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रसोई से खेत तक: बायोगैस ने बदली परिवारों की तस्वीर

विकास मेश्राम

राजस्थान

vikasmeshram04@gmail.com

 महंगाई और ईंधन संकट की चुनौती

महंगाई की जिस आंच से देश का हर आम परिवार झुलस रहा है, उसकी सबसे तीखी लपट राजस्थान के आदिवासी इलाकों तक भी पहुंची है। एलपीजी सिलेंडर के दाम जब आसमान छूने लगे और जंगलों की हरियाली सिमटने से लकड़ी भी दुर्लभ हो गई, तब बांसवाड़ा जिले की सज्जनगढ़ तहसील के गांव—पालीबड़ा, सासावड़ला, लोहारिया, मस्कामोहड़ी, बाचलीपाड़ा, डुगरियापाड़ा, बिजलपुर और आमलीपाड़ा—ने एक ऐसा रास्ता खोज निकाला जो न केवल रसोई की समस्या सुलझाता है, बल्कि खेती, स्वास्थ्य और पर्यावरण तीनों पर एक साथ काम करता है। यह रास्ता है बायोगैस का।

रसोई से खेत तक: बायोगैस ने बदली परिवारों की तस्वीर

क्षेत्र की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति

इस इलाके की भूगोल और अर्थव्यवस्था को समझे बिना इस पहल का महत्व समझना कठिन है। बांसवाड़ा के अधिकांश आदिवासी परिवार खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं। मक्का, सोयाबीन और कपास यहां की मुख्य फसलें हैं, लेकिन सीमित वर्षा और गर्म-शुष्क मौसम के कारण रबी में दूसरी फसल लेना बेहद मुश्किल होता है। नकद आय की कमी के कारण हर महीने गैस सिलेंडर भरवाना एक बड़ा बोझ था। दूसरी ओर, पानी की कमी, पशुओं की अनियंत्रित चराई और गर्म हवाओं के कारण क्षेत्र की हरियाली घटती गई, जिससे ईंधन के लिए लकड़ी मिलना दिन-ब-दिन कठिन होता गया। महिलाओं को खाना पकाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर लकड़ी जुटानी पड़ती थी, जिससे समय, श्रम और स्वास्थ्य तीनों पर असर पड़ता था।


बायोगैस पहल और संस्थागत सहयोग

इन्हीं परिस्थितियों में ग्रामीण आजीविका सशक्तिकरण के लिए कार्यरत संस्था वागधारा ने हस्तक्षेप किया। संस्था ने अपनी हिरन, माही और मानगढ़ इकाइयों के माध्यम से इन गांवों में बायोगैस संयंत्रों की स्थापना में सहयोग दिया। वर्ष 2025 तक इस क्षेत्र में कुल 280 बायोगैस संयंत्र स्थापित हो चुके हैं, जिनमें से 40 संयंत्र केवल उपरोक्त गांवों में लगाए गए। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए ग्रामीणों को इस तकनीक की सरल संरचना समझाई गई—एक गड्ढा जिसमें गोबर और पानी का मिश्रण डाला जाता है, एक गुंबदनुमा डोम जिसमें गैस एकत्रित होती है, और एक पाइपलाइन जो गैस को सीधे रसोई तक पहुंचाती है। यह तकनीक नई जरूर थी, लेकिन जटिल नहीं, और कुछ ही समय में यह ग्रामीणों की दिनचर्या का हिस्सा बन गई।


जीवन में बदलाव: अनुभव और परिणाम

इस पहल के परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे। मस्कामोहड़ी गांव की महिला किसान सरिता राकेश डामोर रोजाना लगभग 15 किलोग्राम गोबर और 10 लीटर पानी अपने संयंत्र में डालती हैं और बदले में उन्हें पूरे दिन के लिए पर्याप्त गैस मिल जाती है। सासावड़ला गांव की सीता कटारा बताती हैं कि अब रसोई में धुआं नहीं होता, खाना जल्दी बन जाता है और लकड़ी लाने की मजबूरी खत्म हो गई है। वहीं थावरचंद हकरी के अनुसार महंगाई और अनियमित आय के बीच केवल एलपीजी पर निर्भर रहना संभव नहीं था, लेकिन बायोगैस संयंत्र लगाने के बाद उन्होंने पांच महीनों में लगभग पांच हजार रुपये की बचत की है। पारसिंग मुनिया और धनसिंह कटारा जैसे किसान भी सीमित गोबर और पानी से रोजाना पर्याप्त गैस प्राप्त कर रहे हैं।


आर्थिक लाभ और बचत

आर्थिक दृष्टि से यह बदलाव महत्वपूर्ण है। प्रत्येक परिवार को सालाना औसतन लगभग पांच हजार रुपये की बचत हो रही है। 280 परिवारों के स्तर पर यह बचत लगभग 14 लाख रुपये प्रतिवर्ष बैठती है। यह वही राशि है जो पहले गांव से बाहर खर्च हो जाती थी, लेकिन अब शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि में निवेश की जा रही है।

रसोई से खेत तक: बायोगैस ने बदली परिवारों की तस्वीर

खेती में सुधार: स्लरी का महत्व

बायोगैस संयंत्र का एक और महत्वपूर्ण लाभ स्लरी है, जो गैस बनने के बाद बचा हुआ अवशेष होता है। यह एक उत्कृष्ट जैविक खाद है, जो मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक है। इसके नियमित उपयोग से किसानों ने फसल की गुणवत्ता में सुधार देखा है और रासायनिक उर्वरकों पर खर्च भी कम हुआ है। इस तरह बायोगैस ने ऊर्जा, कृषि और आजीविका के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित किया है।


महिलाओं के जीवन में बदलाव

इस पहल का सबसे गहरा असर महिलाओं के जीवन पर पड़ा है। पहले उन्हें धुएं से भरी रसोई में घंटों काम करना पड़ता था, जिससे आंखों में जलन, खांसी और सांस की समस्याएं आम थीं। अब बायोगैस के उपयोग से रसोई धुएं से मुक्त हो गई है, खाना जल्दी पकता है और समय की बचत होती है। यह बचा हुआ समय अब महिलाएं बच्चों की पढ़ाई, खेती या अन्य कार्यों में लगा रही हैं। स्वास्थ्य के स्तर पर भी सुधार देखने को मिला है।


पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव

पर्यावरण के नजरिए से भी यह पहल बेहद महत्वपूर्ण है। लकड़ी की खपत कम होने से जंगलों पर दबाव घटा है और गोबर के सही उपयोग से मीथेन गैस के अनियंत्रित उत्सर्जन में भी कमी आई है। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह एक प्रभावी और स्थानीय समाधान के रूप में सामने आया है।


आत्मनिर्भरता की ओर कदम

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह परिवर्तन किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि समुदाय की सहभागिता से संभव हुआ है। किसानों और महिलाओं ने मिलकर इस पहल को अपनाया और सफल बनाया। वागधारा संस्था ने केवल मार्गदर्शक की भूमिका निभाई, जबकि असली बदलाव ग्रामीणों की पहल और सहयोग से आया। बांसवाड़ा के ये गांव यह संदेश देते हैं कि आत्मनिर्भरता की शुरुआत साधारण संसाधनों से भी की जा सकती है, और बायोगैस इसका एक सशक्त उदाहरण है।

Disclaimer (अस्वीकरण)

यह लेख विभिन्न स्रोतों, क्षेत्रीय अनुभवों और उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दिए गए विचार, आंकड़े और निष्कर्ष लेखक के अपने हैं, जिनके लिए पूर्णतः लेखक ही जिम्मेदार होंगे। इसका उद्देश्य केवल जानकारी और जागरूकता फैलाना है। किसी भी योजना या तकनीक को अपनाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ या स्थानीय प्राधिकरण से सलाह लेना उचित होगा।

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