मनीषा कुमारी
पिछले एक दशक में देश में करोड़ों घरों में शौचालय बनने के दावे किए गए हैं. कहा यह गया कि जो परिवार शौचालय बनाने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है, उन्हें सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जाती है. लेकिन बिहार के अनेक ग्रामीण इलाकों की जमीनी हकीकत आज भी इन दावों से मेल नहीं खाती। मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित नरौली गांव इसकी एक तस्वीर है। लगभग 250 से अधिक घरों वाले इस गांव में अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार रहते हैं।
अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूरी, खेतिहर कार्य, छोटे-मोटे श्रम या स्वरोजगार के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर इन परिवारों में आज भी बड़ी संख्या ऐसे घरों की है, जिन्हें शौचालय निर्माण के लिए सरकारी सहायता नहीं मिली। परिणामस्वरूप वे घर के बाहर बांस, टीन, प्लास्टिक या फूस से बने अस्थायी शौचालयों का इस्तेमाल करने या खुले में शौच जाने के लिए मजबूर हैं। यह मजबूरी पूरे परिवार की है, लेकिन इसका सबसे बड़ा बोझ महिलाओं और किशोरियों के हिस्से आता है।
ग्रामीण समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि खुले में शौच जाना सामान्य बात है। पुरुष सुबह या शाम खेत की ओर चले जाते हैं और इसे जीवन का हिस्सा मान लेते हैं। लेकिन शायद ही कोई यह सोचता है कि एक महिला या किशोरी के लिए यह केवल शौच जाना नहीं, बल्कि हर दिन अपने सम्मान, सुरक्षा और निजता की परीक्षा देना है। उन्हें दिन निकलने से पहले या अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है ताकि कोई देख न ले। कई बार घंटों तक शौच रोककर रखना पड़ता है, जिससे पेट और मूत्र संबंधी संक्रमण, कब्ज तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं। किशोरियों के लिए मासिक धर्म के दौरान यह स्थिति और अधिक कठिन हो जाती है। स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय के अभाव में वे संक्रमण के खतरे के साथ-साथ मानसिक तनाव भी झेलती हैं।
नरौली गांव के कई परिवार बताते हैं कि उन्होंने शौचालय निर्माण के लिए कई बार आवेदन किए, पंचायत स्तर पर जानकारी ली, लेकिन उन्हें आज तक सहायता राशि नहीं मिली। कुछ परिवारों के नाम सूची में नहीं जुड़े, तो कुछ मामलों में पात्रता और प्रक्रिया की जानकारी ही स्पष्ट नहीं हो सकी। आर्थिक तंगी के कारण वे अपने स्तर पर पक्का शौचालय भी नहीं बनवा सके। नतीजा यह हुआ कि अस्थायी ढांचे या खुले स्थान ही उनकी मजबूरी बन गए। जब योजनाओं का लाभ सबसे कमजोर परिवारों तक नहीं पहुंचता, तब केवल निर्माण के आंकड़े वास्तविक बदलाव की कहानी नहीं कह पाते।सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत फरवरी 2026 तक देशभर में 11 करोड़ से अधिक व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों का निर्माण किया जा चुका है। बिहार में भी करोड़ों ग्रामीण परिवारों को शौचालय उपलब्ध कराने का दावा किया गया है। जिनमें मुजफ्फरपुर जिले की प्रगति भी दर्ज है। हालांकि इन आंकड़ों के बावजूद नरौली जैसे अनेक गांव यह सवाल खड़ा करते हैं कि यदि कागजों पर अधिकांश परिवारों तक योजना पहुंच चुकी है, तो आज भी इतने लोग सरकारी सहायता से क्यों वंचित हैं?
यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि घर में शौचालय न होने का असर पुरुष और महिला पर समान नहीं होता। पुरुष दिन के किसी भी समय अपेक्षाकृत आसानी से बाहर जा सकते हैं। समाज उनकी आवाजाही पर उतनी निगरानी नहीं रखता। लेकिन महिलाओं और किशोरियों के लिए हर कदम सामाजिक निगाहों, असुरक्षा और संकोच से जुड़ा होता है। उन्हें कई बार अकेले नहीं जाने दिया जाता, समूह बनाकर जाना पड़ता है या अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है। रास्ते में छेड़छाड़, अभद्र टिप्पणियां, पीछा किए जाने या यौन हिंसा का खतरा भी बना रहता है। देश में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां खुले में शौच के लिए गई महिलाओं और किशोरियों के साथ अपराध हुए। इसलिए घर में शौचालय केवल सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण साधन है।
सबसे दुखद बात यह है कि इस समस्या को अक्सर घर के भीतर भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। यदि परिवार के पास सीमित संसाधन हों तो सबसे पहले घर की मरम्मत, मोबाइल, मोटरसाइकिल, खेती के उपकरण या अन्य खर्च प्राथमिकता बन जाते हैं। शौचालय को अक्सर बाद की जरूरत मान लिया जाता है। इसका कारण यह भी है कि निर्णय लेने वाले अधिकतर पुरुष होते हैं, जिन्हें इस समस्या का सामना उसी रूप में नहीं करना पड़ता जैसा महिलाओं और किशोरियों को करना पड़ता है। जब तक किसी परेशानी का बोझ स्वयं महसूस न हो, तब तक उसका महत्व भी कम आंका जाता है। यही सोच महिलाओं की गरिमा को एक निजी समस्या बनाकर छोड़ देती है, जबकि यह पूरे समाज की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
यदि किसी घर में बेटी या बहू को रोज अंधेरा होने का इंतजार करना पड़े, यदि उसे अपनी प्राकृतिक जरूरत को घंटों रोकना पड़े, यदि हर दिन उसे असुरक्षा के डर के साथ घर से बाहर जाना पड़े, तो क्या इसे केवल स्वच्छता की समस्या कहा जा सकता है? यह सम्मान, स्वास्थ्य, समान अवसर और सुरक्षित जीवन के अधिकार का प्रश्न है। जिस समाज में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा की बात की जाती है, वहां घर के भीतर शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध कराना सबसे पहला कदम होना चाहिए। यदि आज भी गांव की किसी लड़की को शौचालय जाने के लिए सूरज डूबने का इंतजार करना पड़े, तो फिर हम किस विकास की बात कर रहे हैं?

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