बीज माता कंकुदेवी: देशी बीजों और आदिवासी खेती की विरासत बचाने की कहानी

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बीज माता कंकुदेवी: देशी बीजों और आदिवासी खेती की विरासत बचाने की कहानी

विकास परसराम मेश्राम
vikasmeshram04@gmail.com

सेरानगला की पहाड़ियों में बसी बीजों की विरासत

दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा जिले की आनंदपुरी तहसील में गाँव है, सेरानगला। सुबह यहाँ धुआँ उठता है, ढलानों पर छोटे-छोटे खेत दिखते हैं और घरों में मिट्टी के मटके रखे मिलते हैं। इन्हीं में से एक घर 65 वर्षीय कंकुदेवी कामा डामोर का है। इलाके के लोग उन्हें आदर से "बीज माता" कहते हैं। वह उन देशी बीजों की विरासत है जिन्हें उन्होंने बरसों की मेहनत से बचाया, संजोया और दूसरों तक पहुँचाया। अपने बचपन को याद करते हुए कंकुदेवी कहती हैं कि ये पहाड़ियों वाले गाँव कभी घने जंगलों से समृद्ध थे, पर अब वे वन खो चुके हैं। गाँव के सभी लोग भील समुदाय से हैं। वे वर्षा पर निर्भर खेती करते हैं

बचपन की खेती और खेतों में मौजूद फसलों की विविधता

अपने उन बीते दिनों के बारे में बताती है कि माता-पिता और दो भाइयों के साथ छोटी कंकुदेवी पैदल पहाड़ी ढलानों पर बने खेत तक जाती थीं। साथ में रागी और कुरी की लापसी, यानी दलिया, और घर की उबली सब्ज़ियाँ होती थीं। आज वह सादा भोजन थालियों से लगभग गायब हो चुका है। वो कहती हैं पुरानी खेती का सबसे बड़ी बात थी की उसमें विविधता थी। कंकुदेवी बताती हैं कि उनके पिता मानसून से पहले बीज बो देते थे और सोलह प्रकार की तीस से ज़्यादा किस्में उगाते थे। हर फसल अलग समय पर पकती थी, इसलिए कटाई एक के बाद एक चलती रहती थी। किसी एक फसल के मारे जाने पर भी परिवार भूखा नहीं रहता था, क्योंकि खेत में हमेशा कुछ न कुछ तैयार होता रहता था। रागी, कुरी और कांग जैसे मोटे अनाज इस मिश्रित पद्धति की रीढ़ थे।

रागी: भोजन, ताकत और पारंपरिक खेती का आधार

रागी को वे अपना मुख्य भोजन बताती हैं। दिन में कम से कम तीन-चार बार इसका सेवन होता है और खेत पर काम करने की ताकत यहीं से आती है। इस बात को विज्ञान भी अलग ढंग से पुष्ट करता है। रागी और दूसरे मोटे अनाज कैल्शियम, रेशे और खनिजों से भरपूर माने जाते हैं। कम पानी और कमज़ोर मिट्टी में भी ये उग जाते हैं, इसीलिए पहाड़ी और सूखे इलाकों में सदियों से यही लोगों का सहारा रहे हैं।

पारंपरिक बीजों के सिकुड़ते संसार की चिंता

पर यह विविधता धीरे-धीरे सिकुड़ने लगी। कंकुदेवी के अनुसार पहले उनके पास मोटे अनाज की दस और दालों की पंद्रह किस्में थीं, लेकिन बीते कुछ वर्षों में पारंपरिक बीजों की कई किस्में खो गईं। "मुझे चिंता थी कि हम अपने पारंपरिक बीज खो रहे हैं, जो कीमती हैं," वे कहती हैं। इसी चिंता ने उन्हें आगे का रास्ता दिखाया।

संयुक्त परिवारों के टूटने और खेती में बदलाव का असर

यह नुकसान अचानक नहीं हुआ। उसके पीछे कई कारण थे, जिन्हें कंकुदेवी सरल शब्दों में समझाती हैं। संयुक्त परिवार टूटे और छोटी पारिवारिक इकाइयाँ बनीं। कम हाथ, कम समय और कम ज़मीन वाले परिवारों ने तेज़ी से उच्च उपज वाले संकर बीजों की ओर रुख किया। लेकिन उनका मानना है कि इस बदलाव को नीति ने भी हवा दी। मंडी के सरकारी खरीद केंद्रों में हर किस्म की खरीद नहीं होती, क्योंकि वे उस "अच्छी औसत गुणवत्ता" के मानक पर खरी नहीं उतरतीं। जब कोई फसल बिकती ही नहीं, तो किसान उसे उगाए क्यों?


घटता रकबा और मोटे अनाजों की बदलती तस्वीर

आँकड़े भी इसी की गवाही देते हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम की नीति-रिपोर्ट के अनुसार भारत में मोटे अनाज की खेती का रकबा 1965-66 के करीब 3.69 करोड़ हेक्टेयर से घटकर 2016-17 में लगभग 1.47 करोड़ हेक्टेयर रह गया, यानी क़रीब साठ प्रतिशत की गिरावट। उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रागी को छोड़कर बाकी छोटे मोटे अनाजों को न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसा संरक्षण लगभग नहीं मिलता, और यही उनके सिमटने की एक बड़ी वजह है। कंकुदेवी जो अपने अनुभव से कहती हैं, नीति-अध्ययन उसे आँकड़ों की भाषा में दोहराते हैं।

संकर बीज बनाम पारंपरिक बीज: लागत और आत्मनिर्भरता का सवाल

संकर बीजों का दूसरा पहलू लागत है। कंकुदेवी बताती हैं कि हाइब्रिड बीज महँगे होते हैं और उन्हें महँगे उर्वरकों और कीटनाशकों की ज़रूरत पड़ती है। समय के साथ ज़मीन बेजान होने लगती है। इसके उलट पारंपरिक बीज कम पानी में पनपते हैं, भरपूर पैदावार के लिए गोबर की खाद काफ़ी होती है और उनका भंडारण भी लंबे समय तक टिकता है। जिस किसान को हर मौसम नया बीज खरीदना पड़े, वह धीरे-धीरे बाज़ार का बंधक बन जाता है। जिसके पास अपना बीज है, वह अपने खेत का मालिक बना रहता है।

महिलाओं की भूमिका और बीज संरक्षण की परंपरा

कंकुदेवी बीज संरक्षण को कोई अनोखा काम नहीं मानतीं। उनके लिए यह पुरानी परंपरा की निरंतरता है। वे कहती हैं कि उनके समुदाय में बीजों को सहेजने का काम पारंपरिक रूप से महिलाएँ ही करती आई हैं, इसलिए इसे बचाना उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी लगी। इसी सोच के साथ वे वागधारा द्वारा गठित "सक्षम महिला समूह" से जुड़ीं और अन्य महिलाओं को भी बीज बचाने के लिए प्रेरित किया।

मटका किट और बीजों को सुरक्षित रखने की पारंपरिक विधि

बीज संवर्धन की पारंपरिक विधियों के लिए वागधारा ने उन्हें मटका किट दी। मिट्टी के बर्तनों में बीजों को सुरक्षित रखने की यह विधि पीढ़ियों से परखी हुई है। समूह की महिलाएँ आपस में बीजों का आदान-प्रदान करती हैं, जिससे किसी एक घर का बीज खोने पर भी दूसरे के पास बचा रहता है। कंकुदेवी को खेती की सारी गतिविधियों में, यानी बोना, उगाना, इकट्ठा करना, संग्रह करना और बाँटना, सबसे प्रिय बाँटना है। "अगर मैं उसे खो दूँ जो मेरे पास है, तो वह किसी और के पास सुरक्षित रहेगा," वे कहती हैं। यह सोच सिखाती है कि बीज बैंक तिजोरी में बंद अनाज का नाम नहीं है। वह हाथों-हाथ घूमता, बढ़ता और जीता रहता है।

बीज संरक्षण से जुड़ा किसान अधिकार

वे एक और बात कहती हैं जो अधिकार की बहस को सीधे छू जाती है। उनके अनुसार बीज की सफलता तभी है जब उसे खेतों में मौसम-दर-मौसम लगातार इस्तेमाल किया जाए। इसका मतलब है कि बीज को सहेजने का असली तरीका उसे बोते रहना है। भारत में पौधा किस्म और किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 इसी भावना को मान्यता देता है कि किसान केवल बीज का उपभोक्ता नहीं, उसका संरक्षक और प्रजनक भी है। कंकुदेवी जैसी अनगिनत महिलाएँ इस क़ानूनी भाषा से भले परिचित न हों, पर वे उसे रोज़ खेतों में जीती हैं।

बीजों का लेन-देन: भरोसे और साझेदारी की परंपरा

सेरानगला का सबसे सुंदर पहलू बीजों के लेन-देन का तरीका है। किसी किसान को कोई ख़ास देशी बीज चाहिए, तो कंकुदेवी और उनके साथी उसे मुफ़्त देते हैं। शर्त बस यह है कि बदले में वह अपनी कोई किस्म साझा करे। जिसके पास दूसरी किस्म नहीं है या जिसने अपनी किस्म खो दी है, उसे दिए गए बीज की दोगुनी मात्रा लौटाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यह भरोसे पर टिका आपसी लेन-देन है, जिसमें हर पक्ष कुछ देता है और कुछ पाता है। कंकुदेवी बताती हैं कि उन्होंने आदिवासी समाज की इसी पारंपरिक लेन-देन प्रथा को फिर से जीवित किया है।

मोटे अनाज की वापसी और किसानों के लिए बढ़ती आर्थिक संभावना

कंकुदेवी जानती थीं कि बीज तभी टिकेंगे जब उन्हें उगाना किसान के लिए घाटे का सौदा न रहे। वे बताती हैं कि मोटे अनाज को लंबे समय तक आदिवासियों या ग़रीबों का भोजन माना गया, और बाज़ार में उसकी कीमत भी कम मिलती थी। इसलिए उन्होंने आसपास के लोगों को पारंपरिक बीजों के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जुड़ाव के बारे में समझाया और यह भी कि वे सेहत के लिए कितने लाभदायक हैं। अब लोगों को समझ आ रहा है कि बाजरा और रागी जैसी फसलें पौष्टिक भी हैं और अच्छी क़ीमत भी दिला सकती हैं।

रागी और मक्का के दाम में अंतर

आँकड़ों में यह बदलाव दिखने लगा है। कंकुदेवी बताती हैं कि हाल ही में इलाके के किसानों ने रागी 3,700 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेची, जबकि मक्का के लिए उन्हें सिर्फ़ 2,000 रुपये प्रति क्विंटल मिलते हैं। यह फ़र्क़ बताता है कि मक्का छोड़कर मोटे अनाज की ओर लौटना अब भावनात्मक ही नहीं, आर्थिक रूप से भी समझदारी है।

सरकारी नीतियाँ और मोटे अनाजों को बढ़ावा

सरकारी स्तर पर भी मोटे अनाजों को अब ज़्यादा महत्व मिल रहा है। केंद्र सरकार ने खरीफ़ विपणन वर्ष 2025-26 के लिए रागी के न्यूनतम समर्थन मूल्य में 596 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की। यह उस सत्र की सबसे बड़ी बढ़ोतरियों में गिनी गई, और जानकारों के अनुसार प्रतिशत में रागी में सबसे ज़्यादा उछाल आया। पिछले वर्ष के 4,290 रुपये में यह वृद्धि जोड़ें तो मूल्य क़रीब 4,886 रुपये प्रति क्विंटल बैठता है। यानी जो रागी सेरानगला के किसानों ने 3,700 रुपये में बेची, उस पर सरकारी संरक्षण का ऊँचा स्तर अब मौजूद है। देखने की बात यह है कि यह लाभ कितने छोटे किसानों तक और कितनी सहजता से पहुँचता है।

देश में मोटे अनाजों के उत्पादन की तस्वीर

देश में मोटे अनाजों के उत्पादन की तस्वीर भी उत्साहजनक है। सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ वर्ष 2024-25 में देश में लगभग 180 लाख टन मोटे अनाज पैदा हुए, और राजस्थान उत्पादन में अव्वल रहा, उसके बाद महाराष्ट्र और कर्नाटक। यह भी उल्लेखनीय है कि राजस्थान का यह अव्वल स्थान ज़्यादातर बाजरे के दम पर है। रागी देश के कुल फसली क्षेत्र का आधे प्रतिशत के आसपास ही है और मुख्य रूप से कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में उगाई जाती है। इस लिहाज़ से बांसवाड़ा जैसे आदिवासी इलाकों में रागी का पुनर्जीवन ख़ास मायने रखता है, क्योंकि यह उस फसल को नई जगह जमाने की कोशिश है जो अब तक हाशिये पर थी। पोषण अनाज उप-मिशन जैसी योजनाओं के तहत बीज उत्पादन, प्रदर्शन और प्रशिक्षण के लिए सहायता देने की व्यवस्था भी है, पर उसका असल फ़ायदा तब है जब ऐसी सहायता कंकुदेवी जैसे किसानों तक पहुँचे।

बीज, खेती और आदिवासी पहचान का रिश्ता

कंकुदेवी के लिए इस पूरे सफ़र का महत्व पैसों से आगे जाता है। वे कहती हैं कि एक महिला होने के नाते यह प्रगति उनके लिए आर्थिक लाभ से ज़्यादा है। वे अपनी पारंपरिक फसलों का गौरव लौटा रही हैं, और ये फसलें उनकी पहचान हैं। यहाँ एक बड़ी सीख छिपी है। हमारे यहाँ विकास को अक्सर आय, उत्पादन और आँकड़ों में तौला जाता है, पर समुदायों के लिए खेती केवल आजीविका नहीं होती। उसमें गीत, त्योहार, देवता, रिश्ते और स्मृतियाँ बसी होती हैं। जब बीज खोता है, तो उसके साथ एक पूरी सांस्कृतिक शब्दावली मिट जाती है, जैसे किस अनाज को कब बोया जाए, किस पर्व में कौन-सा व्यंजन बने। कंकुदेवी जब कहती हैं कि ये फसलें हमारी पहचान हैं,

सरकार और समुदाय के सहयोग की जरूरत

इस बीच वे यह भी स्वीकार करती हैं कि यह मुहिम अकेले नहीं चल सकती। वे कहती हैं कि वागधारा के अलग-अलग प्रशिक्षणों ने उन्हें प्रेरित किया और खेती में मोटे अनाज को बढ़ावा देने में संस्था का सहयोग मिला है। पर वे सरकार से भी अपेक्षा रखती हैं। उनका कहना है कि सरकार के समर्थन से अपने बीजों की रक्षा करने में उन्हें लंबा समय लगेगा, और वे भविष्य के लिए देसी किस्मों के संरक्षण में सरकार से सहयोग का अनुरोध करती हैं। यह अपील एक साझेदारी का न्योता है।

पिता की सीख: "बीज जीवित प्राणी हैं"

पूरी बातचीत के अंत में कंकुदेवी अपने पिता को याद करती हैं, जिन्होंने उन्हें बीजों के बारे में सबसे ज़रूरी सबक़ दिया था। वह वाक्य उन्हें आज भी साफ़ याद है: "बीज जीवित प्राणी हैं। वे हमारी प्राचीन जड़ें हैं। हमें अपने पारंपरिक बीजों का पोषण और संरक्षण करने की ज़रूरत है, क्योंकि वे हमारे रिवाज को जीवित रखते हैं।" और कंकुदेवी सादगी से जोड़ती हैं, "और मैं यही कर रही हूँ।"

जलवायु परिवर्तन के दौर में देशी बीजों की प्रासंगिकता

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में कंकुदेवी का काम और भी प्रासंगिक हो जाता है। अनियमित बारिश, सूखे और बढ़ते तापमान के बीच वही फसलें टिकेंगी जो कम पानी और कठिन परिस्थितियों में उग सकें। देशी बीजों में सदियों का अनुकूलन दर्ज है, जो किसी प्रयोगशाला में एक दिन में तैयार नहीं हो सकता। इसी वजह से भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया था। पर असली सम्मान तब होगा जब नीतियों की घोषणाएँ सेरानगला जैसे गाँवों की मटका किटों तक उतरें।

सेरानगला की "बीज माता" और भविष्य की खेती

कंकुदेवी हमें याद दिलाती हैं कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की दुश्मन नहीं हैं। बाज़ार भी परंपरागत फसलों को क़ीमत दे सकता है, बशर्ते किसी ने उनकी क़ीमत पहचानने की पहल की हो। सेरानगला की इस "बीज माता" ने वह पहल की है।सेरानगला की पहाड़ियों पर जब अगली बारिश के बाद रागी की बालियाँ लहराएँगी, तो उनमें कंकुदेवी अपनी मटका बीज किट की मेहनत दोनों दिखेंगी। बीज बचता रहेगा, क्योंकि कोई उसे बोता, बाँटता और सहेजता रहेगा।

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