वैकल्पिक मीडिया की ताकत को समझना है, तो पढ़ें अप्पन समाचार

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वैकल्पिक मीडिया की ताकत को समझना है, तो पढ़ें अप्पन समाचार

वैकल्पिक मीडिया की ताकत को समझना है, तो पढ़ें अप्पन समाचार

पुस्तक समीक्षा 

पुस्तक : अप्पन समाचार: All Women Community News Network (Hindi Edition)
विषय : जन मीडिया, महिला नेतृत्व व समुदाय का सशक्तीकरण
परिकल्पना : डॉ. संतोष सारंग
संपादक : डॉ. सुशांत कुमार एवं अमृतांज इंदीवर
प्रकाशक : एएस फाउंडेशन

ग्रामीण भारत की कहानियां लंबे समय तक बाहर से लिखी जाती रही हैं। गांवों की समस्याएं, वहां के संघर्ष, महिलाओं की स्थिति, शिक्षा, रोजगार और स्थानीय बदलाव समाचारों का हिस्सा तो बनते रहे, लेकिन इन कहानियों को कहने वाली आवाज अक्सर गांव के भीतर की नहीं होती थी। अप्पन समाचार इन्हीं बेजुबानों को सशक्त करने की एक कोशिश है और उसकी डेढ़ दशक से अधिक की शानदार, लेकिन लड़खड़ाती यात्रा का एक संपूर्ण दस्तावेज भी। 'अप्पन समाचार’ केवल एक पुस्तक का नाम नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज को अपनी कहानी खुद कहने का अवसर देने की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आती है।

डॉ. संतोष सारंग की परिकल्पना

‘अप्पन समाचार’ ग्रामीण पत्रकारिता, महिला भागीदारी और सामुदायिक मीडिया के एक ऐसे प्रयोग को सामने लाती है, जिसमें गांव की महिलाएं और किशोरियां केवल खबरों की पात्र नहीं, बल्कि खबर तैयार करने वाली सक्रिय आवाज बनती हैं। पुस्तक का महत्व इसी बदलाव में निहित है—जिस समाज की कहानी लिखी जा रही है, उस समाज के लोगों को भी कहानीकार बनाया जाए। 
'अप्पन समाचार’ इसी खाली जगह को भरने की कोशिश करती दिखाई देती है। पुस्तक ग्रामीण पत्रकारिता को केवल सूचना इकट्ठा करने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे समुदाय के भीतर संवाद और भागीदारी विकसित करने के माध्यम के रूप में सामने रखती है। यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्थानीय व्यक्ति अपने क्षेत्र को केवल एक घटना के रूप में नहीं देखता। वह उसके पीछे की परिस्थितियों, लोगों की जरूरतों और समस्याओं के प्रभाव को भी समझता है। इसलिए स्थानीय पत्रकारिता में अनुभव की वह परत जुड़ सकती है, जो बाहर से की गई रिपोर्टिंग में कई बार छूट जाती है। सनद रहे कि इस पहल व पुस्तक की परिकल्पना वरिष्ठ पत्रकार व प्राध्यापक डॉ संतोष सारंग की है।

जब महिलाएं बनती हैं अपने गांव की रिपोर्टर

पुस्तक की सबसे उल्लेखनीय विशेषता महिलाओं को संवाददाता और कहानीकार के रूप में सामने लाना है। ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक पहचान लंबे समय तक परिवार और घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित करके देखी जाती रही है। ऐसे में जब वही महिलाएं अपने गांव की समस्याओं, उपलब्धियों और बदलावों को रिपोर्ट करने लगती हैं, तो पत्रकारिता उनके लिए अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक भागीदारी का माध्यम भी बन जाती है। यही कारण है कि ‘अप्पन समाचार’ में महिला पत्रकारिता को केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं, बल्कि दृष्टिकोण के विस्तार के रूप में भी देखा जा सकता है।

किशोरियों की भागीदारी एक महत्वपूर्ण पहलू

पुस्तक में किशोरियों की सहभागिता का संदर्भ भी ध्यान खींचता है। ग्रामीण किशोरियों के लिए पत्रकारिता का अनुभव केवल समाचार लिखने या वीडियो बनाने तक सीमित नहीं रहता। यह उन्हें सवाल पूछने, अपने आसपास की घटनाओं को समझने, लोगों से बातचीत करने और अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का अवसर दे सकता है। इस दृष्टि से सामुदायिक पत्रकारिता भविष्य की नागरिक भागीदारी की तैयारी भी बन सकती है। एक किशोरी जब अपने गांव की किसी समस्या पर सवाल उठाती है, लोगों से बातचीत करती है या किसी स्थानीय बदलाव को दर्ज करती है, तो वह अपने आसपास के समाज को नए नजरिए से देखने लगती है। यह पुस्तक की उन विशेषताओं में से है, जिन पर आगे सामाजिक और मीडिया अध्ययन के स्तर पर गंभीर शोध किया जा सकता है।

तीन हिस्सों में सामने आती है अप्पन समाचार पुस्तक

‘अप्पन समाचार’ पुस्तक की सामग्री को तीन प्रमुख हिस्सों में देखा जा सकता है। पहले हिस्से में चुनिंदा पत्रकारों के आलेख शामिल हैं। इनमें मीडिया की विश्वसनीयता और वैकल्पिक मीडिया की संभावनाओं जैसे प्रश्नों पर विचार किया गया है। यह हिस्सा पाठक को उस व्यापक मीडिया संदर्भ से जोड़ता है, जिसमें सामुदायिक पत्रकारिता की जरूरत और भूमिका को समझा जा सकता है।

दूसरे हिस्से में ‘अप्पन समाचार’ के उद्भव और विकास से संबंधित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को संकलित किया गया है। यह भाग पहल की यात्रा को समझने में मदद करता है और यह भी बताता है कि समय के साथ इस प्रयोग को किस तरह देखा गया।

तीसरे हिस्से में अंग्रेजी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को स्थान दिया गया है। हिंदी और अंग्रेजी दोनों माध्यमों में प्रकाशित सामग्री को एक साथ रखने से पुस्तक का दस्तावेजी महत्व बढ़ता है। पाठक न केवल पहल को समझता है, बल्कि यह भी देख सकता है कि अलग-अलग मीडिया मंचों पर इसे किस तरह प्रस्तुत किया गया।

पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी संदर्भ ग्रंथ

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका शैक्षणिक उपयोग भी है। पत्रकारिता और मीडिया अध्ययन के विद्यार्थी तथा शोधार्थी ग्रामीण पत्रकारिता, नागरिक पत्रकारिता, सामुदायिक मीडिया, महिला नेतृत्व और वैकल्पिक मीडिया जैसे विषयों पर काम करते समय इससे संदर्भ प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन ‘अप्पन समाचार’ को केवल अकादमिक सामग्री मानना इसके दायरे को छोटा कर देगा। सामाजिक संगठनों, ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों, मीडिया प्रशिक्षकों और स्थानीय स्तर पर संचार के नए प्रयोगों में रुचि रखने वालों के लिए भी इसमें विचार करने योग्य सामग्री है। विशेष रूप से उन लोगों के लिए यह पुस्तक उपयोगी हो सकती है, जो यह समझना चाहते हैं कि डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच स्थानीय पत्रकारिता किस तरह समुदाय के भीतर से विकसित हो सकती है।

पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत उसका विचार

किसी भी पुस्तक का मूल्य केवल उसकी विषय-वस्तु से नहीं, बल्कि उन प्रश्नों से भी तय होता है, जिसे वह पाठक के सामने रखती है। ‘अप्पन समाचार’ का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या गांव केवल समाचार का विषय रहेगा या वह स्वयं समाचार का निर्माता भी बनेगा? इस प्रश्न का महत्व आज और बढ़ गया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने समाचार निर्माण के साधनों को पहले की तुलना में अधिक लोगों तक पहुंचाया है। ऐसे समय में सामुदायिक पत्रकारिता के लिए संभावनाएं भी बढ़ी हैं। लेकिन इन संभावनाओं के साथ तथ्य-जांच, विश्वसनीयता, प्रशिक्षण और पत्रकारिता की जिम्मेदारियों जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हैं। यहीं पुस्तक को केवल एक सफलता-कथा के बजाय एक ऐसे प्रयोग के दस्तावेज के रूप में पढ़ना अधिक सार्थक होगा, जो ग्रामीण पत्रकारिता की संभावनाओं के साथ उसके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी सोचने का अवसर देता है।

कुछ सवाल भी छोड़ती है पुस्तक

पुस्तक की प्रशंसा करते हुए उसके सामने मौजूद संभावित चुनौतियों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। सामुदायिक पत्रकारिता को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए नियमित प्रशिक्षण, संपादकीय मार्गदर्शन, तथ्य-जांच, तकनीकी संसाधन और आर्थिक स्थिरता जरूरी है। महिलाओं और किशोरियों की भागीदारी को केवल शुरुआत तक सीमित रखने के बजाय उसे निरंतर पत्रकारिता कौशल और नेतृत्व में बदलना भी एक चुनौती है। इसी तरह स्थानीय खबरों को व्यापक समाज तक पहुंचाते समय पत्रकारिता की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

इन सवालों के कारण ‘अप्पन समाचार’ का प्रयोग और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल यह नहीं बताता कि एक वैकल्पिक मॉडल संभव है, बल्कि आगे यह पूछने की गुंजाइश भी छोड़ता है कि उसे लंबे समय तक कैसे मजबूत और टिकाऊ बनाया जाए। ‘अप्पन समाचार’ ग्रामीण पत्रकारिता, महिला सशक्तीकरण और सामुदायिक मीडिया के बीच बनने वाले संबंधों को समझने वाली महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ग्रामीण समाज को मीडिया के निष्क्रिय उपभोक्ता के बजाय उसके सक्रिय निर्माता के रूप में देखने का आग्रह करती है।

इस पुस्तक की केंद्रीय भावना को एक वाक्य में कहा जा सकता है—गांव की कहानी गांव की आवाज में भी सुनी जानी चाहिए।

इस पुस्तक में 264 पृष्ठ हैं। सरल शब्दों में लगभग तमाम आलेख प्रस्तुत हुए हैं। लेकिन पुस्तक के अंत में ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें साफ-सुथरी नहीं छपी है। इसे अगले संस्करण में सुधारा जाना जरूरी प्रतीत होता है। बाकी कवर पर छपी तस्वीर आकर्षक है, जो पुस्तक की विषयवस्तु को प्रतिबिंबित करने में समर्थ दिखती है।

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