अनुराधा
लूणकरणसर, राजस्थानस्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण भारत में स्वच्छता को लेकर सोच और व्यवहार में बड़ा बदलाव लाने का काम किया है। जिस शौचालय को कभी घर की जरूरत नहीं माना जाता था, वह आज ग्रामीण परिवारों की जरूरी और प्राथमिक सुविधाओं में शामिल हो चुका है। खासकर महिलाओं और किशोरियों के लिए घर में शौचालय होना केवल साफ-सफाई से जुड़ी सुविधा नहीं, बल्कि उनके रोजमर्रा के जीवन को आसान और सुरक्षित बनाने वाला बदलाव है। इससे घर से दूर खुले में जाने की जरूरत कम हुई है, महिलाओं को सुबह या देर शाम तक इंतजार नहीं करना पड़ता और किशोरियों को भी अपनी निजी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
Image Editing help : AI
स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से सरकार ने ग्रामीण परिवारों को व्यक्तिगत घरेलू शौचालय उपलब्ध कराने पर जोर दिया है। राजस्थान सरकार के आर्थिक समीक्षा दस्तावेज के अनुसार राज्य को मार्च 2018 तक खुले में शौच से मुक्त यानी ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। इसके बाद स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के दूसरे चरण में ओडीएफ स्थिति को बनाए रखने और गांवों को ओडीएफ प्लस बनाने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन किसी गांव या राज्य को ओडीएफ घोषित कर देना यह सुनिश्चित नहीं करता कि आज उस गांव के हर परिवार के पास अपने घर में ऐसा शौचालय मौजूद है, जिसका इस्तेमाल परिवार के सभी सदस्य आसानी से कर सकें। यही वह अंतर है, जिसे गांवों की वास्तविक जिंदगी में समझने की जरूरत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के 2019-21 के आंकड़ों के अनुसार देश में 70.2 प्रतिशत आबादी ऐसे परिवारों में रहती थी, जो बेहतर स्वच्छता सुविधा का इस्तेमाल करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 64.9 प्रतिशत था। राजस्थान में स्थिति राष्ट्रीय आंकड़े से बेहतर दिखाई देती है, लेकिन यहां भी तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। राजस्थान में 71.1 प्रतिशत आबादी ऐसे परिवारों में रहती थी जो बेहतर स्वच्छता सुविधा का इस्तेमाल करते थे, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 66.1 प्रतिशत था। NFHS-5 में जिस ‘बेहतर स्वच्छता सुविधा’ की बात की गई है, उसमें कई प्रकार के शौचालय शामिल हैं और यह आंकड़ा पूरी तरह यह नहीं बताता कि हर परिवार के पास अपना शौचालय है। इसलिए इसे सीधे ‘हर घर में शौचालय’ का प्रतिशत मानना उचित नहीं होगा।
लूणकरणसर के कुजटी गाँव की अनीता (नाम बदला हुआ है) इसका उदाहरण हैं। उनकी स्थिति गांव में मौजूद उस वास्तविक समस्या की ओर ध्यान दिलाती है, जो केवल शौचालय बनने या नहीं बनने तक सीमित नहीं है। अनीता विधवा और दिव्यांग हैं और उनके घर में अभी तक शौचालय नहीं बना है। ऐसे में उन्हें पड़ोसियों के शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता है। सामान्य स्थिति में भी किसी दूसरे घर के शौचालय पर निर्भर रहना आसान नहीं होता है।
वहीं दिव्यांग व्यक्ति के लिए शौचालय तक पहुंचना और उसका इस्तेमाल करना कई अतिरिक्त मुश्किलें पैदा कर सकता है। उनके लिए शौचालय की जरूरत केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि ऐसी जगह की जरूरत है जहां वह बिना किसी दूसरे व्यक्ति या परिवार पर निर्भर हुए अपनी दैनिक जरूरत पूरी कर सकें। सरकार की मौजूदा स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण फेज़ II की गाइडलाइन में भी दिव्यांगजनों को प्राथमिकता वाली श्रेणियों में रखा गया है और उनके लिए दिव्यांग-अनुकूल शौचालय सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
अनीता की 13 और 15 वर्ष की दोनों बेटियों के लिए भी यह स्थिति आसान नहीं है। किशोरावस्था में लड़कियों को अपने शरीर और निजी जरूरतों से जुड़ी बातों के लिए अधिक गोपनीयता और सुविधा की आवश्यकता होती है। घर में शौचालय न होने पर उन्हें भी पड़ोस के शौचालय पर निर्भर होना पड़ता है। किसी किशोरी के लिए हर बार दूसरे घर में जाना केवल आने-जाने की बात नहीं होती। उसे समय देखना पड़ता है, यह देखना पड़ता है कि वहां कोई है या नहीं और कई बार परिवार तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण अपनी जरूरत को टालना भी पड़ सकता है। गांव में स्वच्छता की चर्चा इसलिए केवल सफाई की चर्चा नहीं हो सकती। यह महिलाओं और लड़कियों के समय, सुविधा, निजता और अपने दैनिक जीवन पर उनके नियंत्रण से भी जुड़ी हुई है।
इसी गांव की 50 वर्षीय धनी देवी की परेशानी कुछ अलग है। वह योजना का लाभ लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि योजना गांव में कब आती है और इसका लाभ लेने के लिए क्या प्रक्रिया पूरी करनी होती है? उनके लिए समस्या यह है कि सरकारी योजना और जरूरतमंद परिवार के बीच जानकारी का रास्ता साफ नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को यह पता ही न हो कि उसे आवेदन कहां करना है, उसका नाम सूची में कैसे आएगा, किन दस्तावेजों की जरूरत होगी और किससे संपर्क करना होगा, तो केवल योजना का मौजूद होना उसके लिए पर्याप्त नहीं है।
राजस्थान में शौचालय निर्माण का काम आज भी जारी है। केंद्र सरकार के अगस्त 2026 में जारी आंकड़ों के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण फेज़ II के तहत राजस्थान में 2021-22 से 2025-26 के बीच कुल 6,78,313 व्यक्तिगत घरेलू शौचालय बनाए गए। यह आंकड़ा बताता है किओडीएफ घोषित किए जाने के बाद भी नए शौचालयों की जरूरत खत्म नहीं हुई। नए परिवार बनते हैं, परिवारों की स्थिति बदलती है, पुराने शौचालय खराब हो सकते हैं और कुछ परिवार योजना से छूट भी सकते हैं। इसलिए इसका लक्ष्य हासिल होने के बाद भी व्यक्तिगत शौचालयों की जरूरत बनी रहती है।
यहीं यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि अगर राजस्थान को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है तो कुजटी जैसे गांव में अनीता और धनी देवी जैसी महिलाओं की समस्या क्यों बनी हुई है। दरअसल, सरकारी आंकड़े राज्य और गांव के स्तर पर उपलब्धि तो दिखा सकते हैं, लेकिन इसकी अंतिम सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि पात्र परिवार तक वास्तव में उसकी सुविधा अनुसार योजना पहुंची है या नहीं? स्वच्छ भारत का सपना तभी गांव के जीवन में पूरी तरह दिखाई देगा, जब सुविधा कागज पर दर्ज उपलब्धि से नहीं, बल्कि हर परिवार के रोजमर्रा के जीवन में नज़र आए।
(यह लेखिका की निजी राय है)
अनीता की 13 और 15 वर्ष की दोनों बेटियों के लिए भी यह स्थिति आसान नहीं है। किशोरावस्था में लड़कियों को अपने शरीर और निजी जरूरतों से जुड़ी बातों के लिए अधिक गोपनीयता और सुविधा की आवश्यकता होती है। घर में शौचालय न होने पर उन्हें भी पड़ोस के शौचालय पर निर्भर होना पड़ता है। किसी किशोरी के लिए हर बार दूसरे घर में जाना केवल आने-जाने की बात नहीं होती। उसे समय देखना पड़ता है, यह देखना पड़ता है कि वहां कोई है या नहीं और कई बार परिवार तथा सामाजिक परिस्थितियों के कारण अपनी जरूरत को टालना भी पड़ सकता है। गांव में स्वच्छता की चर्चा इसलिए केवल सफाई की चर्चा नहीं हो सकती। यह महिलाओं और लड़कियों के समय, सुविधा, निजता और अपने दैनिक जीवन पर उनके नियंत्रण से भी जुड़ी हुई है।
इसी गांव की 50 वर्षीय धनी देवी की परेशानी कुछ अलग है। वह योजना का लाभ लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें यह जानकारी नहीं है कि योजना गांव में कब आती है और इसका लाभ लेने के लिए क्या प्रक्रिया पूरी करनी होती है? उनके लिए समस्या यह है कि सरकारी योजना और जरूरतमंद परिवार के बीच जानकारी का रास्ता साफ नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को यह पता ही न हो कि उसे आवेदन कहां करना है, उसका नाम सूची में कैसे आएगा, किन दस्तावेजों की जरूरत होगी और किससे संपर्क करना होगा, तो केवल योजना का मौजूद होना उसके लिए पर्याप्त नहीं है।
राजस्थान में शौचालय निर्माण का काम आज भी जारी है। केंद्र सरकार के अगस्त 2026 में जारी आंकड़ों के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण फेज़ II के तहत राजस्थान में 2021-22 से 2025-26 के बीच कुल 6,78,313 व्यक्तिगत घरेलू शौचालय बनाए गए। यह आंकड़ा बताता है किओडीएफ घोषित किए जाने के बाद भी नए शौचालयों की जरूरत खत्म नहीं हुई। नए परिवार बनते हैं, परिवारों की स्थिति बदलती है, पुराने शौचालय खराब हो सकते हैं और कुछ परिवार योजना से छूट भी सकते हैं। इसलिए इसका लक्ष्य हासिल होने के बाद भी व्यक्तिगत शौचालयों की जरूरत बनी रहती है।
यहीं यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि अगर राजस्थान को ओडीएफ घोषित किया जा चुका है तो कुजटी जैसे गांव में अनीता और धनी देवी जैसी महिलाओं की समस्या क्यों बनी हुई है। दरअसल, सरकारी आंकड़े राज्य और गांव के स्तर पर उपलब्धि तो दिखा सकते हैं, लेकिन इसकी अंतिम सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि पात्र परिवार तक वास्तव में उसकी सुविधा अनुसार योजना पहुंची है या नहीं? स्वच्छ भारत का सपना तभी गांव के जीवन में पूरी तरह दिखाई देगा, जब सुविधा कागज पर दर्ज उपलब्धि से नहीं, बल्कि हर परिवार के रोजमर्रा के जीवन में नज़र आए।
(यह लेखिका की निजी राय है)
.webp)

0 टिप्पणियाँ