हमारी आजादी : बेटी से क्यों डरता है समाज?

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हमारी आजादी : बेटी से क्यों डरता है समाज?

हमारी आजादी : बेटी से क्यों डरता है समाज?

 

हमारी आजादी

खुशबू

उत्तराखंड

हमारी आजादी क्या है, हम क्या चाहते हैं?
खुलकर जीने का अपना हक़ चाहते हैं,
अपने पैरों पर खड़े होकर दुनिया देखना है,
भेदभाव छोड़कर मिल-जुलकर रहना है,
अपनी मर्ज़ी से जीवन की राह चुननी है,
बंदिशों से परे नई दुनिया बुननी है,
सपनों को पंख देकर आगे बढ़ना है,
हमें अपनी आज़ादी के साथ जीना है।

बेटी से क्यों डरता है समाज?

गुड़िया कपकोटी

सैलानी, उत्तराखंड

नारी शक्ति है, वह दुर्गा का अवतार है,
फिर क्यों समाज उसे कहता लाचार है?
नवरात्रि में पूजते हो तुम जिस नारी को,
जन्म लेने पर क्यों बोझ समझते हो उसी को?
‘पराया’ कहकर उसके सपनों को मत बाँधो,
बेटी को डर नहीं, उड़ने का आसमान दो,
याद रखो, उसी से सृष्टि का पूरा विस्तार है,
बेटी ही तो आने वाले कल का आधार है।

एक सवाल

श्रुति जोशी

कपकोट, उत्तराखंड

एक सवाल मेरे मन में जाने कब से है,
कौन हूं मैं, और क्या मेरी पहचान है?
सपनों को जीती एक लड़की हूँ मैं,
या दूसरों के बोझ तले दबी नारी हूँ मैं?
कभी बेटी, कभी पत्नी, कभी माँ बन जाती हूँ,
सबकी चिंता ढोते-ढोते खुद को भूल जाती हूँ,
बताओ, मेरी अपनी कोई पहचान है या नहीं?
आख़िर मैं कौन हूँ, और मेरी जगह कहाँ है?

जब दोस्ती पीछे छूट गई

प्रियांशी

कक्षा 11वीं, 

ग्वालदम, उत्तराखंड

दोस्ती की राह पर साथ चले थे कभी,
फिर जाने कब हमारे रास्ते बदल गए,
मैं अपनी कमियाँ ढूँढ़ती रह गई,
और तुम किसी नए रिश्ते में ढल गए,
टूटे रिश्ते जोड़ने की कोशिश बहुत की,
पर कुछ दूरियाँ चाहकर भी मिटती नहीं,
मेरे हिस्से रह गईं कुछ ख़ामोश सी यादें,
और दोस्ती से उठता हुआ एक सवाल कहीं।।


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