छोटू खान
उदयपुर, राजस्थानसाल 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत सरकार से जुड़े विभिन्न स्वास्थ्य आकलनों में यह चिंता सामने आई कि भारत में हर सात में से एक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहा है। वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज की रिपोर्टों के अनुसार युवाओं में तनाव, अवसाद और चिंता के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे बेरोजगारी, आर्थिक असुरक्षा, पारिवारिक दबाव, सोशल मीडिया की प्रतिस्पर्धा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित किया है। लेकिन इन आँकड़ों के पीछे छिपे चेहरे अक्सर दिखाई नहीं देते। खासकर उन युवाओं के, जो रोजमर्रा की जिंदगी में सामान्य दिखते हैं, मगर भीतर से लगातार टूट रहे होते हैं।
राजस्थान के उदयपुर शहर की सुखेर बस्ती में युवाओं से हुई बातचीत इसी अनदेखे सच को सामने लाती है। यहाँ रहने वाले 27 वर्षीय मुकेश (बदला हुआ नाम), जो बस में कंडक्टर का काम करते हैं, कहते हैं कि उनके पास काम तो है, लेकिन संतोष नहीं। वे अपना कुछ अलग करना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक हालात और अवसरों की कमी उन्हें लगातार तनाव में रखती है। कई बार यह तनाव उन्हें नशे की ओर धकेल देता है और वह न चाहते हुए भी नशा करने पर मजबूर हो जाते हैं। उन्हें अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी से हट कर कुछ नया और अनोखा करने का जुनून है, लेकिन इसके लिए न तो उन्हें कोई रास्ता नजर आता है और न ही कोई रास्ता दिखाने वाला। यह केवल किसी एक युवक की पीड़ा नहीं है, बल्कि उन लाखों युवाओं की हकीकत है जो काम तो कर रहे हैं, लेकिन अपने सपनों और इच्छाओं से लगातार दूर होते जा रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब व्यक्ति लंबे समय तक असंतोष और दबाव में जीता है, तो उसका असर सबसे पहले उसके आत्मविश्वास पर पड़ता है।
यह समस्या केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है। इस बस्ती की 20 वर्षीय काजल (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि कई बार उसे लगता है कि परिवार उसे समझना ही नहीं चाहता। वह क्या चाहती है, उसका क्या सपना है यह बात वह अपने परिवार को समझा नहीं पा रही है या परिवार समझने को तैयार नहीं है। काजल की बातों में गुस्सा भी है और एक ऐसी बेचैनी भी, जिसे परिवार अक्सर 'जिद' या 'बदतमीजी' कहकर टाल देता है। वहीं 22 वर्षीय एक अन्य युवती बताती हैं कि कार्यस्थल का दबाव और ऑफिस की राजनीति उसे मानसिक रूप से इतना थका देती है कि कई बार काम पर जाने का मन ही नहीं करता।
दूसरी ओर, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में अब भी एक खतरनाक चुप्पी मौजूद है। सुखेर बस्ती के प्रवीण (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि गरीबी के कारण उन्हें बचपन में ही घर छोड़ना पड़ा। पारिवारिक बिखराव और रिश्तों में असुरक्षा ने उनके भीतर लगातार डर पैदा किया है। वे स्वीकार करते हैं कि तनाव कम करने के लिए उन्होंने शराब जैसे नशे का सहारा लेना शुरू किया।
दरअसल हमारे देश में जेंडर को लेकर बहुत अधिक भेदभाव है। महिलाओं को जहां कमजोर माना जाता है, वहीं पुरुषों को बचपन से मजबूत बने रहने की सीख दी जाती है। रोना, डरना या मदद माँगना कमजोरी माना जाता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में पुरुष अपनी मानसिक परेशानियों को किसी के साथ साझा करने की जगह भीतर ही दबाकर जीते रहते हैं, जब तक कि स्थिति गंभीर न हो जाए। जब स्थिति उनके कंट्रोल से बाहर हो जाती है तो वह आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े भी यह संकेत देते हैं कि आत्महत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में काफी अधिक है, जो इस सामाजिक दबाव की गंभीरता को दर्शाता है।
हालाँकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। सुखेर बस्ती की 20 वर्षीय गुड़िया (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि वह अपना मानसिक तनाव दूर करने के लिए वीडियोग्राफी सीखने और रचनात्मक काम करने में समय बिताती हैं। इससे उन्हें मानसिक राहत मिलती है। गुड़िया की यह कोशिश बताती है कि यदि युवाओं को अपनी बात कहने, सीखने और अभिव्यक्ति के अवसर मिलें, तो वे तनाव से बाहर निकलने के रास्ते खोज सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कला, खेल, सामुदायिक गतिविधियाँ और संवाद युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि हमारा समाज मानसिक स्वास्थ्य को अब भी इंसान की व्यक्तिगत कमजोरी के चश्मे से देखना कब बंद करेगा? यह एक ऐसा साइलेंट तूफान है जिस पर गंभीरता से चर्चा करने की जरूरत है। लेकिन क्या हमारे स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत होती है? क्या परिवार बच्चों पर अपनी उम्मीदों को थोपने की जगह उनकी भावनाओं को सुनने और समझने के लिए तैयार है? हम यह कहते नहीं थकते हैं कि भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन यदि यही युवा भीतर से तनाव, अकेलेपन और असुरक्षा से घिरा होगा, तो क्या वास्तविक अर्थ में देश का सामाजिक और आर्थिक विकास संभव होगा?
हमें यह समझने की जरूरत है कि मानसिक स्वास्थ्य केवल अस्पतालों या दवाइयों का विषय नहीं है। यह उस वातावरण से जुड़ा प्रश्न है जहाँ व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार मिले, असफल होने पर अपमानित न किया जाए, और मदद माँगने को कमजोरी न समझा जाए। सुखेर बस्ती की ये आवाज़ें केवल एक इलाके की कहानी नहीं हैं। ये उन करोड़ों भारतीय युवाओं की आवाज़ हैं जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मुस्कुराते तो दिखते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर हर सेकेंड कई अनकहे संघर्षों से गुजर रहे होते हैं।
अब यह समाज, सरकार और हम सभी की जिम्मेदारी है कि इन खामोश आवाज़ों को केवल सुना ही नहीं जाए, बल्कि समझा भी जाए और सबसे बड़ी बात कि उन्हें यह विश्वास दिलाया जाए कि वह अकेले नहीं हैं, समाज उनके साथ खड़ा है। तभी हम उन्हें टूटने और बिखरने से बचा सकते हैं। इसकी शुरुआत यदि आज और अभी से नहीं की गई तो कल बहुत देर हो जाएगी।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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