नारी शक्ति, सपनों और संघर्ष की कविताएँ
"ये कविताएँ उत्तराखंड की बेटियों के सपनों, संघर्ष, आत्मविश्वास और सामाजिक बदलाव की आवाज़ हैं। इनमें स्त्री सम्मान, शिक्षा, माहवारी जागरूकता और आत्मनिर्भरता का संदेश समाहित है।"
1. स्त्री हैं तो क्या हुआ?
✍️ कवयित्री: तनुजा गोस्वामी
📚 कक्षा: 11वीं
📍 स्थान: कोठों रामपुर, उत्तराखंड
हम स्त्री हैं तो क्या हुआ?
सपने देखना और पूरा करना,
ये हक तो हमें भी है।
क्यों नहीं समझती दुनिया हमें,
अपने पैरों पर हमें भी खड़ा होना है,
परिवार और गांव का नाम
हमें भी ऊंचा करना है।
क्यों लड़कियों को कोख में ही मार देते हो?
जन्म से पहले सपने कुचल देते हो?
हम लड़कियां हैं जनाब,
हमें घर से लेकर देश तक
संभालने का हौसला है।
स्त्री हूँ तो क्या हुआ?
हमें भी अपनी उड़ान भरने दो,
कब तक हमारे पंख काटोगे?
हमें भी ऊंची उड़ान भरने दो,
अपने सपनों को पूरे करने दो।।
2. माहवारी कोई पाप नहीं!
✍️ कवयित्री: पूजा बिष्ट
📍 गाँव: पोथिंग, उत्तराखंड
खुशी का पल आया है आज,
और हम भी खुश हैं आज।
कुछ लोग समझते हैं हमें आज,
माहवारी को कोई तो समझता है।
जो समझ न पाते लड़की की जरूरत,
वो सोच से पिछड़े हैं आज।
उन्हें पता नहीं,
बिन लड़की के न संतान।
जो माहवारी को श्राप समझते हैं,
वो इसका मूल्य नहीं समझते हैं।
समझो कि माहवारी
श्राप नहीं, वरदान है।
इसी से स्त्री की
असली पहचान है।।
3. पहाड़ की बेटी के सपने
✍️ कवयित्री: रुचि
📍 गाँव: सन, उत्तराखंड
गाँव की मिट्टी से उठी
एक आस हूँ मैं।
पहाड़ जैसे इरादे
अटल हैं मेरे।
सपने बड़े हैं
और इरादे पक्के हैं मेरे।
बचपन बीता है मेरा संघर्षों में,
कभी फटी किताबों में
तो कभी कलम न होने में।
पर आँखों में था
कामयाब होने का ख्वाब मेरा।
कुछ कर गुजरने का
जुनून पक्का है मेरा।
बारहवीं में हूँ आज,
कलम है हथियार मेरा।
किताबें मेरी दोस्त
और परिवार सपना मेरा।
गांव की मिट्टी ने
सिखाया है लड़ना।
गिरकर भी हर बार
है मुझे उठना।
एक दिन कामयाब
मैं भी होंगी।
गाँव का नाम
मुझसे भी रोशन होगा।
कह दूँगी दुनिया से
हँसकर तब मैं भी—
पहाड़ की बेटियां भी
किसी से कम नहीं होतीं।
4. लड़की जैसी साहस नहीं
✍️ कवयित्री: नीमा गढ़िया
📚 कक्षा: 12वीं
📍 गाँव: पोथिंग, उत्तराखंड
हर कठिनाई को पार कर,
नई उम्मीदें दिल में लिए,
सपने पूरे करने चली है वो।
दुनिया ने रोका-टोका उसे—
"लड़की है तू, लड़का नहीं।"
पर वो एकदम मौन रही,
और कहीं रुकी नहीं।
एक नया उदाहरण बनी,
अपने गाँव की शान बनी।
जो कहते थे उससे कभी—
"ये सब तेरे बस की नहीं।"
आज वही सब कहते हैं—
लड़की हो तो उसके जैसी,
उसके जैसी साहस नहीं।

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