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विकास परसराम मेश्राम
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आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा, भूमि क्षरण और गंभीर जल संकट जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रही है। तकनीकी समाधान, नई नीतियाँ और विकास के आधुनिक मॉडल अपनाने के बावजूद पृथ्वी की पारिस्थितिकी और सामाजिक ताना-बाना लगातार असंतुलन की ओर बढ़ रहा है। संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक विखंडन आधुनिक विकास के अनचाहे लेकिन स्थायी परिणाम बन चुके हैं।
ऐसे समय में जब दुनिया समाधान की तलाश में भटक रही है, आदिवासी समुदाय अपनी परंपराओं, सामूहिक जीवनशैली और पीढ़ियों से संचित ज्ञान के माध्यम से एक वैकल्पिक रास्ता दिखाते हैं—एक ऐसा रास्ता जो संतुलन, सामूहिकता और स्थिरता पर आधारित है।
हलमा: सामूहिक श्रम और जीवन दर्शन
आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं के साथ सहजीवन का रिश्ता निभाता आया है। इन्हीं परंपराओं में से एक है ‘हलमा’—एक पारंपरिक आदिवासी प्रथा, जिसे केवल कृषि श्रमदान कहना इसकी व्यापकता को सीमित करना होगा। हलमा वास्तव में समुदाय, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण का जीवन दर्शन है।
हलमा में समुदाय के लोग बिना किसी आर्थिक लेन-देन के एक-दूसरे के खेतों में काम करते हैं। बुआई, निराई-गुड़ाई, फसल कटाई जैसे कार्यों में पूरा गाँव एक परिवार की तरह जुटता है। यहाँ श्रम की कीमत पैसे से नहीं, विश्वास और संबंधों से तय होती है।
हलमा की दो-स्तरीय संरचना: व्यक्तिगत सहयोग से सामुदायिक विकास तक
हलमा व्यवस्था दो स्तरों पर संचालित होती है:
1. व्यक्तिगत सहयोग
जब किसी किसान को अधिक श्रम की आवश्यकता होती है, तब अन्य ग्रामीण स्वेच्छा से मदद के लिए आगे आते हैं। इसमें कोई हिसाब-किताब नहीं होता, बल्कि यह विश्वास होता है कि ज़रूरत पड़ने पर पूरा समुदाय साथ खड़ा होगा।
2. सामुदायिक श्रमदान
गाँव के साझा हितों से जुड़े कार्य—जैसे तालाब खुदाई, सड़क निर्माण या जल संरक्षण संरचनाएँ—सभी लोग मिलकर बिना मजदूरी के करते हैं। यह सामुदायिक संपत्ति और सामूहिक उत्तरदायित्व का सशक्त उदाहरण है। यही दो-स्तरीय ढाँचा हलमा को एक समग्र सामाजिक व्यवस्था बनाता है।
गोदडिया गाँव: हलमा के जरिए जल संरक्षण की मिसाल
मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लॉक स्थित ग्राम गोदडिया ने आधुनिक जल संकट के दौर में आदिवासी परंपरा की प्रासंगिकता को जीवंत कर दिखाया है। यहाँ ग्रामीणों ने सदियों पुरानी हलमा पद्धति को पुनर्जीवित कर जल संरक्षण का सराहनीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
कटारा फलिया की ऊँची टेकरी पर पानी के बहाव को रोकने और भू-जल स्तर सुधारने के लिए ग्रामीणों ने मिलकर गली प्लग (छोटा डैम) का निर्माण किया। इस प्रयास से न केवल पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ी, बल्कि मवेशियों के लिए भी जल सुनिश्चित हुआ।
श्रमदान नहीं, उत्सव: हलमा की जीवंत संस्कृति
इस जल संरक्षण अभियान की खास बात यह रही कि इसे बोझ नहीं, बल्कि उत्सव की तरह मनाया गया। चालीस से अधिक परिवार ढोल, कुंडी और थाली की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए श्रमदान में शामिल हुए।
वागधारा गठित ग्राम स्वराज समूह के दिनेश कटारा के अनुसार, “यदि समाज एकजुट होकर प्रयास करे तो जल संकट जैसी समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।”
ब्लॉक सहजकर्ता मुकेश पोरवाल ने भी सामूहिकता को हर चुनौती का समाधान बताया।
महिलाओं की भागीदारी: हलमा की सशक्त आत्मा
गोदडिया की कहानी में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। ललिता कटारा, प्रेमलता डामर और लीलावती सिंगाड़ जैसी महिलाओं ने न केवल श्रमदान किया, बल्कि नेतृत्व भी संभाला।
सक्षम समूह की सदस्य ललिता कटारा कहती हैं,
“काम कठिन था, लेकिन एकता और सहयोग ने हमें आगे बढ़ाया।”
यह कथन हलमा की आत्मा को दर्शाता है—जहाँ महिलाएँ केवल श्रमिक नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माता भी हैं। इससे उनका आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण होता है।
हलमा और आर्थिक आत्मनिर्भरता
सामूहिक श्रम से किसानों की मजदूरी लागत घटती है और बाहरी निर्भरता कम होती है। यह आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनता है। जब समुदाय अपने संसाधनों से अपनी जरूरतें पूरी करता है, तो आत्मसम्मान और सामूहिक गौरव भी विकसित होता है।
गांधी का स्वराज, सर्वोदय और हलमा
महात्मा गांधी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, ग्राम स्वराज और सामुदायिक सशक्तिकरण का सपना था। हलमा इसी विचार का जीवंत रूप है।
विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन में भी सामूहिक श्रम और सहयोग का केंद्रीय स्थान था। हलमा सर्वोदय के सिद्धांत को व्यवहार में उतारता है—जहाँ सबका उत्थान होता है, किसी का शोषण नहीं।
समाधान की दिशा: परंपरा में भविष्य
हलमा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सतत विकास का वैकल्पिक मॉडल है। यह न पूंजीवादी विकास का रास्ता है, न ही राज्य-नियंत्रित व्यवस्था का—बल्कि यह सामुदायिक स्वराज और सहकारिता का मार्ग है।
आज जब दुनिया सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रणनीतियाँ बना रही है, तब आदिवासी समुदायों की ओर देखने की जरूरत है। उनकी जीवनशैली और हलमा जैसी प्रथाओं में भविष्य के समाधान छिपे हैं।
(Disclaimer : यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है; किसी संस्था, समुदाय या निर्णय के लिए लेखक/प्रकाशक उत्तरदायी नहीं हैं।)
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