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योजना है तो असर भी दिखना चाहिए

अनामिका कुमारी

सीतामढ़ी, बिहार


घर के दरवाज़े पर लगा एक सरकारी नल अक्सर विकास की तस्वीर माना जाता है। लेकिन अगर उस नल से महीनों तक एक बूंद पानी भी न निकले, तो वह सुविधा का प्रतीक नहीं, बल्कि अधूरे वादे की याद बन जाता है। भारत में हर घर तक सुरक्षित पेयजल पहुँचाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर योजनाएं लागू की गईं। करोड़ों रुपये खर्च हुए, लाखों किलोमीटर पाइपलाइन बिछाई गई और करोड़ों घरों तक नल कनेक्शन पहुँचाने का दावा किया गया। इसके बावजूद बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाएं आज भी सिर पर बाल्टी लेकर हैंडपंपों की कतार में खड़ी दिखाई देती हैं। यह समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है, बल्कि उस विकास की है जो कागज़ों पर तेज़ी से आगे बढ़ा, लेकिन ज़मीन पर कई जगह अब भी अधूरा है।

हर घर नल जल योजना के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र में पानी की समस्या को दर्शाती फीचर इमेज, जिसमें एक ग्रामीण महिला और पानी का नल दिखाई दे रहा है।

इसका एक छोटा सा उदाहरण सीतामढ़ी जिले के रामनगरा गांव का वार्ड संख्या 12 है। जहां की रहने वाली 38 वर्षीय विमला देवी बताती हैं कि उनके वार्ड के सभी घरों तक अब तक नल-जल योजना नहीं पहुंच सकी है। वह कहती हैं, "जब योजना शुरू हुई थी, तब लगा था कि अब पानी ढोने की परेशानी खत्म हो जाएगी। लेकिन आज भी कई घर ऐसे हैं जहाँ नल नहीं लगा है। हमें पहले की तरह हैंडपंप से ही पानी लाना पड़ता है।" उनके अनुसार सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को होती है क्योंकि घर के लिए पानी लाने की जिम्मेदारी अब भी मुख्य रूप से उन्हीं के हिस्से आती है। गर्मी हो या बरसात, दिन की शुरुआत पानी की तलाश से ही होती है।


गांव के ही वार्ड संख्या 11 की 61 वर्षीय रामरती देवी की परेशानी कुछ अलग है। उनके घर में नल तो लगा है, लेकिन उसमें पानी कभी नहीं आया। वह बताती हैं, "करीब तीन महीने पहले हमारे वार्ड में नल लगाए गए। लगभग सभी घरों में कनेक्शन भी हो गया, लेकिन आज तक एक दिन भी पानी नहीं आया। इसलिए आज भी हम आसपास के हैंडपंपों से पानी भरते हैं।" उनके लिए सबसे बड़ी निराशा यह है कि सरकार की योजना उनके दरवाजे तक तो पहुँची, लेकिन उसका वास्तविक लाभ नहीं पहुँचा।


वार्ड संख्या 10 की 65 वर्षीय रामपरी देवी बताती हैं कि उनके वार्ड में कुल 35 घर हैं, लेकिन केवल 16 घरों में ही नल लगाए गए हैं। बाकी परिवार अब भी योजना के इंतजार में हैं। वह कहती हैं, "जिन घरों में नल लगा है, वहां जाकर पानी भरना पड़ता है। पानी थोड़ी देर के लिए आता है, इसलिए काफी भीड़ लग जाती है। कई बार हमारी बारी आने से पहले ही सप्लाई बंद हो जाती है। फिर मजबूरी में हैंडपंप का सहारा लेना पड़ता है।" वह बताती हैं कि इलाके के कई हैंडपंपों का पानी आर्सेनिक युक्त होने की आशंका रहती है। ऐसे पानी के इस्तेमाल से बच्चों के बार-बार बीमार पड़ने का डर बना रहता है। सुरक्षित पेयजल का अधिकार तब तक अधूरा है, जब तक लोगों को स्वच्छ और नियमित पानी उपलब्ध न हो। 


यह संकट केवल घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं है। इसका असर किशोरियों के स्वास्थ्य और सम्मान पर भी पड़ता है। गांव की 17 वर्षीय किंजल बताती है, "माहवारी के दौरान दूर से पानी लाना बहुत मुश्किल हो जाता है। कई बार दर्द की वजह से समय पर पानी नहीं ला पाते। अगर घर में हर समय पानी मिले तो बहुत राहत होगी।" स्वच्छता, स्वास्थ्य और मासिक धर्म प्रबंधन की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक घरों में पर्याप्त पानी उपलब्ध न हो।


बिहार सरकार ने वर्ष 2016 में सात निश्चय कार्यक्रम के तहत "हर घर नल का जल" योजना शुरू की थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य वर्ष 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कार्यशील नल कनेक्शन उपलब्ध कराना था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार जून 2026 तक बिहार के अधिकांश ग्रामीण परिवारों तक नल कनेक्शन पहुँचाने का दावा किया गया है और राज्य की कवरेज लगभग 97 प्रतिशत के आसपास बताई जाती है। वहीं राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 81.7 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास कार्यशील नल कनेक्शन होने की जानकारी दी गई है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कनेक्शन देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब हर घर में नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित पानी भी पहुँचे।


सीतामढ़ी का रामनगरा गांव इस अंतर को साफ दिखता है। सरकारी रिकॉर्ड में यदि किसी घर तक पाइप और नल पहुँच गया है तो उसे योजना से आच्छादित मान लिया जाता है। लेकिन यदि उसमें पानी नहीं आता, यदि आधे घर अब भी योजना से बाहर हैं या यदि लोग आज भी हैंडपंपों पर निर्भर हैं, तो आँकड़ों की सफलता लोगों के जीवन में दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर अब भी कई गांवों में महसूस किया जा सकता है।


विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट का सबसे अधिक असर महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है। पानी लाने में रोज़ का समय और श्रम उनकी शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालता है। सुरक्षित पानी उपलब्ध न होने से दस्त, त्वचा रोग और जल जनित बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। ऐसे में नल-जल योजना केवल एक आधारभूत सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, शिक्षा, लैंगिक समानता और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है।


आज जरूरत केवल नए नल लगाने की नहीं, बल्कि पहले से स्थापित योजनाओं को पूरी क्षमता से चालू रखने की है। जिन वार्डों में अब तक कनेक्शन नहीं पहुँचे हैं, वहाँ प्राथमिकता के आधार पर काम पूरा किया जाए। जहाँ नल लगे हैं लेकिन पानी नहीं आ रहा, वहाँ समयबद्ध मरम्मत और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।


साथ ही ग्राम पंचायत स्तर पर नियमित निगरानी, पानी की गुणवत्ता की जांच और समुदाय की भागीदारी बढ़ाई जाए। क्योंकि किसी भी योजना की असली सफलता सरकारी फाइलों में दर्ज प्रतिशत से नहीं, बल्कि उस दिन से मापी जाएगी जब सीतामढ़ी की विमला देवी, रामरती देवी, रामपरी देवी और किंजल जैसी महिलाओं और किशोरियों को पानी के लिए हर सुबह संघर्ष नहीं करना पड़ेगा।

(यह लेखिका की निजी राय है)

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