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हर घर तक कब पहुंचेगा नल का पानी?

सपना कुमारी 

मुजफ्फरपुर, बिहार

हर घर तक कब पहुंचेगा नल का पानी?किसी भी समाज की तरक्की का अंदाज़ा केवल ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों या नई योजनाओं से नहीं लगाया जा सकता। असली विकास तब दिखाई देता है, जब किसी किशोरी के हाथ में पानी से भरी बाल्टी नहीं, बल्कि किताब हो. जब किसी महिला की सुबह घर के लिए पानी जुटाने की चिंता से नहीं, बल्कि अपने सपनों और परिवार के बेहतर भविष्य की योजना से शुरू हो। लेकिन बिहार के मुजफ्फरपुर सहित कई ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी तस्वीर पूरी तरह नहीं बदल पाई है। 


सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन और राज्य की हर घर नल का जल योजना के बावजूद अनेक घर ऐसे हैं, जहाँ आज भी नल का पानी नहीं पहुँचा है। इसका सबसे बड़ा बोझ महिलाओं और किशोरियों के कंधों पर पड़ता है। वे रोजाना कई बार हैंडपंप या दूसरे स्रोतों से पानी ढोती हैं। यह केवल पानी की समस्या नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान, समय और समान अवसरों से जुड़ा हुआ प्रश्न है।


मुजफ्फरपुर जिले के कई ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाएं बताती हैं कि गाँव के मुख्य रास्ते या सड़क किनारे बने घरों तक तो नल जल की सुविधा पहुंच गई है, लेकिन जिन परिवारों के घर सड़क से दूर, टोले या बस्ती के अंदर हैं, वे आज भी इस सुविधा का इंतज़ार कर रहे हैं। एक महिला कहती हैं, "सड़क पर रहने वालों के घर में नल लग गया है, लेकिन हमारा घर अंदर है। हम आज भी चापाकल (हैंडपंप) से पानी लाते हैं। कई बार पंचायत में कहा, लेकिन अभी तक हमारे यहाँ पाइप नहीं पहुँचा।"

हर घर तक कब पहुंचेगा नल का पानी?

यह शिकायत केवल पाइपलाइन की नहीं, बल्कि रोज की उस थकान की भी है जिसका सबसे अधिक असर किशोरियों की पढ़ाई पर पड़ता है।। स्कूल जाने से पहले पानी भरना, स्कूल से लौटने के बाद फिर पानी लाना और शाम को दोबारा यही काम। दिन का बड़ा हिस्सा इसी में निकल जाता है। कई बार यदि घर में मेहमान आ जाएँ या पानी की खपत बढ़ जाए, तो उन्हें पढ़ाई छोड़कर अतिरिक्त चक्कर लगाने पड़ते हैं।


परीक्षा के दिनों में भी यह जिम्मेदारी कम नहीं होती। परिणाम यह होता है कि उनके पास पढ़ने, आराम करने या अपनी रुचियों को विकसित करने का समय ही नहीं बचता। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल पहुँचने तक सीमित नहीं है। इसके लिए पढ़ने का समय, आराम और ऐसी परिस्थितियाँ भी ज़रूरी हैं जहाँ घरेलू जिम्मेदारियाँ लड़कियों की पढ़ाई पर भारी न पड़ें।


यह सोचने की बात है कि पानी लाने की जिम्मेदारी लगभग हमेशा महिलाओं और किशोरियों के हिस्से में ही क्यों आती है। आखिर किसने तय किया कि घर के लिए पानी भरना केवल उनका काम होगा? संविधान या किसी कानून में ऐसा कोई नियम नहीं लिखा है। दरअसल, यह जिम्मेदारी वर्षों से चली आ रही सामाजिक धारणाओं और लैंगिक भूमिकाओं का परिणाम है। बचपन से लड़कियों को घर के काम सिखाए जाते हैं, जबकि लड़कों को अक्सर इन जिम्मेदारियों से दूर रखा जाता है। 


धीरे-धीरे यह लैंगिक बँटवारा इतना सामान्य मान लिया जाता है कि परिवार भी इसे असमानता नहीं, बल्कि व्यवस्था मानने लगते हैं. जब पानी दूर से लाना पड़ता है, तब सबसे पहले घर की लड़कियों को आवाज़ दी जाती है। यदि वे पढ़ रही हों, तब भी उन्हें किताब बंद करके बाल्टी उठानी पड़ती है। दूसरी ओर, उसी घर के लड़के अपनी पढ़ाई या दूसरे काम जारी रख सकते हैं। यही असमानता लड़कियों से केवल समय नहीं, बल्कि सीखने, आगे बढ़ने और अपने लिए फैसले लेने के अवसर भी छीन लेती है.


पानी ढोना केवल समय लेने वाला काम नहीं है, बल्कि शारीरिक रूप से भी बेहद कठिन होता है। सिर पर भरी बाल्टी या हाथों में भारी बर्तन उठाकर लंबी दूरी तय करना महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। कमर दर्द, गर्दन का दर्द और लगातार थकान जैसी समस्याएं आम हैं। गर्मी के मौसम में यह कठिनाई और बढ़ जाती है। यह मेहनत अक्सर अदृश्य रह जाती है, क्योंकि इसे "घर का सामान्य काम" मान लिया जाता है।


भारत सरकार ने 15 अगस्त 2019 को जल जीवन मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण परिवार को कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन के माध्यम से सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराना था। इस योजना का मकसद केवल घर तक पाइप पहुँचाना नहीं, बल्कि नियमित, गुणवत्तापूर्ण और पर्याप्त मात्रा में पेयजल उपलब्ध कराना है, ताकि महिलाओं और बच्चों को पानी लाने की कठिनाई से मुक्ति मिले, जल जनित बीमारियों में कमी आए और ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता बेहतर हो।


बिहार में इस मिशन के तहत पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। जल शक्ति मंत्रालय के जल जीवन मिशन के अनुसार जुलाई 2026 तक बिहार के लगभग 1.86 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से करीब 1.84 करोड़ से अधिक परिवारों को कार्यशील घरेलू नल जल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है। यानी राज्य के लगभग 99 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार इस सुविधा से जुड़ चुके हैं। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन औसत आँकड़े उन परिवारों की सच्चाई नहीं छिपा सकते जिनके लिए यह सुविधा आज भी केवल वादा है। विशेषकर दूर बसे टोले, अंदरूनी बस्तियाँ और सड़क से कटे हुए घर अभी भी इस योजना के पूर्ण लाभ की प्रतीक्षा कर रहे हैं।


मुजफ्फरपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोग बताते हैं कि पाइपलाइन मुख्य सड़क तक तो बिछ गई, लेकिन अंदर की गलियों और बस्तियों तक काम अधूरा रह गया। कुछ स्थानों पर पाइप तो डाल दिए गए, लेकिन नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी। कहीं तकनीकी कारण हैं, तो कहीं रखरखाव की समस्या। नतीजा यह है कि लोग कागज़ों में योजना का लाभार्थी होने के बावजूद रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अब भी चापाकल या दूसरे स्रोतों पर निर्भर हैं। जब मूल्यांकन केवल आंकड़ों से किया जाता है, तब सबसे पहले वही परिवार छूट जाते हैं जिन्हें इन योजनाओं की सबसे अधिक जरूरत होती है.


पानी की उपलब्धता का सीधा संबंध महिलाओं की आर्थिक भागीदारी से भी है। यदि हर दिन दो से तीन घंटे पानी भरने में चले जाएँ, तो महिलाएँ स्वरोज़गार, कृषि, स्वयं सहायता समूहों की गतिविधियों या किसी अन्य आयवर्धक कार्य में उतना समय नहीं दे पातीं। किशोरियों के लिए भी यही समय उनकी पढ़ाई, कौशल प्रशिक्षण, खेल या डिजिटल शिक्षा में लगाया जा सकता था। इसलिए नल जल केवल पानी की सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं के समय, उनकी आर्थिक भागीदारी और बराबरी के अवसरों से जुड़ा अधिकार भी है.


किसी भी समाज का विकास उसकी महिलाओं की स्थिति, अवसरों और प्रगति से आँका जा सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि परिवारों के भीतर घरेलू जिम्मेदारियों को समान रूप से बांटने की संस्कृति विकसित हो. पानी लाना या घरेलू काम किसी एक लिंग विशेष की जिम्मेदारी नहीं हैं। जब परिवार के सभी सदस्य इन कामों को बराबरी से बाँटते हैं, तो महिलाओं का बोझ कम होता है और बच्चों के सामने समानता की एक नई मिसाल बनती है.

(यह लेखिका के निजी विचार हैं)

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