जब गाँव ने अपनी समस्याओं की चाबी अपने हाथ में ली

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जब गाँव ने अपनी समस्याओं की चाबी अपने हाथ में ली

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Vikas Meshram

(vikasmeshram04@gmail.com)

राजस्थान के दक्षिणी छोर पर बसा बांसवाड़ा ज़िला आदिवासी संस्कृति की रंग-बिरंगी विरासत के लिए जाना जाता है। इसी ज़िले का सज्जनगढ़ ब्लॉक आज एक ऐसी ख़ामोश क्रांति का गवाह है, जिसमें न कोई शोर है, न कोई नारेबाज़ी। यहाँ है तो बस बैठकों का सिलसिला, काग़ज़ पर लिखे प्रस्ताव, ग्राम सभाओं की गहमागहमी और गाँव वालों का यह पक्का यक़ीन कि अपनी समस्याओं के ताले की चाबी उनके अपने हाथ में है।

जब गाँव ने अपनी समस्याओं की चाबी अपने हाथ में ली

इस बदलाव की ज़मीन वागधारा संस्था ने बरसों की मेहनत से तैयार की है। संस्था कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, ग्राम स्वराज समूह, सक्षम समूह और बाल स्वराज समूह के ज़रिए समुदाय को जल, जंगल, ज़मीन, जानवर, बीज और अपनी परंपरा-संस्कृति को सहेजने के लिए लगातार प्रेरित करती आ रही है। उसका तरीक़ा सीधा है: पहले गाँव से संवाद, फिर समूहों और संगठनों को सरकार से जोड़ना, ताकि लोग अपनी बात सीधे व्यवस्था के सामने रख सकें। संस्था रास्ता दिखाती है, पर चलना गाँव को ही होता है।

इस आलेख में दो गाँवों की ऐसी ही दो कहानियाँ हैं। एक में स्कूल की चारदीवारी खड़ी हुई और बच्चों की पढ़ाई को सुकून मिला। दूसरे में बरसों से बंद पड़े हैंडपंपों से फिर पानी की धार फूटी। इन कहानियों के नायक ग्रामीण हैं जिन्होंने तय किया कि इंतज़ार करने के बजाय आवेदन लिखेंगे, बैठकों में जुटेंगे और अपनी माँग सही दरवाज़े तक पहुँचाएँगे।

टीडीयादेव: एक दीवार ने बदला स्कूल का माहौल

ग्राम पंचायत टिंबा महुडी के गाँव टीडीयादेव का राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बाहर से देखने में किसी भी गाँव के स्कूल जैसा ही था, पर उसकी एक कमी रोज़ बच्चों की पढ़ाई पर भारी पड़ती थी। स्कूल परिसर के चारों ओर बाउंड्री वॉल नहीं थी। खुले परिसर में आसपास का कचरा चला आता था और पशुओं के अवशेष भी गंदगी के रूप में फैल जाते थे। जिस आँगन में बच्चों को अक्षर पहचानने थे, वहाँ बदबू और गंदगी का पहरा रहता था। माहौल बिगड़ा तो पढ़ाई का मन भी बिगड़ा। सोचिए, जब कक्षा की खिड़की से दिखने वाला नज़ारा ही गंदगी का हो, तो किताबों में मन कैसे रमे?

यह समस्या किसी फ़ाइल में दबकर नहीं रह गई, क्योंकि इस इलाक़े में एक अच्छी आदत जड़ें जमा चुकी है: हर महीने समुदाय के साथ बैठना। अजीम प्रेमजी संवैधानिक गरिमा फ़ेलोशिप कार्यक्रम के तहत सज्जनगढ़ ब्लॉक में पिछले दो वर्षों से जागरूकता और शिक्षा के लिए नियमित काम हो रहा है। वागधारा द्वारा गठित बाल स्वराज समूह और फ़ेलो विनोद डामोर हर माह समुदाय के साथ बैठक करते हैं, ताकि स्थानीय समस्याओं पर मिल-बैठकर निर्णय लिया जा सके। ऐसी ही एक बैठक में लोगों ने बताया कि स्कूल की चारदीवारी न होने से गंदगी रोज़ परिसर में पसर रही है और उसका असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। मुद्दा विद्यालय प्रबंधन समिति के माध्यम से समुदाय तक पहुँचा और देखते-देखते एक साझा चिंता बन गया।

जब गाँव ने अपनी समस्याओं की चाबी अपने हाथ में ली

विनोद डामोर इस पूरी प्रक्रिया को बहुत सरल शब्दों में समझाते हैं:

“हमने गाँव वालों से कहा कि समस्या आपकी है तो हल भी आपके बीच से ही निकलेगा। हमारा काम सिर्फ़ इतना था कि बैठक में सब बैठें, बात खुलकर हो और जो तय हो, वह आगे तक पहुँचे।”

समस्या को समझ लेने के बाद समुदाय, बाल स्वराज समूह और फ़ेलो विनोद डामोर ने विद्यालय प्रबंधन समिति के साथ मिलकर सबकी सहमति से ग्राम पंचायत में बाउंड्री वॉल का प्रस्ताव जमा किया। मगर प्रस्ताव देकर चुप बैठ जाना इस गाँव को मंज़ूर नहीं था। समुदाय ने ग्राम सभा में नियमित रूप से उस प्रस्ताव की समीक्षा की, यानी बार-बार पूछा कि बात कहाँ तक पहुँची। यही सतर्कता रंग लाई। प्रस्ताव को प्रशासनिक स्वीकृति मिली, काम सुचारु रूप से शुरू हुआ और केवल दो महीने में बाउंड्री वॉल बनकर तैयार हो गई।

आज टीडीयादेव के विद्यालय में परिसर साफ़-सुथरा है। पर्यावरण स्वच्छ है, कोई बाहरी तत्व स्कूल के भीतर नहीं घुसता, पढ़ाई बिना रुकावट चल रही है और बच्चों के चेहरों पर ख़ुशी साफ़ दिखती है। एक दीवार ने केवल गंदगी को बाहर नहीं रोका, उसने बच्चों की एकाग्रता को भी भीतर सुरक्षित किया।

इससे भी बड़ा बदलाव दीवार के बाहर घटा। समुदाय में आत्मविश्वास जागा। जिन लोगों ने देखा कि उनका लिखा प्रस्ताव सचमुच ईंट-गारे में बदल सकता है, उन्होंने गाँव की दूसरी समस्याओं के लिए भी प्रस्ताव तैयार किए और ग्राम पंचायत में जमा कराए। इस पूरे दौर में बाल स्वराज समूह और फ़ेलो विनोद डामोर की भूमिका अहम रही, जिन्होंने ख़ुद श्रेय लेने के बजाय समुदाय को नेतृत्व के लिए आगे किया।

डूंगरीपाड़ा: जब बंद हैंडपंपों से फिर फूटी पानी की धार

इस प्रकार से ग्राम पंचायत राठ धनराज के गाँव डूंगरीपाड़ा के सामने पेयजल की गंभीर समस्या खड़ी थी। पूरे गाँव के लिए एक ही कुआँ था और उसकी पाल तक नहीं थी। यानी पानी तक पहुँचने के लिए बिना किसी सुरक्षा घेरे के किनारे पर झुकना पड़ता था। महिलाएँ रोज़ यही जोखिम उठाकर पानी भरते थे और हर बार किसी अनहोनी का अंदेशा उनके साथ-साथ चलता था। दूसरी तरफ़ गाँव के ज़्यादातर हैंडपंप ख़राब पड़े थे और मरम्मत की बाट जोह रहे थे। जो पंप कभी गाँव का सहारा थे, वे अब खड़े-खड़े लोहे के ढाँचे भर रह गए थे।

पानी की कमी केवल प्यास का सवाल नहीं होती। वह महिलाओं के समय, और पूरे परिवार की सेहत से जुड़ा सवाल होती है। जिस घर में पानी दूर से और जोखिम उठाकर लाना पड़े, वहाँ दिन की शुरुआत ही थकान से होती है।

इस कहानी का मोड़ 22 मार्च 2025 को आया। विश्व जल दिवस के मौके पर कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन और ग्राम स्वराज के माध्यम से समुदाय के बीच एक कार्यक्रम आयोजित हुआ। इसमें जल के संरक्षण और उसकी समस्याओं के समाधान पर खुलकर संवाद हुआ। यह बातचीत महज़ एक रस्म बनकर नहीं रह गई, बल्कि डूंगरीपाड़ा के लोगों के मन में उतर गई।

जब गाँव ने अपनी समस्याओं की चाबी अपने हाथ में ली

इसी प्रेरणा से ग्राम स्वराज संगठन डूंगरीपाड़ा के सदस्यों ने जलदूत कमलेश चरपोटा के साथ बैठक की। बैठक में निर्मल डांगी, मोहन मलजी, नरसिंग भानु, मंगली मालिया, प्रमिला रमली, सविता करमा और अन्य सदस्य शामिल हुए। लंबी चर्चा के बाद सबकी सहमति से एक फ़ैसला हुआ: अकेले-अकेले परेशान होने से कुछ नहीं बदलेगा, पूरे गाँव को एकजुट होकर सरकार के सामने अपनी माँग रखनी होगी।

जलदूत कमलेश चरपोटा उस बैठक को याद करते हुए कहते हैं:

“जल दिवस पर हमने तय किया था कि पानी की बात सिर्फ़ भाषणों में नहीं रहेगी। जब पूरा गाँव एक आवाज़ में माँग करेगा, तभी कोई सुनेगा।”

फ़ैसले के बाद गाँव ने इंतज़ार नहीं किया। ग्राम स्वराज संगठन के सदस्यों ने अपनी समस्या कुशलगढ़ विधानसभा की विधायक रमिला खड़गे के सामने रखी। इस मुहिम की सबसे ख़ास बात यह थी कि आवेदन और अर्ज़ियाँ किसी और ने नहीं, ख़ुद गाँव वालों ने लिखीं। उन्होंने उन्हें विधायक, ज़िला कलेक्टर और तहसीलदार तक पहुँचाया और जल विभाग के अधिकारियों से भी सीधा संपर्क साधा।

विधायक ने बात सुनते ही तुरंत कार्रवाई की। ज़िला कलेक्टर के माध्यम से तहसीलदार और जल विभाग के अधिकारियों से संपर्क करके समस्या के समाधान की पहल हुई। ग्राम स्वराज संगठन के आग्रह पर डूंगरीपाड़ा में जल संसाधनों की दोबारा मरम्मत की कार्यवाही शुरू कर दी गई।

विधायक रमिला खड़गे का रुख़ कुछ इस तरह रहा:

“पीने के पानी जैसे सवाल पर एक दिन की भी देरी ठीक नहीं। ग्रामीणों ने जब अपनी बात रखी, तो मैंने प्रशासन से तुरंत बात की ताकि गाँव को जल्द राहत मिले।”

जो काम बरसों तक लटका रह सकता था, वह दो दिन के भीतर शुरू हो गया। जल विभाग की पूरी टीम गाँव में पहुँची और समुदाय की मदद से जल संसाधनों की मरम्मत की। इस दौरान पाँच हैंडपंप दुरुस्त किए गए, जो कई दिनों से बंद पड़े थे और जिनकी वजह से पूरा गाँव पेयजल की किल्लत झेल रहा था। ख़ास बात यह रही कि समुदाय दर्शक बनकर नहीं खड़ा रहा। लोगों ने विभाग की टीम के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।

नतीजा यह हुआ कि गाँव की पेयजल समस्या का निराकरण हुआ और ग्रामीणों को अपने नज़दीक ही पानी की व्यवस्था मिल गई। जाँच के लिए पानी के नमूने भी ज़िला स्तर तक पहुँचाए गए, ताकि सिर्फ़ पानी मिलने पर नहीं, उसके पीने लायक होने पर भी नज़र रखी जा सके।

संगठन के सदस्य निर्मल डांगी की ख़ुशी उनकी बातों में झलकती है:

“जो पंप कई दिनों से बंद थे, वे फिर चल पड़े। हमने ख़ुद अर्ज़ी लिखी थी और ख़ुद देखा कि उसका असर क्या होता है। इससे बड़ी संतुष्टि और क्या होगी।”

सविता करमा इस अनुभव से मिली सीख को आगे की राह से जोड़ती हैं:

“अब हमें पता है कि अपनी बात कहाँ और कैसे रखनी है। आगे भी गाँव की कोई ज़रूरत होगी, तो हम इसी तरह एकजुट होकर माँगेंगे।”

इस पहल का असर गाँव की सरहद पर नहीं रुका। आसपास के गाँवों के लिए अच्छा उदाहरण बन गया। वहाँ के लोग भी अपनी समस्याएँ और माँगें लेकर सरकार से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कुएँ की पाल जैसी चुनौतियाँ अभी आगे के सफ़र का हिस्सा हैं, पर गाँव के पास अब वह भरोसा है जो हर अगली लड़ाई की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

दो गाँव, एक रास्ता

टीडीयादेव की दीवार और डूंगरीपाड़ा के हैंडपंप, देखने में दो अलग-अलग मसले हैं। एक का रिश्ता शिक्षा से है, दूसरे का पानी से। पर इनकी बुनावट में एक ही धागा दौड़ता है। दोनों जगह पहला क़दम समस्या को पहचानना था, और यह पहचान गाँव की अपनी बैठक में हुई। दोनों जगह उसके बाद सबकी सहमति आई, फिर लिखित प्रस्ताव या आवेदन, फिर लगातार फ़ॉलो-अप, और अंत में नतीजा। इस क्रम में कहीं भी किसी बाहरी की ज़रूरत नहीं पड़ी, ज़रूरत पड़ी तो बस संगठित समुदाय, सही मंच और धैर्य की।

विनोद डामोर और कमलेश चरपोटा जैसे लोगों ने ख़ुद को आगे रखने के बजाय समुदाय को आगे किया। इसी का फल है कि एक काम पूरा होते ही लोग दूसरे काम के लिए तैयार मिले, और पड़ोसी गाँव भी उसी राह पर चल पड़े। बदलाव जब किसी एक व्यक्ति पर टिका हो तो उसके हटते ही बिखर जाता है, लेकिन जब वह पूरे समुदाय की आदत बन जाए तो उसे कोई रोक नहीं सकता।

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