रतलाम (मध्यप्रदेश) | विशेष रिपोर्ट
Vikas Meshram
भीषण गर्मी के बीच मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के बाजना क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए पानी की हर बूंद किसी संघर्ष से कम नहीं थी। क्षेत्र के 18 गांवों में 34 हैंडपंप महीनों से खराब पड़े थे। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को पीने के पानी के लिए कई किलोमीटर दूर तक पैदल जाना पड़ता था। इसका असर केवल घरेलू जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खेती, पशुपालन और ग्रामीणों की आजीविका पर भी साफ दिखाई देने लगा था। ऐसे समय में वागधारा द्वारा गठित कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, बाजना ने इस समस्या को जनसरोकार का मुद्दा बनाते हुए समाधान की दिशा में संगठित पहल शुरू की।
संगठन के कार्यकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर खराब हैंडपंपों का विस्तृत सर्वेक्षण किया। प्रत्येक हैंडपंप की तकनीकी स्थिति का आकलन किया गया और यह दर्ज किया गया कि कहां पाइप बदलने की जरूरत है, कहां मरम्मत से काम चल सकता है और किन स्थानों पर अन्य तकनीकी संसाधनों की आवश्यकता है। सर्वेक्षण के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई, जिसमें सभी प्रभावित गांवों की वास्तविक स्थिति दर्ज थी।
इसके बाद 24 अप्रैल 2026 को संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने जनपद पंचायत बाजना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मनीष भंवर से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में क्षेत्र में गहराते जल संकट की तस्वीर प्रस्तुत करते हुए खराब पड़े हैंडपंपों की तत्काल मरम्मत कराने और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए स्थायी व्यवस्था करने की मांग की गई।
ज्ञापन सौंपने के दौरान संगठन के पदाधिकारी शंकरलाल मईड़ा, लालूहाड़ा, मनीराम डामोर, शांतिलाल, कालीबाई, रखिया, अंजना, कैलाश भुज, गोविंद निनामा सहित अनेक ग्रामीण प्रतिनिधि उपस्थित रहे। इस पूरी प्रक्रिया में वागधारा की ओर से रेणुका पोरवाल और मोहन भूरिया ने भी सक्रिय भूमिका निभाई।
संगठन ने केवल ज्ञापन देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मानी, बल्कि लगातार प्रशासन के साथ संवाद और फॉलोअप जारी रखा। यही निरंतर प्रयास इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
प्रशासन ने मामले की गंभीरता को समझते हुए लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। विभागीय टीमों ने चिन्हित गांवों में पहुंचकर खराब हैंडपंपों की मरम्मत का कार्य शुरू किया। जिन हैंडपंपों में सामान्य तकनीकी खराबी थी, उन्हें तुरंत ठीक किया गया, जबकि जहां पाइप या अन्य सामग्री की आवश्यकता थी वहां आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए।
(पेयजल संकट के समाधान की मांग को लेकर 24 अप्रैल 2026 को जनपद पंचायत बाजना के मुख्य कार्यपालन अधिकारी मनीष भंवर को ज्ञापन सौंपते और ग्रामीणों की समस्याओं पर चर्चा करते कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, बाजना के प्रतिनिधि। फोटो: मोहन भूरिया, संगठन कोऑर्डिनेटर, वागधारा।)
मरम्मत अभियान के परिणामस्वरूप 34 में से 29 हैंडपंप सफलतापूर्वक चालू कर दिए गए। इससे हजारों ग्रामीणों को भीषण गर्मी के दौरान राहत मिली। केवल लोगों को ही नहीं, बल्कि पानी के अभाव से परेशान मवेशियों को भी पर्याप्त जल उपलब्ध होने लगा।
भूरी घाटी गांव के शंकरलाल मईड़ा ने बताया कि वर्षों से चली आ रही समस्या का समाधान इस बार इसलिए संभव हो पाया क्योंकि संगठन ने ग्रामीणों की आवाज को प्रभावी ढंग से प्रशासन तक पहुंचाया और प्रशासन ने भी तत्परता दिखाई। तलीनखेड़ा के लालूहाड़ा ने कहा कि पहले महिलाओं को रोजाना कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था, लेकिन अब हैंडपंप चालू होने से पूरे गांव को बड़ी राहत मिली है।
मेवासा गांव के कैलाश भुज ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने ग्रामीणों का विश्वास मजबूत किया है कि यदि लोग संगठित होकर अपनी बात रखें, तथ्य जुटाएं और लगातार संवाद बनाए रखें, तो प्रशासन भी सकारात्मक और समयबद्ध कार्रवाई करता है।
हालेवाड़ा, भोजपुरा, रामपुरिया, कुंडल, राजापुरा, रेहतकुआ, छावनीजोड़िया, मकनपुरा और अन्य गांवों के ग्रामीणों ने भी इस पहल को जनसहभागिता की मिसाल बताते हुए कहा कि भविष्य में भी गांवों की मूलभूत समस्याओं को इसी तरह संगठित प्रयासों से उठाया जाएगा।
यह पूरी पहल केवल खराब हैंडपंपों की मरम्मत तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने यह भी साबित किया कि जनसंगठन, तथ्य आधारित सर्वेक्षण, निरंतर फॉलोअप और प्रशासनिक संवेदनशीलता मिलकर किसी भी जनसमस्या का प्रभावी समाधान निकाल सकते हैं। बाजना क्षेत्र के 18 गांवों में लौटा पानी केवल पेयजल संकट से राहत की कहानी नहीं है, बल्कि यह सामाजिक भागीदारी और उत्तरदायी प्रशासन के सफल समन्वय का जीवंत उदाहरण भी है। आने वाले समय में यह पहल ग्रामीण विकास और जनसरोकार से जुड़े अभियानों के लिए एक प्रेरक मॉडल के रूप में याद की जाएगी।
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