✨ एक सपना, एक ज़िंदगी
लेखिका: वंदना
उम्र: 26 वर्ष
शिक्षा: स्नातक
फिर एक दिन हम भी बड़े हो गए, इतने बड़े कि,
माँ की गोद में सिर रखकर रो लेने को तरसने लगे,
पिता की उंगली पकड़कर सड़क पार करना,
अब बस एक अधूरा सपना बनकर रह गया।
जिस स्कूल को कभी अपना दूसरा घर कहते थे,
उस रास्ते से गुज़रे भी अब ज़माना बीत गया।
सपनों के पीछे भागते-भागते हम इतने दूर आ गए,
कि अपने ही घर में मेहमान बनकर जाने लगे।
वक़्त के साथ सिर्फ़ घड़ियाँ ही नहीं बदलीं,
पूरा दौर बदल गया, और शायद हमारी ज़िंदगी भी।।
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👮♀️ मैं भी वर्दी पहनूँगी
लेखिका: ममता रावत
कक्षा: 8वीं
बनना है मुझे भी एक पुलिस ऑफिसर,
यही मेरा सपना है, अपना सा प्यारा सा।
एक दिन पुलिस की वर्दी पहनकर,
मैं भी समाज में बदलाव लाऊँगी।
लड़कियों के सपनों को नई उड़ान दिलाऊँगी,
और तोड़ दूँगी उन पुरानी रूढ़ियों को,
जो कहती हैं कि सिर्फ बेटे ही आगे बढ़ते हैं।
दुनिया को दिखा दूँगी कि लड़कियां भी,
जो मुकाम चाहे, हासिल कर सकती हैं।
मैं बनूँगी अपने माँ-बाबा की उम्मीद,
उनकी ज़िंदगी का सहारा।।
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🌈 मेरा सपना
लेखिका: भावना बिष्ट
कक्षा: 7वीं
गाँव: सुराग, उत्तराखंड
मेरे सपनों ने उड़ान भरनी शुरू की,
जब से मैं दिशा सभा से जुड़ी।
पहले सपने बिखरे-बिखरे थे,
उनका नहीं था कोई ठिकाना।
इधर-उधर भटकती सोच में,
बस सपनों की बातें ही हुआ करती थीं।
लेकिन दिशा सभा से जुड़ने के बाद,
मुझे मेरे सपनों को नई राह मिली।
नई सोच और खुद पर विश्वास मिला।
अब मेरे सपनों के ठिकाने बदल गए हैं,
अब सिर्फ़ सपने देखना ही नहीं है,
मुझे उसे खुलकर जीना भी है।
कुछ करना है, कुछ बनना है,
और अपने सपनों को सच में बदलना है।।
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🕊️ मैं होती चिड़िया
लेखिका: पलक
कक्षा: 9वीं
गाँव: जखेड़ा
अगर मैं चिड़िया होती,
तो खुले आसमान में उड़ती।
न कोई रोक-टोक होती,
न किसी बात की टेंशन।
मैं एक आज़ाद पंछी बनकर
अपने रास्ते खुद चुन लेती।
अपने पंखों पर उड़ती,
अपनी दिशा खुद तय करती।
और पूरी दुनिया में प्यार बाँटती,
न किसी के कैद में रहती।
अपने सपनों की ऊँची उड़ान भरती,
क्योंकि अगर मैं चिड़िया होती,
तो खुले आसमान में बेखौफ उड़ती।।
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🌼 “सपने वही नहीं जो सोते वक्त देखे जाते हैं,
सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते।” 🌼
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