जरूरतमंद आज भी आवास योजना के लाभ से वंचित हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का यही उद्देश्य है कि देश के हर गरीब परिवार को पक्का घर मिले। इस योजना के तहत सरकार ने बड़े स्तर पर काम भी किया है।
आंकड़ों के अनुसार, देशभर में अब तक करीब 3 करोड़ से अधिक ग्रामीण आवासों का निर्माण पूरा किया जा चुका है। बिहार की बात करें तो यहां भी लगभग 80 लाख से अधिक आवास स्वीकृत किए गए हैं, जिनमें से करीब 65 लाख घर बनकर तैयार हो चुके हैं। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत के करीब ही है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के ग्रामीण इलाकों में भी इस योजना के तहत लाखों लोगों को लाभ मिला है। आंकड़ों के मुताबिक, जिले में करीब 2.5 लाख से अधिक परिवारों को आवास योजना का लाभ दिया जा चुका है। जो एक बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन जब हम जमीनी स्तर पर जाते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है। जिला का नरौली गांव, जो मुसहरी ब्लॉक में स्थित है और जिला मुख्यालय से महज 18 किमी दूर है, वहां की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहां कई गरीब परिवार आज भी झोपड़ियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। गांव के कुछ लोगों ने आवास योजना के लिए आवेदन किया, लेकिन उनका आवेदन किसी न किसी कारण से खारिज हो गया। वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें पहली किस्त तो मिल गई, लेकिन उसके बाद की किस्तों के लिए वे महीनों से इंतज़ार कर रहे हैं।
इस गांव में लगभग 250 से अधिक घर हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक है। गांव के अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर काम, छोटे-मोटे श्रम या स्वरोजगार से अपना जीवन चलाते हैं। रोज कमाने और खाने वाले इन परिवारों के लिए अपने पैसों से एक पक्का घर बनाना आसान नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना ही उनके लिए एक उम्मीद है, लेकिन उनकी यह उम्मीद भी अभी तक पूरी नहीं हो रही है। गांव के लोगों के बीच एक असंतोष भी दिखाई देता है। वे कहते हैं कि उन्हें समय पर योजना का लाभ नहीं मिल रहा। हालांकि वे किसी ठोस प्रमाण के साथ यह नहीं कह सकते कि इसके पीछे क्या कारण है? लेकिन जिस तरह से पात्र होने के बावजूद कई लोग योजना से अब तक बाहर हैं, इससे स्थानीय स्तर पर इसकी पारदर्शिता को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। यह स्थिति केवल नरौली गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलती है।
आवास योजना का लाभ नहीं मिलने का असर सिर्फ रहने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लोगों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। नरौली गांव के कई परिवार बेहतर जीवन की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन करने पर मजबूर हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि एक पक्की छत पाने की मजबूरी भी है। शहरों में काम करके वे किसी तरह अपने परिवार को सुरक्षित जीवन देना चाहते हैं। हालांकि हर गरीब को पक्का घर मिले इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। इसका प्रमाण साल 2026-27 का केंद्रीय बजट है जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए लगभग 80,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है। इसका उद्देश्य है कि अधिक से अधिक लोगों को इस योजना का लाभ मिल सके और ग्रामीण क्षेत्रों में आवास की समस्या को तेजी से हल किया जा सके।
बिहार सरकार ने भी अपने बजट में गरीबों के आवास के लिए कई योजनाओं और धनराशि का प्रावधान किया है। राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत उन परिवारों को भी शामिल करने की कोशिश की है, जो किसी कारणवश प्रधानमंत्री आवास योजना से बाहर रह गए हैं। इसके लिए राज्य स्तर पर हजारों करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है, ताकि हर जरूरतमंद तक मदद पहुंचाई जा सके। फिर भी, चुनौती सिर्फ योजना बनाने या बजट आवंटित करने की नहीं है, बल्कि उसे सही समय पर और सही लोगों तक पहुंचाने की है। जब कोई परिवार सालों तक अपने घर की दूसरी या तीसरी किस्त का इंतज़ार करता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर देरी नहीं कहलाती है, बल्कि यह किसी के सपनों के टूटने का एहसास भी कराती है।
जरूरत इस बात की है कि योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत किया जाए। लाभार्थियों की सूची को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए, आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और किस्तों के भुगतान को समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही, पंचायत स्तर पर निगरानी समितियों को सक्रिय किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गांव का कोई भी पात्र परिवार इस योजना से वंचित न रहे। अगर सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार के हर गांव में हर गरीब परिवार के सिर पर एक पक्की छत होगी।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)
लेकिन जब हम जमीनी स्तर पर जाते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है। जिला का नरौली गांव, जो मुसहरी ब्लॉक में स्थित है और जिला मुख्यालय से महज 18 किमी दूर है, वहां की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहां कई गरीब परिवार आज भी झोपड़ियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। गांव के कुछ लोगों ने आवास योजना के लिए आवेदन किया, लेकिन उनका आवेदन किसी न किसी कारण से खारिज हो गया। वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें पहली किस्त तो मिल गई, लेकिन उसके बाद की किस्तों के लिए वे महीनों से इंतज़ार कर रहे हैं।
इस गांव में लगभग 250 से अधिक घर हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक है। गांव के अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर काम, छोटे-मोटे श्रम या स्वरोजगार से अपना जीवन चलाते हैं। रोज कमाने और खाने वाले इन परिवारों के लिए अपने पैसों से एक पक्का घर बनाना आसान नहीं है। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना ही उनके लिए एक उम्मीद है, लेकिन उनकी यह उम्मीद भी अभी तक पूरी नहीं हो रही है। गांव के लोगों के बीच एक असंतोष भी दिखाई देता है। वे कहते हैं कि उन्हें समय पर योजना का लाभ नहीं मिल रहा। हालांकि वे किसी ठोस प्रमाण के साथ यह नहीं कह सकते कि इसके पीछे क्या कारण है? लेकिन जिस तरह से पात्र होने के बावजूद कई लोग योजना से अब तक बाहर हैं, इससे स्थानीय स्तर पर इसकी पारदर्शिता को संदेह के घेरे में खड़ा करता है। यह स्थिति केवल नरौली गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में देखने को मिलती है।
आवास योजना का लाभ नहीं मिलने का असर सिर्फ रहने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह लोगों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करता है। नरौली गांव के कई परिवार बेहतर जीवन की तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन करने पर मजबूर हैं। उनके लिए यह सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं है, बल्कि एक पक्की छत पाने की मजबूरी भी है। शहरों में काम करके वे किसी तरह अपने परिवार को सुरक्षित जीवन देना चाहते हैं। हालांकि हर गरीब को पक्का घर मिले इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है। इसका प्रमाण साल 2026-27 का केंद्रीय बजट है जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए लगभग 80,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्षों की तुलना में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है। इसका उद्देश्य है कि अधिक से अधिक लोगों को इस योजना का लाभ मिल सके और ग्रामीण क्षेत्रों में आवास की समस्या को तेजी से हल किया जा सके।
बिहार सरकार ने भी अपने बजट में गरीबों के आवास के लिए कई योजनाओं और धनराशि का प्रावधान किया है। राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत उन परिवारों को भी शामिल करने की कोशिश की है, जो किसी कारणवश प्रधानमंत्री आवास योजना से बाहर रह गए हैं। इसके लिए राज्य स्तर पर हजारों करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है, ताकि हर जरूरतमंद तक मदद पहुंचाई जा सके। फिर भी, चुनौती सिर्फ योजना बनाने या बजट आवंटित करने की नहीं है, बल्कि उसे सही समय पर और सही लोगों तक पहुंचाने की है। जब कोई परिवार सालों तक अपने घर की दूसरी या तीसरी किस्त का इंतज़ार करता है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर देरी नहीं कहलाती है, बल्कि यह किसी के सपनों के टूटने का एहसास भी कराती है।
जरूरत इस बात की है कि योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत किया जाए। लाभार्थियों की सूची को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाए, आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और किस्तों के भुगतान को समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही, पंचायत स्तर पर निगरानी समितियों को सक्रिय किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि गांव का कोई भी पात्र परिवार इस योजना से वंचित न रहे। अगर सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाए, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार के हर गांव में हर गरीब परिवार के सिर पर एक पक्की छत होगी।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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