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हाकीम को एक चिट्ठी लिख दो

हाकीम को एक चिट्ठी लिख दो


नवोदित कवि

अमरेंद्र कुमार 

हाकीम को एक चिट्ठी लिख दो,

बस इतना लिख दो—लानत है।

गठरी झूठ की, मेला फरेब का,

बातों में छुपी मक्कारी है।

मुख पर मुस्कान, पर है छल की,

विध्वंश की तैयारी है।

वादों का ढेर, भरोसा गायब,

जज्बातों में भी उदासी है।

गुमान है उन्हें हुनर का अपने,

हकीकत में नाकामी है।

सो

कोशिश करो, उठो, आह्वान करो,

चींटी, तितैया को साथ करो,

सपनों का मंजिल पाना है तो,

उद्यत दिन—रात अभ्यास करो।

डरना छोड़ो, लड़ना सीखो,

सब का एक दिन लदता है।

झूठ की इमारत ढहती है,

सच का पर्दा फटता है।

वह दिन जब आ जाए,

जब सारे मिलकर यह गाएं कि 

हम एक हैं— हम एक है—

तभी अदद एक चिट्ठी लिख दो—लानत है।

हाकीम को एक चिट्ठी लिख दो,

बस इतना लिख दो—लानत है।

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