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मशरूम लगाएं, आमदनी बढ़ाएं

 ✅ बेरोजगारों के लिए मशरूम वरदान से कम नहीं ✅ कम लागत में अधिक आमदनी 

✅ पौष्टिकता से भरपूर  

अमृतांज इंदीवर 

छोटे जोत वाले किसानों के लिए जीविकोपार्जन करना मुश्किल हुआ, तो किसानों ने साग-सब्जी के साथ-साथ मशरूम का उत्पादन शुरू कर दिया। मशरूम स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी है और आमदनी के हिसाब से भी लाभदायक। बच्चों की पढ़ाई -लिखाई के लिए भी खर्च निकल जाता है । ग्रामीणों ने समूह बनाकर कई जगह मशरूम की खेती शुरू कर दी है। कई कामकाजी पुरुष व महिलाओं ने अपने घर में ही मशरूम का उत्पादन करने लगे हैं। मुजफ्फरपुर स्थित डूमरी परमानंदपुर के पंकज कुमार एक युवा किसान हैं। इन्होंने मशरूम का उत्पादन शुरू किया, तो देखा-देखी आसपास के गांव के लोगों ने भी मशरूम की खेती शुरू कर दी। पंकज के साथ-साथ पिंटू सिंह भी ओएस्टर मशरूम लगाया है। वहीं, शिक्षिका रिचा रानी अपने किचेन में मशरूम लगाकार आमदनी के साथ-साथ सेहत को सुधार रहीं हैं। इनका मानना है कि महिलाएं अपने किचेन के अलावा घर के अंदर भी मशरूम को बैग बनाकर उत्पादन कर सकते हैं। इस काम के लिए महिलाओं को शर्म नहीं करनी चाहिए। 

इन दिनों हाट और फलों की दुकानों के अलावा ऑनलाइन आमेजन आदि वेबसाइट पर भी मशरूम की बिक्री हो रही है। आमलोग भी मशरूम के गुण और स्वाद से परिचित हो रहे हैं, जिससे बाजार में मशरूम की मांग भी बढ़ गई है। मुजफ्फरपुर जिले के कांटी प्रखंड स्थित कोठिया के किसान लाल बहादुर प्रसाद ने अपनी मेहनत, लगन व दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर गांव के विनय कुमार, हनुमान प्रसाद, विमला देवी, अंजनी कुमार शंभू प्रसाद बिंदेश्वरी प्रसाद गणेश प्रसाद समिति राशि किसानों को मशरूम की खेती के लिए आगे लाने का काम किया सबसे रहस्य की बात तो यह है कि कैंसर से पीड़ित लाल बहादुर ने बीमारी को जड़ से समाप्त करने के लिए मशरूम खाना, मशरूम का उत्पादन करना, मशरूम के डस्ट बनाना, मशरूम का प्रचार-प्रसार करना शुरू कर दिया।
आज कोठिया के अधिकांश लोग भोजन के साथ मशरूम की सब्जी, आचार, पनीर, सिरका, चटनी, मुरब्बा का स्वाद चख रहे हैं। उन्हें तृप्ति भी मिल जाती है और आमदनी भी हो जा रही है। किसानों ने फरवरी 2012 से यह काम शुरू किया आज मशरूम की जो पैदावार है वह दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इसके बाद लाल बहादुर गांव के कुछ किसानों के साथ पूसा कृषि विश्वविद्यालय से 3 दिनों तक प्रशिक्षण प्राप्त किया।  शुरू हो गया गांव में मशरूम की खेती का नया प्रयोग। देखा-देखी गांव के लोग मशरूम के उत्पादन में लग गए।  लाल बहादुर छोटे मझोले किसान परिवार से आते हैं सिर्फ लाल बहादुर कि नहीं बात करें, बल्कि गांव के अधिकांश लोग आज मशरूम की खेती से पैसे अर्जित कर रहे हैं। लाल बहादुर के चारों बच्चों की पढ़ाई लिखाई मशरूम के पैसे से हो रही है। इसके अलावा पशुपालन जैविक खाद उत्पादन औषधीय खेती सब्जी की खेती से सालाना अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। किसानों का नारा है-‘‘ वैकल्पिक खेती अपनाओ खुशहाली लौट आओ।’’
लाल बहादुर ने महज इस कार्य को करने के लिए 3000/रु लगाया था। आज तेजी से काम बढ़ता जा रहा है और पूंजी भी बढ़ती जा रही है। अब तो लाल बहादुर बीज का उत्पादन भी शुरू कर दिया है। जिससे आसपास के लोगों को बीज लाने के लिए दूर नहीं जाना पड़ता है। ऐसा मानना है लाल बहादुर का कि मशरूम की खेती सबसे जरूरी इसलिए है कि लोगों की सेहत दुरुस्त रहे। यह सुरक्षित भोजन एवं एक पौष्टिकता भी ला सके जिस प्रकार से भोजन में दूध, दही, फल आदि खाते हैं और इसके लिए बहुत पैसे खर्च करते हैं। मात्र एक मशरूम ऐसा भोज पदार्थ है जो शरीर के सभी तत्वों को पूरा करता है जिसमें-  प्रोटीन 2.78 से लेकर 3 तक और वसा 0.25 -0 6.5 रेशा 0.7-1.67 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 1.30-6.28, की मात्रा मौजूद है, जो 24.44-34.4414 प्रतिषत तक उचित काॅलोरी का स्रोत है। साथ ही विटामिन बी1, बी2, सी, डी, व खनिज-लवणों-से भरपूर है। कई बीमारियों के लिए अचूक दवा है- कैंसर, बहुमूत्र रोग, खून की कमी, वेरी-वेरी, दिल की बीमारी, मधुमेह आदि में काफी असरदायक है। इस प्रकार मशरूम को हम औषधियों का राजा भी कहते हैं। इसमें एंटी-आक्सीडेंट, सेलेनियम व जिंक प्रचूर मात्रा में मौजूद रहते हैं। जिससे दवा कंपनियां दवा भी बनाती है। आयुर्वेदिक कंपनियां मषरूम से बनी दवा ( हंदवकमतउं ) बाजार में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए बेच रही है। मशरूम में उपलब्ध तत्व खतरनाक बीमारियों से रक्षा करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है।
मशरूम की खेती कोई भी कम पूंजी में अपने घर की अंधेरी कोठरी में या फूस की झोपड़ी में शुरू कर सकता है। मशरूम प्रोटीन का स्रोत है, इसे घर की नमी वाली जगह में उगाया जा सकता है। महिलाएं भी किचन गार्डन के रूप में इसकी खेतीकर अपना भविष्य संवार सकती हैं।  मशरूम की उन्नत प्रजातियां ओयस्टर, बटन, पैडी, स्ट्रा, शिटेक, ब्लैक  इयर, काबुल ढींगरी, पराली, दूधिया और रेशी  मशरूम है। पुआल या गेहूं के भूसे को गर्म पानी में 24 घंटे भिगोकर रखें इससे भूसा उपचारित हो जाता है। फिर भूसे को पानी से निकालकर हल्का सूखा लें। 18x 24 इंच के पाॅलिथीन बैग में एक सौ ग्राम बीज डालकर मिला लें फिर 1 इंच मोटा भूसे से ढककर पाॅलिथीन का मुंह बांध दें। बैग में कील से 20-25 जगह छिद्र कर दें। घर के अंधेरी कोठरी या झोपड़ी या सिकहर (छींका बनाकर) में बैग को टांग दें। 20 से 25 दिनों के बाद मशरूम के खूबसूरत पंख निकल आएंगे। जिससे आराम से तोड़कर सुरक्षित कर लें । प्रथम बार दो से ढाई किलो उसके बाद 25 दिनों के अंतराल के हिसाब से 3 बार होगा। बाजार में कच्चा मशरूम 200/ से 250 रुपए प्रति किलो और सूखा 800 से 1000 की दर से बिकता है। किसान की आमदनी तथा मशरूम के उत्पादन के बढ़ावा के लिए सरकार की महत्वपूर्ण तीन योजनाएं  किसानों के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस योजना में 50 प्रतिशत तक अनुदान देने का प्रावधान है। मशरूम उत्पादन यूनिट, मशरूम स्पाॅन यूनिट, मशरूम कंपोस्ट यूनिट, प्रशिक्षण आदि देने की योजना है। मशरूम की खेती संबंधी विशेष जानकारी के लिए कृषि विश्वविद्यालय एवं कृषि विभाग से शीघ्र संपर्क करें, वहां से तमाम तरह की जानकारी आपको मिल सकती है।




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