बाड़ी से स्वराज तक: महिलाओं ने खोजा आत्मनिर्भरता का रास्ता

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बाड़ी से स्वराज तक: महिलाओं ने खोजा आत्मनिर्भरता का रास्ता

राजस्थान के दक्षिणी छोर पर माही नदी के आँचल में बसा बाँसवाड़ा पहाड़ियों, ढलानों और छोटी जोतों की धरती है, जिसे लोग वागड़ कहते हैं। यहाँ खेती जीवन का आधार है, लेकिन वर्षा पर निर्भरता, सीमित सिंचाई और छोटी जोतें परिवारों की आमदनी को अस्थिर बनाए रखती हैं।

इसी भूगोल में आनंदपुरी क्षेत्र की कुछ महिलाओं ने खेत के छोटे हिस्से को आजीविका के नए आधार में बदला है। सेरानगला की कोकीलादेवी डामोर, नवागरा की कुनीदेवी पारगी, बावड़ी की छगनदेवी पटेल और उबापान की लक्ष्मी गरासिया की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन उनकी राह एक जगह मिलती है—बाड़ी, महिला सक्षम समूह और अपने संसाधनों पर भरोसा।

बाड़ी से स्वराज तक: महिलाओं ने खोजा आत्मनिर्भरता का रास्ता

बाड़ी यहाँ सिर्फ फलदार पौधे लगाने की गतिविधि नहीं है। इसमें सब्ज़ी और फल उत्पादन के साथ पशुपालन, मिट्टी-पानी संरक्षण, पोषण और महिलाओं की भागीदारी जुड़ी है। छोटे किसान के लिए इसका मतलब है—एक ही जमीन से भोजन, बचत और आय के कई रास्ते बनाना।

कोकीलादेवी: एक बकरी से बारह तक

सेरानगला की कोकीलादेवी के पास चार बीघा जमीन है। मक्का, धान, गेहूँ और चने से घर का गुजारा चलता था, लेकिन बच्चों की पढ़ाई और भविष्य के लिए बचत नहीं हो पाती थी। 2018-19 में वागधारा के माध्यम से वे नाबार्ड की वाड़ी परियोजना से जुड़ीं।

इसके बाद खेती में विविधता बढ़ी। हिप्पर परियोजना से मिली एक बकरी बढ़कर बारह हो गईं। पशुओं की खाद खेत में लौटी और पिछले साल चार सिरोही बकरे बेचकर 70 हजार रुपये मिले। पशुपालन और खेती यहाँ अलग-अलग काम नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सहारा देने वाली व्यवस्था बन गए।

पोषण वाटिका में भी बदलाव आया। पहले वाल और बैंगन तक सीमित बाड़ी में प्रशिक्षण के बाद सात-आठ तरह की सब्ज़ियाँ उगने लगीं। मेथी, लाल पालक, चौलाई, अदरक, हल्दी, टमाटर और बैंगन की उपज से पिछले साल करीब 40 हजार रुपये की आय हुई।

गर्मी में बाड़ी बचाने के लिए पानी की टंकी और तारबंदी कराई गई। मेड़बंदी से बारिश का पानी खेत में रुकने लगा। इस तरह चार बीघा जमीन अब परिवार को एक ही फसल पर निर्भर रखने के बजाय कई आय-स्रोत देती है।

कुनीदेवी: बाड़ी की पहली मंज़िल रसोई है

नवागरा की कुनीदेवी पारगी के पास सात बीघा वर्षा-आधारित जमीन है। परिवार में तीन भैंसें, दो गायें, पाँच बकरियाँ और सात सदस्य हैं। खेती की बढ़ती लागत के बीच महिला सक्षम समूह की मासिक बैठकों ने उन्हें कम लागत में उत्पादन बढ़ाने की तकनीकें सीखने का मौका दिया।

समूह से मिले बीज-किट से उन्होंने 1010 वर्गफुट की बाड़ी में टमाटर, बैंगन, तुरई, गिलकी, टिंडी, मिर्च, ग्वार फली, लौकी, पालक, मेथी, धनिया और प्याज़ उगाए।

बाड़ी से स्वराज तक: महिलाओं ने खोजा आत्मनिर्भरता का रास्ता

मार्च से जून 2025 के बीच बाड़ी से करीब 40 हजार रुपये की कमाई हुई। लगभग दो हजार किलो गोबर खाद डालने से तीन क्विंटल प्याज़ हुआ। 50 किलो घर के लिए रखकर ढाई क्विंटल 25 रुपये किलो के भाव से बेचकर 6,250 रुपये मिले। 15 किलो नींबू से 1,500 रुपये और भैंस के दूध से बने नौ किलो घी से 9 हजार रुपये की अतिरिक्त आय हुई।

कुनीदेवी के लिए बाड़ी का हिसाब सीधा है—पहले घर की थाली, फिर बाजार।

छगनदेवी: खेती से आगे बढ़ता समूह

बावड़ी की छगनदेवी पटेल के पास आठ बीघा जमीन है। बचत से बोरवेल लगाकर उन्होंने सिंचाई का इंतज़ाम किया था, लेकिन खेती को कम लागत और टिकाऊ बनाने की जरूरत बनी रही।

2018 में वागधारा के साथ “माताजी सक्षम समूह” बना। यहाँ बचत के साथ पंचायत में महिलाओं की भूमिका, सरकारी योजनाओं और अधिकारों पर भी चर्चा होने लगी। छगनदेवी ने केंचुआ खाद और दशपर्णी अर्क बनाना सीखा।

वाड़ी के तहत उन्हें 40 फलदार पौधे—20 आम, 15 अमरूद और पाँच नींबू—मिले। साथ में पानी की टंकी, वर्मी बेड और जैविक दवा बनाने के उपकरण भी मिले।

जून 2023 से मार्च 2024 के बीच उन्होंने 25 हजार रुपये की सब्ज़ियाँ बेचीं। आठ महीने तक बाजार से सब्ज़ी नहीं खरीदनी पड़ी और करीब 10 हजार रुपये की बचत हुई। 30 किलो लाल मिर्च में से 20 किलो 280 रुपये किलो की दर से बेचकर 5,600 रुपये मिले। 50 किलो प्याज़ ने घरेलू जरूरत पूरी की।

खेती से हुई बचत और समूह से मिली जानकारी ने उनके लिए एक और दरवाजा खोला—पंचायत में अपनी बात रखने का। यहाँ बाड़ी आर्थिक गतिविधि से आगे बढ़कर आत्मविश्वास का माध्यम बनती है।

लक्ष्मी: ढलान से नर्सरी तक

उबापान की लक्ष्मी गरासिया के सात बीघा खेत का बड़ा हिस्सा ढलान पर था। बारिश में मिट्टी बह जाती और फसल प्रभावित होती। समाधान के लिए उन्होंने ग्राम-स्तरीय समूहों के जरिए जमीन समतलीकरण का आवेदन दिया। फील्ड टीम ने प्रक्रिया में मदद की, पंचायत में बात रखी गई और मनरेगा के तहत पिछले वर्ष काम पूरा हुआ।

इसके बाद खेत के एक हिस्से में नर्सरी तैयार हुई। मिर्च, टमाटर और बैंगन की पौध खरीफ में बिकने लगी। इस साल जामुन, बाँस और सीताफल की पौध भी तैयार की गई।

बचत की पूँजी से खरीदी गई आटा चक्की ने आय का एक और रास्ता खोला। आसपास के लोगों को अब पिसाई के लिए ब्लॉक तक नहीं जाना पड़ता और लक्ष्मी की आमदनी में स्थायी बढ़ोतरी हुई है। साथ ही वे गाँव की दूसरी महिलाओं को योजनाओं और अधिकारों की जानकारी देने में भी सक्रिय हैं।

छोटी बाड़ी, बड़ा बदलाव

इन चार कहानियों में फर्क है, लेकिन एक साझा सीख भी है—छोटी जोत पर विविधता आर्थिक जोखिम कम कर सकती है। सब्ज़ी घर का खर्च बचाती है, अतिरिक्त उपज बाजार तक जाती है, पशुधन खाद और आमदनी दोनों देता है और फलदार पौधे भविष्य की आय का आधार बनते हैं।

बाड़ी का असर पोषण पर भी पड़ता है। जो सब्ज़ी घर में उगती है, वह सीधे थाली तक पहुँचती है; बाजार से खरीद घटती है और भोजन में विविधता आती है। इस प्रक्रिया में महिला की भूमिका भी मजबूत होती है, क्योंकि बाड़ी की फसल, उपयोग और बिक्री से जुड़े कई फैसले उसके हाथ में आते हैं।

लेकिन इन बदलावों के पीछे केवल खेत नहीं, समूह भी है। महिला सक्षम समूहों ने प्रशिक्षण, संसाधनों और सरकारी योजनाओं तक पहुँच बनाने में मदद की। गोबर खाद, वर्मी-कम्पोस्ट और दशपर्णी जैसे स्थानीय संसाधनों ने कम लागत वाली खेती को आधार दिया, जबकि पंचायत और मनरेगा जैसी व्यवस्थाओं तक पहुँच ने जमीन की समस्याओं के समाधान का रास्ता खोला।

यहीं खेती और नेतृत्व एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

जब महिला अपनी फसल का हिसाब रखती है, बाजार में उत्पाद बेचती है, सरकारी योजना के लिए आवेदन करती है या पंचायत में अपनी जरूरत रखती है, तो वह केवल किसान के रूप में नहीं, निर्णय लेने वाली नागरिक के रूप में भी अपनी जगह मजबूत करती है।

कोकीलादेवी की बकरियाँ, कुनीदेवी की सब्ज़ियाँ और घी, छगनदेवी की मिर्च और लक्ष्मी की पौध—ये सिर्फ़ उत्पाद नहीं हैं। इनके पीछे उस बदलाव की कहानी है जिसमें आदिवासी महिला किसी योजना की लाभार्थी भर नहीं रहती, बल्कि अपने परिवार और समुदाय की दिशा तय करने वाली कर्ता बनती है।

बाड़ी में उगती फसल का दायरा भले छोटा हो, लेकिन उससे निकलने वाला रास्ता बड़ा है—आत्मनिर्भरता से नेतृत्व और नेतृत्व से स्वराज तक।

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